Bhakt Gokaran भक्त गोकर्ण  

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भक्तवत्सल कृपासिंधु जब भक्त पर प्रसन्न होते हैं तो वह जन्म-जन्मान्तरों के घोर कलुषों को धोकर उसका उद्धार कर देते हैं। भगवान तो अमितदानी हैं। हम ही अपने को उनकी कृपा के अनुकूल नहीं बना पाते। प्राचीनकाल में दक्षिण की तुंगभद्रा नदी के तट पर स्थित एक भव्य नगरी में आत्मदेव नाम के सदाचारी ब्राह्मण अपनी भार्या धुन्धुली के साथ निवास करते थे। बाह्मण विद्वान, धनवान था, किन्तु उसकी पत्नी कलहप्रिय थी। उनके घर में वैसे तो किसी बात का अभाव न था, पर सन्तान न होने से वे दोनों बहुत दुःखी रहते थे। ब्राह्मण के चित्त पर इस बात का बहुत क्लेश था। एक दिन वह इसी चिन्ता में निमग्न एक सरोवर के किनारे जाकर बैठ गया। दैवयोग से वहाँ उसे एक संन्यासी महात्मा के दर्शन हुए। सदाचारी ब्राह्मण आत्मदेव ने सोचाµ ‘संत तो कृपा-मू£त होते हैं, अवश्य मेरा दुःख दूर करेंगे।’ उसने संन्यासी के चरणों में प्रणाम किया और अपने संताप का निदान चाहा। महात्मा सिद्ध योगी थे। उन्होंने ध्यान करके बतायाµ “ब्राह्मण! तेरे तो सात जन्मों तक संतति योग नहीं है। तू भगवान का भजन कर, संसार पार कराने वाला उससे उत्तम और कोई साधन नहीं है।” ब्राह्मण कल्याण साधन को बात न सुनकर पुत्रा कामना से ही उद्वेलित हो महात्मा जी वे गिड़गिड़ा कर बोलाµ “महाराज! संत का दर्शन अमोघ होता है। आप में मेरे भाल के कुअंक को मिटाने की शक्ति है। मुझ पर कृपा कीजिए, दीनबन्धु!” आत्मदेव ब्राह्मण के हठ को देखकर संन्यासी महात्मा ने उसे एक फल दिया। उपाय बताते हुए उन्होंने निर्देश किया कि “यह फल अपनी धर्मपत्नी को खिला देना। तुम्हारे एक तेजस्वी भगवद्भक्त पुत्रा होगा। पर पुत्रा-जन्म न होने तक तुम्हारी पत्नी को पवित्राता का जीवन बिताना होगा। केवल एक समय ही भात खा कर वह दान-पुण्य आदि सत्कार्यों में लगी रहे।”
प्रसन्न होकर ब्राह्मण घर लौटा और पत्नी को महात्मा का आदेश बताते हुए फल दे दिया। परन्तु, जो लोग प्रवृत्ति से ही दुष्ट स्वभाव के होते हैं, उन्हें संत-महात्माओं की बातों में विश्वास नहीं होता, वह तो उल्टा ही करते हैं। धुन्धुली ने भी दान-व्रत आदि के झंझट में न पड़ने के विचार से वह फल अपनी गौ को खिला दिया। विधि का विधान तो यही था कि वह संतति-विहीन रहेगी, उन्हीं दिनों उसकी छोटी बहन माता बनने वाली हुई तो धुन्धुली को अपनी संतान देने का आश्वासन दे दिया। सदाचारी पति को धोखे में ही रखकर धुन्धुली अपनी बहन का नवजात शिशु ले आई और उसका नाम धुन्धुकारी रख दिया। सर्वत्रा यह प्रसिद्ध हो गया कि सदाचारी भक्त आत्मदेव के पुत्रा-जन्म हुआ है। धुन्धुकारी के जन्म के तीन मास पश्चात् गौ ने एक विचित्रा बालक को जन्म दिया। उसका सारा शरीर मनुष्य जैसा था, केवल कान गौ के से थे। इस विलक्षण संतान पर आत्मदेव का अधिक स्नेह हुआ और उसका नाम गोकर्ण रख दिया गया। संत कृपा से उत्पन्न उस बालक ने थोड़े ही समय मंे विद्वता प्राप्त कर ली। उसके सदाचार, ज्ञान और ईश्वर-भक्ति से ब्राह्मण आत्मदेव बहुत प्रसन्न था। परन्तु धुन्धुली की ममता तो बहन के पुत्रा पर थी। वह धुन्धुली की छत्रा-छाया में झगड़ालू, दुराचारी, वेश्यागामी, निर्दयी, चोर यानी सब प्रकार से पतित हो गया। धन चुराकर वेश्याओं को लुटा आता और मात-पिता के साथ भी बर्बर व्यवहार करता। आत्मदेव इस पुत्रा से बहुत दुःखी हुए। उन्हें विश्वास तो नहीं होता था कि संत कृपा से ऐसा दुष्ट बालक उनके यहाँ जन्म लेगा, पर विवश थे। उनको दुःखी देखकर गोकर्ण ने उन्हें एक दिन सदुपदेश दिया। आत्मदेव पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि वह घर त्याग कर वन में चले गए। वृद्धावस्था तो थी ही। हरिभक्ति में उन्होंने शेष जीवन व्यतीत कर दिया। 
