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ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम्। विश्वस्य एक परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वा अमृता भवन्ति ॥ 7 ॥            You are the Supreme Brahman, infinite, yet hidden in the hearts of all creatures. You pervade everything. They, who know You, are free from the cycle of birth, death and rebirth. (Svetasvatara 3 : 7)            परमात्मा सब प्रकार से सब काल में मुक्त और शुद्ध है। वह अपरिमित और अनन्त होते हुए भी सभी प्राणियों के हृदय में छिपा हुआ है। परमात्मा को जानने वाले व्यक्ति ही जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।

अज़ छि ज़्येठॖ ॴठम 30.05.2020 ज़्येठॖ (जेष्ठ) ज़ूनॖ पछॖ (शुक्ल पक्ष) ॴठम (अष्टमी) बटॖवार (शनिवार/शनिश्चरवार) श्री सप्तर्षि सम्वत 5096, राश सिंह (चलान) ....Today is Jyesth Maas Shukla Paksh Ashtamiyaam Shanivsasre sanayitaam. Kashmiri Pandit Nirvasan Samvat_31 Sapthrishi Samvat _5096
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कुन्ती माता   Kunti Mata      

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मनुष्य प्रारब्धानुसार ही सुख-दुःख भोगताा है। परन्तु, विचारपूर्ण देखा जाय तो प्रारब्ध का काम सुख-दुःख देना नहीं है। प्रारब्ध तो अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न करती हैं। इससे यह स्पष्ट है कि प्रारब्धानुसार मिलने वाली अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियाँ अथवा घटनाओं से मनुष्य अपने अज्ञान के कारण ही सुखी-दुखी होता है। दुःख अपेक्षया अधिक उपयोगी साधन है, क्योंकि वह तो सर्वथा भगवत्कृपा से ही प्राप्त होता है। कुन्ती ने भगवान से यही प्रार्थना की थीµ “हे जगद्गुरो! हम पर सदैव विपत्तियाँ आती रहें, ताकि आपके दर्शन होते रहें। 
कुन्तीदेवी भगवान श्रीकृष्ण की बुआ और पाण्डवों की माता थी। इनका नाम पृथा था, किन्तु राजा कुन्तिभोज के यहाँ लालन-पालन से उनका नाम कुन्ती प्रसिद्ध हुआ। एक बार राजा कुन्तिभोज के यहाँ एक तेजस्वी ब्राह्मण ने आकर आतिथ्य ग्रहण किया। उनकी सेवा का कठिन दायित्व कुमारी पृथा को सौंपा गया। ब्राह्मण देवता का स्वभाव विचित्रा था। कभी-कभी वह ऐसी वस्तु माँग बैठते जिसका मिलना दुर्लभ होता। कुन्ती ने उनकी सेवा निष्काम भाव से की। ब्राह्मण उनकी सेवा से प्रसन्न हुए। उन्होंने वात्सल्य भाव से पृथा से कोई वर माँगने के लिए कहा। पृथा ने अत्यन्त सरलता से उत्तर दियाµ “महाराज! जिस पर आप भी प्रसन्न हैं और पिता जी भी, उसे किसी वर की कोई आवश्यकता नही।...” ब्राह्मण ऐसी कामनाहीन नारी को देखकर और भी प्रसन्न हुए। उन्हांेने प्रसन्नतापूर्वक कुन्ती को देवताओं के आह्नान का मंत्रा दिया और समझायाµ “इन मंत्रों के बल से तू जिस-जिस देवता का आह्नान करेगी, वही तेरे अधीन हो जाएगा।“ वह तेजस्वी ब्राह्मण मंत्रा दीक्षा देकर अदृश्य हो गए। वास्तव में वह उग्रतपा दुर्वासा जी थे। (कुन्ती जी ने इन्हीं मंत्रों के प्रभाव से धर्म आदि देवताओं से युधिष्ठिर, अर्जुन, भीम आदि प्रतापी पुत्रा प्राप्त किए थे।)
