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ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम्। विश्वस्य एक परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वा अमृता भवन्ति ॥ 7 ॥            You are the Supreme Brahman, infinite, yet hidden in the hearts of all creatures. You pervade everything. They, who know You, are free from the cycle of birth, death and rebirth. (Svetasvatara 3 : 7)            परमात्मा सब प्रकार से सब काल में मुक्त और शुद्ध है। वह अपरिमित और अनन्त होते हुए भी सभी प्राणियों के हृदय में छिपा हुआ है। परमात्मा को जानने वाले व्यक्ति ही जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।

अज़ छि ज़्येठॖ ॴठम 30.05.2020 ज़्येठॖ (जेष्ठ) ज़ूनॖ पछॖ (शुक्ल पक्ष) ॴठम (अष्टमी) बटॖवार (शनिवार/शनिश्चरवार) श्री सप्तर्षि सम्वत 5096, राश सिंह (चलान) ....Today is Jyesth Maas Shukla Paksh Ashtamiyaam Shanivsasre sanayitaam. Kashmiri Pandit Nirvasan Samvat_31 Sapthrishi Samvat _5096
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भक्त जयदेव जी         


भगवान प्रेम-पयोधि है, करुणा के सागर हैं। भक्त की की£त का विस्तार करना, और पग-पग पर उसके योग-क्षेम का भार अपने ऊपर ही ले लेना, यही उन दयासिंधु की बात है। भक्त जयदेव पर तो उनकी कृपा का अन्त ही नहीं था। वास्तव में जयदेव जी ऐसे निःस्पृह संत थे कि उन्हें श्री राधा-माधव के प्रेम में सदा निमग्न रहने के अतिरिक्त घर-संसार का कोई अनुराग ही नहीं था। 
अब से लगभग पाँच सौ वर्ष पूर्व जयदेव जी का आविर्भाव वीरभूमि जिले में केन्दुबिल्व ग्राम में हुआ था। वे भारद्वाज गोत्राज श्री हर्ष के वंशज थे। प्रभु ने बाल्यकाल से ही मानो उनकी बाँह पकड़ ली। कच्ची अवस्था में माता-पिता का स्वर्गवास हो गया। निर्धनता के कारण कष्ट सदा घेेरे रहते। पर जिसे भगवदाश्रय होता है, वह संसारिक विपत्तियों में भी प्रभु की कृपा का दर्शन करता हुआ अपने मार्ग पर अविचल रहता है। भगवान का सच्चा दास क्या संसार की आशा रखता है? जयदेव जी ने स्वयं परिश्रम कर अच्छा विद्याभ्यास कर लिया। रूखी-सूखी खाकर हर समय भगवद् भजन को लगे रहना ही उनका व्यवसाय बन गया और यही स्वभाव भी पड़ गया। 
उन पर पहली विपत्ती पिता का स्वर्गवास होते ही आई। निरंजन नाम का एक ब्राह्मण था। उसने जयदेव जी के पिता को ऋण दिया था। लोभवश वह जयदेव जी का जीर्ण-शीर्ण मकान हड़पने की कुचेष्टा कर बैठा। उनके पास आकर बोलाµ “जयदेव! तुम्हारे पिता ने ऋण लिया था। उसे चुकाना तुम्हारा कर्तव्य है। पर तुम पर सिवा राधा-माधव की मू£त के और धन क्या है?µ लो इस कागज पर सही कर दो और यह टूटा-फूटा मकान मेरे नाम करके ऋण मुक्त हो जाओ।” भक्त को और क्या चाहिए था? संासारिक सम्पत्ति को तो जयदेव भगवद् भजन में बाधा मानते थे। बड़े हर्ष से उन्हांेने कागज लेकर सही कर दिया। तभी क्या हुआ कि निरंजन की कन्या दौड़ी-दौड़ी वहाँ आई और चीत्कार कर कहने लगीµ “बाबा, घर में भीषण आग लग गई है, जल्दी चलो।” निरंजन उल्टे पैरों दौड़ पड़ा। जयदेव जी भी इस समाचार से दुःखी हुए और वह निरंजन से भी तीव्र गति से दौड़कर अग्नि शान्त करने के लिए लोभी ब्राह्मण के घर में कूद पड़े। भगवान से भक्त की यह दशा कैसे देखी जाती! न जाने कैसा दैवी प्रभाव था कि अग्नि तुरन्त शान्त हो गई। ब्राह्मण का हृदय पलट गया। अपने कुकृत्य पर उसने जयदेव जी से क्षमा माँगी। 