पिता के परलोकवासी होने पर धुन्धुकारी और भी निरंकुश व उच्छृखंल हो गया। धुन्धुली को भी उसने अत्यधिक पीड़ित किया, तब एक दिन वह अपनी ही कुटिल करनी पर सिर धुनते हुए कुएँ में डूबकर मर गई। गोकर्ण ने माता-पिता के देहावसान और घर की सम्पूर्ण सम्पत्ति के नाश में भगवत्कृपा का ही स्वरूप देखा और वह तीर्थाटन पर निकल गए। उनकी बुद्धि में समत्वभाव का पूर्ण उद्रेक हुआ था। धुन्धुकारी की वही गति हुई जो एक कामान्ध पुरुष की होती है। पाँच वेश्याओं सहित वह घर में रहने लगा। सारी मर्यादाएँ तोड़कर वह अत्यन्त स्वच्छन्द और कामुक हो गया। सारा धन नष्ट होने पर एक दिन वेश्याआंे ने उसे कुचक्र करके मार डाला और उसका शव गड्ढ़े में दबा दिया। धुन्धुकारी ने प्रेम योनि प्राप्त की और वह घर में रहकर नाना प्रकार के उत्पात मचाने लगा। उसकी मृत्यु के समय गोकर्ण विदेश में ही थे। उन्होंने गया जाकर भाई का पिण्डदान कर दिया। कालान्तर में जब वह घर लौटे तो उन्होंने प्रेत का उत्पात अनुभव किया। संत हृदय गोकर्ण ने प्रेत का विलाप तो सुना, पर वह बोल नहीं सकता था। अतः उन्होंने एक अंजुलि में जल लिया और मंत्रा पाठ करके यह जल उस कोने में छिड़क दिया जिधर से करुण क्रन्दन का स्वर आ रहा था। मंत्रायुक्त जल के प्रभाव से प्रेत बोलने लगा। तब गोकर्ण ने सहानुभूति के स्वर में उससे उसकी दशा का कारण पूछा। वह प्रेत धुन्धुकारी का ही था। उसने अपनी सारी पापमयी करनी सुना दी और फिर गिड़गिड़ा कर बोलाµ “मेरा उद्धार करें! मुझे महान् कष्ट है....” उसे उद्धार का आश्वासन देकर गोकर्ण ने उस समय तो उसे भेज दिया। बाद में गोकर्ण ने विद्वानों से परामर्श किया। उन्हें धुन्धुकारी का कष्ट निवारण करने की चिन्ता लग गई थी। दूसरे के दुःख से दुःखी होना ही तो संत का लक्षण है। गोकर्ण ने विद्वानों की सम्पत्ति से सूर्यनारायण जी से धुन्धुकारी की मुक्ति का उपाय पूछने का निश्चय किया। मंत्रा शक्ति से यह भी सम्भव हो गया। सूर्यनारायण ने उसकी स्तुति से प्रसन्न होकर कहाµ “वत्स! इसके समक्ष सात दिन तक ‘श्रीमद्भागवत’ का पाठ करो। इसकी मुक्ति का यही उपाय है।” गोकर्ण ने कृतज्ञताा से सूर्य-नारायण को नमस्कार किया और शीघ्र ही श्रीमद्भागवत के परायण में प्रवृत्त हो गया। 
कथा मण्डप में उन्होंने धुन्धुकारी के प्रेम को भी मंत्रा शक्ति से बुला लिया। वह अपने वायु शरीर से कथा मण्डप के एक बाँस में प्रविष्ट होकर बैठ गया। प्रथम दिवस की कथा समाप्त होने पर बाँस की एक गांठ बड़ी कर्कश आवाज के साथ टूट गई। इस प्रकार प्रत्येक दिवस के परायण के पश्चात् एक-एक गाँठ टूटती गई। सातवें दिन धुन्धुकारी सबके देखते-देखते दिव्य रूप में प्रकट हुआ। उसके गले में तुलसी की माला थी, शीश पर मुकुट था, कानों में कुण्डल थे, शरीर श्याम वर्ण था और वह पीताम्बर से आभूषित था। हाथ जोड़कर उसने गोकर्ण से कहाµ “भाई, तुमने मुझ पर बड़ी दया की है। मैं विमान पर चढ़कर विष्णु जी के पार्षदों के साथ परमधाम को जा रहा हूँ। तुम्हारी कृपा तो वास्तव में अमोघ सिद्ध हुई भाई।” धुन्धुकारी की यह सद्गति देखकर गोकर्ण सहित सभी उपस्थित समुदाय भगवत्कृपा से प्रेम विह्नल हो उठा। 
कुछ काल बीतने पर श्रावण मास आया। तब गोकर्ण जी ने विष्णु भगवान का सामीप्य पाने के लिए पुनः श्रीमद्भागवत का सप्ताह किया। उनकी भक्ति-श्रद्धा और अनन्यता के प्रभाव से सभी ग्रामवासी भक्ति की त्रिवेणी में स्नान कर रहे थे। सात दिन पश्चात् श्रीमद्भागवत का परायण समाप्त हुआ। तब अलौकिक घटना घटी। स्वयं विष्णु भगवान् अपने पार्षदों सहित वहाँ प्रकट हुए। उन्होंने अपना शंख पा×चजन्य बजाया और गोकर्ण जी पर पुष्प वर्षा करते हुए उन्हें सभी ग्रामवासियों सहित दिव्यरूप प्रदान कर गो-लोक में ले गए। भक्ति की ऐसी ही महिमा है। पहले तो भक्त-हृदय ने अपने भाई का अकल्पनीय घोर दुःख दूर कर उसे प्रेत योनि से मुक्त कराया और फिर उनकी निष्काम-भक्ति-उपासना से स्वयं उनके सहित अनेक जीवों पर अमित भगवत्कृपा हो गई। 

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