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ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम्। विश्वस्य एक परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वा अमृता भवन्ति ॥ 7 ॥            You are the Supreme Brahman, infinite, yet hidden in the hearts of all creatures. You pervade everything. They, who know You, are free from the cycle of birth, death and rebirth. (Svetasvatara 3 : 7)            परमात्मा सब प्रकार से सब काल में मुक्त और शुद्ध है। वह अपरिमित और अनन्त होते हुए भी सभी प्राणियों के हृदय में छिपा हुआ है। परमात्मा को जानने वाले व्यक्ति ही जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।

अज़ छि ज़्येठॖ ॴठम 30.05.2020 ज़्येठॖ (जेष्ठ) ज़ूनॖ पछॖ (शुक्ल पक्ष) ॴठम (अष्टमी) बटॖवार (शनिवार/शनिश्चरवार) श्री सप्तर्षि सम्वत 5096, राश सिंह (चलान) ....Today is Jyesth Maas Shukla Paksh Ashtamiyaam Shanivsasre sanayitaam. Kashmiri Pandit Nirvasan Samvat_31 Sapthrishi Samvat _5096
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भक्त ज्योति पंत     

   
भगवान ने अपने भक्तों के चार प्रकार बताये हैंः-
चतु£वद्या भजन्ते माँ जनाः सुकृतिनोर्जुन।