इस घटना से पहली बार जयदेव जी को प्रभु के अनुग्रह का साक्षात्कार हुआ। प्रेम-विह्नल हो वह नेत्रों से अश्रु बहाने लगे। उनके सामने जैसे राधा-माधव की युगल-मू£त के अतिरिक्त और कुछ था ही नहीं। वह कुछ ही समय बाद घर-द्वार छोड़कर प्रभु का गुणगान करते हुए पुरुषोत्तम क्षेत्रा-पुरी की ओर चल पड़े। प्रसिद्ध है, एक बार मार्ग में दूर-दूर तक कहीं जल भी नहीं मिला। जयदेव जी के पास भगवन्नाम का ही सम्बल था। जब तक जिह्ना से श्रीकृष्ण का नाम निकलता रहा, वह उन्मत्त भाव से उसे पुकारते रहे। अन्त में पा£थव शरीर उस ग्रीष्म की दोपहरी में निःचेष्ट होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। कृपा-कटाक्ष से भक्त को जीवनदान देने वाले प्रभु गोप बालक वेष में प्रकट हुए। पीत उपरने से जयदेव जी को शीतल मन्द पवन का सुख दिया और अर्ध-चेतनावस्था में ही जयदेव जी को उठाकर धारोष्ण अमृत सदृश दूध पिलाया और अदृश्य हो गए। जयदेव जी भगवान का स्मरण करते ठगे से बैठे रह गए, मानो अभी-अभी हाथ में आया हुआ अमूल्य रत्न निकल गया हो। ध्यानावस्था में कब तक बैठे रह गए, पता नहीं। उस समय वह वेणुवादक श्याम यमुना पुलिन पर कदम्ब की शीतल छाया में राधा जी के साथ मनोहारी छवि में दर्शन देते हुए मन्द स्मित से उन्हें देखने लगा। उसके विशाल नेत्रों की मोहनी ने जयदेव जी को ठग लिया। कविता का स्फुरण हुआ और यह छवि उन्होंने पद्य-बद्ध कर ली। कृपासिंधु की की£त का गुणगान में प्रसिद्ध ‘गीत गोविन्द’ यहीं से प्रारम्भ हो गया। भगवद् कृपा से अभिभूत जयदेव जी को तब क्रमशः दशावतारों के दर्शन हुए और उन्होंने भगवान के दशों अवतारों की गद्गद् कण्ठ से स्तुति गाई। 
पुरी आकर जयदेव जी ने भगवान जगन्नाथ जी के भव्य दर्शन का लाभ उठाया और वहीं एक विरक्त की भाँति रहने लगे। संन्यासियों की तरह मधुकरी से क्षुधा-निवृत्ति करते और कहीं भी वृक्ष के नीचे पड़े रहते। यहीं कुछ समय बीतने पर उन्होंने दैवी आज्ञा से सुदेव नामक ब्राह्मण की कन्या पद्मावती को अंगीकार किया। वह भी पति की तरह ही भगवान की अपार कृपा का पात्रा थी। दोनों पति-पत्नी केन्दुबिल्व लौट आए। घर आकर वे राधा-माधव की सेवा-पूजा में इस तरह संयुक्त हो गए जैसे गृहस्थ का और कोई काम ही नहीं हो। 
समय बीत गया। जयदेव की भक्ति ने निष्पाप, निःस्पृह, सरल स्वभाव और दयालु बना दिया। इतना दयालु कि अपना अहित करने वाले का भी वे उपकार ही करते। एक बार दो डाकुओं ने उनको मार्ग में घेर लिया। वह एक राजा द्वारा सम्मान पाकर अनिच्छापूर्वक थोड़ा धन लेकर घर लौट रहे थे। उन धन के लोभी डाकुओं ने उनसे धन माँगा। उन्होंने धन दे दिया। फिर भी उन्होंने जयदेव जी के हाथ-पैर बाँध कर एक कुँए में डाल दिया। इसे प्रभु की कृपा ही समझना चाहिए कि उस कुँए में जल नहीं था। जयदेव जी अपने महान् कष्ट से भी विचलित न होकर उच्च स्वर से राधा-माधव का ही भजन-कीर्तन करने लगे। उसी समय उस मार्ग से गौडेश्वर राजा लक्ष्मणसेन की सवारी निकली। उन्होंने कुएँ से आता भगवन्नाम का जप स्वर सुना तो रुक गए। आश्चर्य वश कुएँ में झाँका तो भक्त कवि जयदेव ने अपना परिचय दिया। राजा ने उनकी ख्याति सुन रक्खी थी। उन्होंने अविलम्ब जयदेव जी को ऊपर निकलवाया और अपनी नगरी में लाकर उनका उपचार कराया। उपचार से जयदेव जी को लाभ हुआ। इस घटना में भी उन्होंने प्रभु की विशेष कृपा का दर्शन किया और पहले से भी अधिक प्रेमरस में डूबकर भगवान की आराधना करते रहे। 
कुछ समय गौड़ में रहने के पश्चात् जयदेव जी धर्म-पत्नी पद्मावती के साथ पुनः अपने ग्राम केन्दुबिल्व लौट आए। उन्हें राज वैभव कैसे सुहाता। वे तो अन्तर्मुखी हो गए थे। भगवान के प्रेम में ही निशि-दिन निमग्न रहते, उनकी असीम कृपा को बार-बार स्मरण करते हुए वे पागलों की भाँति अश्रु बहाते रहते। श्रीकृष्ण के प्रेम में डूबकर उन्होंने ‘गीत गोविन्द’ की रचना पर फिर काम आरम्भ किया। उन्हीं दिनों भगवत्कृपा का एक और भी विलक्षण अनुभव हुआ। एक पद रचना करते-करते जयदेव जी बीच में रुक गए। पत्नी से बोलेµ “आगे का पद सूझ नहीं रहा है। मैं स्नान कर आऊँ फिर आकर लिखूँगा।“ पत्नी भोजन तैयार करती रही। पर कुछ ही समय बाद जयदेव लौट आए। पत्नी को आश्चर्य हुआ। उसने पूछाµ “क्या गंगा स्नान कर आए?”
