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ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम्। विश्वस्य एक परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वा अमृता भवन्ति ॥ 7 ॥            You are the Supreme Brahman, infinite, yet hidden in the hearts of all creatures. You pervade everything. They, who know You, are free from the cycle of birth, death and rebirth. (Svetasvatara 3 : 7)            परमात्मा सब प्रकार से सब काल में मुक्त और शुद्ध है। वह अपरिमित और अनन्त होते हुए भी सभी प्राणियों के हृदय में छिपा हुआ है। परमात्मा को जानने वाले व्यक्ति ही जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।

अज़ छि ज़्येठॖ ॴठम 30.05.2020 ज़्येठॖ (जेष्ठ) ज़ूनॖ पछॖ (शुक्ल पक्ष) ॴठम (अष्टमी) बटॖवार (शनिवार/शनिश्चरवार) श्री सप्तर्षि सम्वत 5096, राश सिंह (चलान) ....Today is Jyesth Maas Shukla Paksh Ashtamiyaam Shanivsasre sanayitaam. Kashmiri Pandit Nirvasan Samvat_31 Sapthrishi Samvat _5096
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भक्त कान्हू पात्रा     

एक बार जो भगवान की शरण मंे अनन्यभाव से आ जाता है, परमकृपालु भगवान उसे कभी अपने हृदय से दूर नहीं करते। संत तो यह कहते हैं कि जिसे प्रभु को छोड़कर दूसरी गति (आश्रय) ही नहीं है, उसके उर-सिंहासन पर वह दीनानाथ सदा विराजते हैं। पर ऐसे भक्त को तो वह स्वयं अपने हृदय-सिंहासन पर सदा आसीन करते हैं। 
कान्हू पात्रा महाराष्ट्र की एक ऐसी ही अनिंद्य सुन्दरी बालिका थी, जिस पर विट्ठलनाथ ने अपना वरद्-हस्त रखा और अपनी अलौकिक ज्योति में ही उसे समाविष्ट कर लिया। बेचारी कान्हू पात्रा कर्माधीन होकर वेश्या की कोख में जन्मी थी। मंगलवेढ़ा की वेश्या श्यामा उसकी माँ थी। कान्हू पात्रा का सौन्दर्य देखकर वह विस्मित रह गई थी। पाप-पंक में आकण्ठ डूबी हुई श्यामा अपनी पुत्राी को बड़ी आशा से पाल रही थी। उसकी दुर्भावना यही थी कि पुत्राी को भी उसी कुमार्ग पर धकेद दे, जिस पर वह स्वयं चल रही थी। पापान्ध जीव को कुमार्ग पर चलने में ही सुख मिलता है। किन्तु कान्हू पात्रा को जैसे-जैसे समझ आती गई, वह माँ के व्यभिचारपूर्ण नारकीय जीवन से घृणा करने लगी। नारकीय जीवन की कल्पना मात्रा से वह भयभीत हो पीली पड़ जाती। माँ की बुरी नियत उससे छुपी नहीं रही थी। अन्तर की किसी अज्ञात प्रेरणा से, जिसे निश्चय ही भगवत्कृपा कहना चाहिए, कान्हू पात्रा पण्ढरपुर के श्री विट्ठलनाथ का स्मरण करती और उससे प्रार्थना करती किµ “हे अनाथों के नाथ, दीनवत्सल! मुझे इस नरक से निकाल दो! मुझे अपनी दासी बना लो, दयानिधान!....”