आर्तो जिज्ञासुर्थार्थी ज्ञान च भरतर्षभ।।6/16
ये चार पुण्यात्मा हैंµ आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी। ये चारों जो कुछ भी चाहते हैं, वह केवल भगवान से ही चाहते हैं। इनमें आर्त वे होते हैं जो दुःख पड़ने पर भगवान का भजन करते हैं। दुःख होता है, अभाव से। चाहे धन का अभाव हो, चाहे सन्तान का, चाहे मान-बढ़ाई या विद्या का। किसी प्रकार के भी अभाव से दुःख होगा ही। आर्त भक्त की एक विशेषता है। उसमें जिज्ञासु और अर्थार्थी की अपेक्षा अनन्यता शीघ्रता से उत्पन्न होती है। (ज्ञानी को तो भगवान ने ‘त्वारत्मैव मे’ कहा ही है, अस्तु!)
महाराष्ट्र के महाभागवत ज्योतिपंत भगवान के ऐसे ही आर्तभक्त थे। वे विद्या के अभाव के कारण आर्त थे। अठारहवीं शताब्दी मंे महाराष्ट्र के सतारा जिले के अन्तर्गत बिरे नामक ग्राम में गोपाल पंत नाम के एक निर्धन ब्राह्मण के यहाँ ज्योतिपंत का जन्म हुआ था। गोपालपंत विद्वान पंडित थे। विद्या£थयों को निःस्वार्थ भाव से विद्याध्ययन कराते थे और बिना माँगे जो आ जाता उसी में संतोषपूर्वक निर्वाह करते। ज्योतिपंत उनका एकमात्रा पुत्रा था। अतः उसे भी विद्या में पारंगत करने की उनकी बड़ी प्रबल इच्छा थी। बिना विद्या के तो मनुष्य इस पृथ्वी पर बिना पूँछ बिषाण का पशु ही है। पर दुर्भाग्य! ज्योतिपंत बीस वर्ष का हो गया, उसके लिए काला अक्षर भैंस बराबर था। पिता ने हर सम्भव उपाय किया, पर उस मूढ़ को गायत्राी मंत्रा भी स्मरण न था। ‘राम’ नाम के दो अक्षर बोलने के अतिरिक्त उसे कुछ नहीं आता था। एक दिन पिता बहुत क्रुद्ध हुए। वज्र मूर्ख पुत्रा से तो निःसन्तान ही अच्छे थे। ऐसा चित्त दुःखी हुआ उनका कि उन्होंने ज्योतिपंत को बहुत मारा-पीटा और घर से निकाल दिया। कठोर वाणी में कहा उन्होंनेµ ‘विद्या अर्जन कर पंडित हो जाय, तभी घर में घुसना, अन्यथा यहाँ कदापि न आना।’ ज्योतिपंत रोता-चिल्लाता, ग्राम से बाहर वन-प्रदेश में आ गया। वहाँ उसके समवयस्क कुछ और भी लड़के खेल रहे थे। उनके साथ खेल-कूद में वह मार की पीड़ा भूल गया। खेलते-खेलते उसकी दृष्टि उस एकान्त प्रदेश में बने एक गणेश-मंदिर पर चली गई। अनायास उसे स्मरण हो आया कि ‘गणेश जी तो विद्यावारिधि हैं, क्यों न इन्हीं से विद्या माँगू! उसने अपने साथियों से कहाµ ‘आओ, सब मिलकर गणेश की स्तुति करें और इनसे विद्या माँगें।’ बालकों ने सोचा, इस मूर्ख की बातों में क्या मिलेगा? अपने घर चलो। वे उसे अकेला छोड़कर ग्राम में वापस जाने लगे तो ज्योतिपंत ने सरल-हृदय से कहा, अच्छा! तुम लोग अपना आप ही अहित करोगे, मत रुको! पर, मेरे कहने से एक काम करो। इस मंदिर के द्वार को बाहर से लीप-पोत कर बन्द कर दो और ग्राम में जाकर मेरे यहाँ होने का समाचार किसी को नहीं देना। बालकांे ने सोचाµ ‘यह मूर्ख है, आज इसे मूर्खता का ही मजा लेने दो।’ बस, उन्होंने पास के पोखरे से मिट्टी और जल के विग्रह के सामने नेत्रा मूँद कर अपनी टूटी-फूटी, किन्तु प्रेम-लपेटी वाणी में उनकी स्तुति करने लगा। 
छः दिन बीत गये। उस आर्त भक्त को निद्रा, क्षुधा, पिपासा किसी भी शारीरिक क्लेश का ¯कचित भी भान नहीं हुआ। उधर गोपालपंत क्रोध शांत होने पर पश्चाताप करने लगे किµ हाय! न जाने वह मूर्ख कहाँ किस स्थिति में होगा।’ उनकी पत्नी भी बेटे के शोक में दुःखी हो गई। रोते-रोते उसकी तो आँखें ही सूज गईं। तभी छठे दिन गोपापंत को स्वप्न में अवढरदानी चन्द्रमौलि भगवान शिव ने आश्वासन दिया कि ‘बालक की चिंता न करो, वह यशस्वी और भगवद् भक्त होगा।’ उधर सातवें दिन क्या हुआ कि मंदिर एक अलौकिक प्रकाश से जगमगा उठा। गजानन गणेश अपने विग्रह से दिव्यरूप मंे प्रकट हो गए। उनके मस्तक पर चन्द्र सुशोभित था। दक्षिण हस्त वरद मुद्रा में था। एक अजस्त्रा कृपा-धार मानो उनके दिव्य शरीर में प्रवाहमान होकर ज्योतिपंत को मानो ज्योतिपुंज ही बना रही थी। भगवान गणेश का ऐसा दिव्य स्वरूप देखकर ज्योतिपुंज को तनिक भी भय नहीं हुआ, क्योंकि जो भक्त भगवान का आश्रय लेता है वह तुरन्त ही अभय हो जाता है। (ज्ञानी तत्वदर्शन के  पश्चात् अभय होता है।) गणेश जी ने प्रसन्न होकर कहा, ‘वत्स जो इच्छा हो माँग, मैं तेरी अभिलाषा पूर्ण करने के लिए ही प्रकट हुआ हूँ।’ ज्योतिपंत ने निष्कपट भाव से कहा, ‘महाराज! पहले तो विद्या ही चाहता था, परन्तु अब मेरी अभिलाषा तत्वज्ञान और भगवान की  प्रेम-भक्ति पाने की ही है।’ तुलसीदास जी ने भी गणेश जी से ही यही माँगा थाµ ‘मांगत तुलसी दास कर जोरे, बसहु राम-सिय मानस मोरे।’ अस्तु! गणेश जी ने प्रसन्नतापूर्वक कहाµ ‘वत्स! तेरी विद्या में पारंगत होने की अभिलाषा अभी इसी समय पूर्ण होगी और दूसरा मनोरथ कुछ समय पश्चात् सुफल होगा।’ गणेश जी ने कृपापूर्वक ज्योतिपंत की जिह्ना पर ‘¬’ लिख दिया और इस प्रकार उसे सम्पूर्ण विद्या का धन देकर वे अन्तर्धान हो गये। जाने से पूर्व उन्होंने कहा, ‘वत्स! जब तू मेरा प्रेम से आह्नान करेगा, मैं तभी प्रकट हो जाऊँगा।’
ज्योतिपंत अब ग्राम में आये। उन्हें अनायास विद्या-विनय सम्पन्न देखकर माता-पिता के हर्ष का पारावार न रहा। उनके सखा गणेश जी के दर्शन के सुख से वंचित रहने के कारण बहुत पछताये। कालांतर में ज्योतिपंत ने पुणे में पेशवा के यहाँ प्रधान अपने मामा महीपति के पास नौकरी की। वहाँ भी गणेश जी की कृपा से उन्होंने कई मास में पूरा होने वाला हिसाब-किताब (बही-खात) तीन दिन में पूरा किया और राजा से पुरस्कृत हुए। तत्वज्ञान और पे्रमाभक्ति की प्राप्ति के लिये वे भगवद् प्रेरणा से काशी गये। वहाँ गंगा स्नान और मंत्राजाप करते हुए छः मास बीतने पर इन्हें भगवान वेदव्यास ने दर्शन दिये और कृपा कर श्री मद्भागवत की पावन पोथी भेंट की। तत्पश्चात् ज्योतिपंत मणिक£णका घाट पर प्रातः स्नान करके बैठ जाते और सूर्यास्त पर्यटन भागवत्परायण करते। इसी स्थिति में इन पर एक दिन गणेश जी के ‘बाबा’ शंकर भगवान ने कृपा की और दर्शन दिये। इन्हें आश्वासन दियाµ “मेरी कृपा से वत्स, तुम्हें तत्वज्ञान और प्रेमाभक्ति दोनों प्राप्त हुए। मनोरथ सफल हुआ तुम्हारा। अब तुम अन्य लोगों के साथ उन्हें भी पालकी में बैठाकर उनकी ससम्मान सवारी निकाली। आजीवन वे भगवद्भक्ति की ही प्रचार करते रहे। संवत् 1845 वि॰ मार्गशीर्ष त्रायोदशी को ज्योतिपंत की इहलीला का संवरण हुआ। महाराष्ट्र में उनकी प्रेरणा से नि£मत अनेकों मंदिर, आज भी उन पर हुई श्री गणेश जी, वेदव्यास जी और भगवान शंकर की महती कृपा का पावन स्मरण कराते हैं।


 

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