“नहीं, बीच में से ही लौट आया। पद का स्फुरण हुआ, सोचा लिख ही लूँ।” और उन्होंने पद सम्पूर्ण किया। पत्नी से जल माँगकर स्नान किया, पूजा की, प्रभु को प्रसाद लगाया और फिर भोजन भी किया। यह सारा कार्य-व्यवहार ऐसा था, जिसे पद्मावती नित्य ही देखती थी। भोजनोपरान्त जयदेव शैया पर लेट गए। पद्मावती प्रसाद लेने लगी। 
समय और बीता तब किसी ने कुंडी खटखटाई। द्वार खोला तो पद्मावती के पैरों से धरती निकल गई। “अरे आप!” सामने पति जयदेव खड़े थे। हाथ में गंगा जल की लुटिया थी। कंधे पर गीली छोती। “क्या कुछ हुआ है?” पत्नी की व्याकुलता देख उन्होंने पूछा। किंचित घबड़ा कर पद्मावती ने अवरुद्ध कण्ठ से कहाµ “आप तो मार्ग में से लौट आए थे, आकर पद की रचना पूरी की थी आपने। मुझसे जल माँगकर स्नान किया, पूजा की, भोजन किया और पलंग पर विश्राम के लिए लेट गएµ मैं अभी तो आपकी पत्तल से भोजन करने ही बैठी थी.....“ पद्मावती के अश्रु झरने लगे। जयदेव जी जल में चलने वाले जल-अलि की भाँति पलंग की ओर दौड़े, वहाँ कोई न था। वन माला पड़ी थी केवल। जयदेव जी ने उस माला को हृदय और नेत्रों से लगाया। प्रभु-प्रेम में वह बालकों की तरह रो पड़े। वाणी अवरुद्ध हो गई। “भगवान कौतुकी है। फिर कृपा-कौतुक कर गए, छलिया।“ पद-रचना का अवलोकन किया। “पद्मावती! यही पद तो मेरे मन में भी आ रहा था......“ उनकी गद्गद् गिरा से निकला। सभी वह अकाल के  भूखे की तरह प्रभु की उच्छिष्ट पत्तल की ओर दौड़े और प्रेमाश्रु बहाते हुए उसका कण-कण खाने लगे। पद्मावती ने टोकाµ “यह मेरा उच्छिष्ट है, स्वामी।”
“नहीं, मद्मावती! यह तो प्रभु की कृपा का मधुर प्रसाद है।” सचमुच, भगवान और उसके भक्त में क्या कोई अन्तर है?
अब जयदेव के लिए केन्द्रबिल्व में रहन असम्भव हो गया। उनकी भक्ति अब पराकाष्ठा पर थी। प्रभु की कृपा ने उन्हें वृन्दावन धाम की ओर आक£षत किया। पत्नी पद्मावती, निरंजन ब्राह्मण और पुरी यात्रा के साथी पाराशर ब्राह्मण के साथ वे भगवान श्रीकृष्ण चन्द्र की लीलाभूमि वृन्दावन में आ गए। संस्कारवश जब तक शरीर रहा, वे सपत्नीक भगवान आनन्दघन करुणाकर कृष्णचन्द्र की लीलाओं का प्रत्यक्ष दर्शन करते हुए तन्मयता से उन्हीं का गायन करते रहे। 

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