कुन्ती जी का विवाह महाराजा पाण्डु से हुआ था। वे बडे़ धर्मात्मा थे। दैव-योग से एक बार वह मृग रूपधारी किन्दम मुनि का वध कर बैठे। इस हिंसाकर्म से उन्हें ऐसा पश्चाताप और ग्लानि हुई कि वह निर्वेद ग्रहण कर वन में चले गए। पति-परायण कुन्ती जी भी समस्त सांसारिक सुख-वैभवों का परित्याग कर पति के पास वन में ही तपस्विनियों की भाँति त्याग और संयम का जीवन व्यतीत करने लगीं। पति का स्वर्गवास होने पर इन्होंने अपनी छोटी सौत माद्री को संतान पालन का भार सौंप कर सती होने का संकल्प किया। किन्तु माद्री ने हठपूर्वक अपनी अल्पायु का तर्क रखकर कुन्ती जी को सती नहीं होने दिया। पति के बिना अल्पायु युवती का जीवन अधिक-कष्टकर हो उठता है। अतः कुन्ती जी ने माद्री की संतान पर अपने बालकों की अपेक्षा अधिक स्नेह-ममता लुटाई।
अपने पुत्रों के साथ उन्होंने दुर्योधन के अत्याचारों को धैर्यपूर्वक अद्वेष भावना से सहन किया। एक बार जब पाण्डव एकचक्रा नगरी में रह रहे थे, तब वहाँ की प्रजा एक नरभक्षी राक्षस के उत्पात से बहुत पीड़ित थी। नगर के लोग बारी-बारी उस राक्षस को एक गाड़ी अन्न और दो भंैसे प्रतिदिन पहुँचाते थे। जो व्यक्ति वह सामग्री लेकर जाता था, उसे भी ब्रह्मराक्षस चट कर जाता था। माता कुन्ती सहित पाण्डव उस नगरी में जिस ब्राह्मण के यहाँ निवास कर रहे थे एक दिन प्रातःकाल ही उसके यहाँ बड़ा विलाप होने लगा। माता कुन्ती को इस विलाप का कारण शीघ्र ज्ञात हो गया। उस दिन वह ब्राह्मण ही राक्षस के लिए भोजन सामग्री लेकर जाने वाला था। उसकी पत्नी तरह-तरह के तर्क देकर स्वयं जाने का आग्रह कर रही थी। एकमात्रा नन्हें पुत्रा को अपने रहते माता-पिता का वध न होने देने का हठ ठाना था। उसने कहाµ “मैं इस तृण से ही राक्षस का वध कर दूँगा।” उसकी भगिनी ने कहाµ “आप एक दिन धर्म के अनुसार मुझे छोड़ ही देंगे। क्यों न मैं आज ही आपसे मुक्त हो जाऊँ।”
इस प्रकार शोकाकुल ब्राह्मण परिवार का संताप सुनकर माता कुन्ती का हृदय द्रवित हो आया। उन्होंने कहाµ “एक तो आप हमारे आश्रयदाता हैं। फिर आपके उपकार का बदला न चुका कर हम धर्म-च्युत हो जाएँगे। आपके एक ही पुत्रा है और एक ही कन्या। मैं तो पाँच पुत्रों की माता हूँ। मेरा एक पुत्रा बड़ा बलवान् है और उसे मंत्रा-सिद्धि है। राक्षस उसका बाल बाँका भी नहीं कर सकेगा।...” माता कुन्ती की ऐसी त्यागमयी विश्वासपूर्ण बात सुनकर ब्राह्मण प्रसन्न हो गया। 
महाभारत के समय भी वही रहीं। और अन्त में जब पाण्डवों की विजय हुई और उन्हें राजमाता बनाने का सौभाग्य हुआ तो वे समस्त राजवैभव छोड़कर पुत्र-वियोग से व्याकुल जेठ-जेठानी की सेवा के लिए उनके साथ वन में चली आईं। भीमसेन ने जब उनसे पूछा कि “माता! तुम्हें वन में ही जाना था तो हमें हमारे वनवासी पिता से दूर नगर में क्यों लाईं और क्यों इतना नर-संहार करवाया?”
“वत्स! तुम क्षत्रियोचित पुरुषार्थ त्याग कर अपमानपूर्ण जीवन व्यतीत न करो, इसलिए मैंने तुम्हें तुम्हारे कर्तव्य में प्रवृत्त किया। मुझे राजसुख भोगने की इच्छा नहीं। मैं सेवा का जीवन बिताऊँगी।”

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