अन्तर की सच्ची पुकार को भगवान कैसे नहीं सुनते। एक बार श्यामा बाई के छज्जे से नीचे से श्री विट्ठलनाथ के भक्तों की मण्डली बड़ी श्रद्धापूर्वक उनका गुणगान करती हुई निकली। ताल-मृदंग, मंजीरे, झाँझ बज रहे थे। मधुर नामकीर्तन की ध्वनि से सारा वायुमण्डल पवित्रा हो रहा था। अपने नृत्य-गायन को वह वेश्या पुत्राी भूल गई। ऐसा मधुर संकीर्तन तो उसने कभी सुना ही नहीं था। भक्त-मण्डली शनैः-शनैः अपने पथ पर आगे बढ़ गई। पर कान्हू पात्रा के तो मानो रोम-रोम में वह विट्ठलनाथ के नाम की मधुर ध्वनि संचरित कर गई। श्यामा ने बड़े प्रलोभन दिए। युवावस्था के नाम की मधुर ध्वनि संचरित कर गई। स्थिति का बोध कराया। पर कान्हू ने किसी के भी सम्मुख आत्म-समर्पण करने से इन्कार कर दिया। एक बार जिसे नाम-रट लग जाती है, प्रभु की जिस पर अनुकम्पा हो जाती है, उसे न तो धन सुहाता है, न पद लुभाता, न वह प्रतिष्ठा के आगे झुकता, न वह बल के आगे! अन्त में माँ ने मत्था ठोककर कहाµ “बेटी, तू अपने ही मन का करना चाहती है, तो किसी एक ही पुरुष को कर ले।” कान्हू पात्रा आश्वस्त हुई। उसने कहाµ “हाँ, मैं अपने से अधिक सुन्दर, सुकुमार, सलोने, सुशील पुरुष का हाथ पकडूँगीµ थोड़ा ठहरो।.....” उसके हृदय में उसके सर्वथा योग्य एक ही था, और वह थे श्रीविट्ठलनाथ। पण्ढरपुर की यात्रा। आरम्भ हुई। कान्हू पात्रा अपने प्रियतम की शरण में पहुँच गई। हृदय से उन्हें वर लिया और दासी-भाव से वहीं रहने लगी। अनेक अग्नि-परीक्षाएँ उस भुवन मोहिनी तरुणी के समक्ष आईं, पर उसका वर तो सर्व-समर्थ, सर्व-शक्तिशाली। कान्हू पात्रा भक्ति-पथ पर अविचल चलती रही। 
उसके पावन भक्ति भाव के साथ-साथ उसके अलौकिक सौंदर्य की प्रशंसा भी सर्वत्रा फैलने लगी। श्रद्धालुजन उसे देखकर अपने हृदय मंे भगवद् प्रेम जगाने की चेष्टा करते और कामान्ध पुरुष अपनी वासनाओं को उसमें आरोपित करते। इसी तरह समय बीत रहा था, कि एक दिन बेदर (बीदर) के यवन बादशाह ने उसके सौन्दर्य की ख्याति सुनकर पाप-वासना से आज्ञा दी कि “कान्हू पात्रा को हमारे हरम मंे लाया जाय। यदि वह प्रसन्नतापूर्वक पटरानी नहीं बनना चाहती हो तो बलपूर्वक पकड़ कर ले आओ।” पर कान्हू पात्रा तो अपने विट्ठलनाथ की पटरानी बन चुकी थी। भगवान की शरण में आते ही जीव के कोटि-कोटि जन्मों के पाप तुरन्त नष्ट हो जाते हैं। कान्हू के पुराने कुसंस्कार तो कब के भगवद्दर्शन से भस्म हो चुके थे। वह श्रीविट्ठलनाथ की शरण छोड़कर कहीं भी कैसे चली जाती? बादशाह के सिपाही जब प्रलोभन देकर हार गए तो उन्होंने बल प्रयोग किया। असहाय दीन-भक्त चिल्ला उठीµ “मेरे स्वामी विट्ठल! मेरी रक्षा तुम्हारे सिवा कौन कर सकता है!....” दारुण विलाप करते-करते कान्हू पात्रा अचेत होकर श्री विट्ठलनाथ के विग्रह के सम्मुखस ही गिर पड़ी। उसके भौतिक शरीर से भक्ति की शीतल अग्नि में तपी एक ज्योति निकली और प्रभु के विग्रह में लीन हो गई। प्रियतमा ने सदा के लिए अपने प्रियतम को पा लिया। पतितपावन ने उस भक्तमयी को अपना बना लिया। 
श्रद्धालुजनों ने मन्दिर के दक्षिण द्वार पर उसकी समाधि बनाई। मन्दिर के समीप ही कान्हू पात्रा की मू£त स्थापित की गई। आज भी कान्हू पात्रा पर भगवत्कृपा की की£त फहरा रही है। 

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