Gangadhar Bhakt भक्त गंगाधर दास   

अगाध कृपा के धनी
भगवान् को जिस सम्बन्ध, भाव, रूप, प्रकार आदि से स्मरण किया जाता है, वे उसी नाते को मान कर भक्त के समीप उपस्थित होकर अमित कृपा करते हैं। देवकी मैया के वे पुत्रा बन गए, अर्जुन के सखा बन गए, इसी प्रकार कौशल्या-दशरथ के सुतरूप में प्रकट हुए, हनुमान जी ने स्वामी रूप में उनकी उपासना की। वैर भाव से स्मरण करने वाले रावणादि ने भी उनकी कृपा के प्रसाद से परमधाम प्राप्त किया। इस युग मं भी भगवान् ने अपने भक्त गंगाधर दास पर ऐसी ही कृपा की थी। गंगाधरदास राजा प्रताप रुद्र के समय में पुरुषोत्तम क्षेत्रा के एक ग्राम गोविन्दपुर के निवासी थे। वे और उनकी धर्मपत्नी श्रिया जी, दोनों ही भगवान् के अनन्य उपासक थे। दिन-रात भगवान् का नाम स्मरण-जप करते सन्तोषपूर्ण दिन काट रहे थे। परन्तु वृद्धावस्था ने आकर द्वार खटखटाया तो श्रिया जी को थोड़ी लौकिक चिन्ता हुई, वे निःसंतान थीं। दूसरों के बच्चों को देखकर ही वह प्रसन्न होतीं, उनका लाड़-दुलार भी मातृवत् ही करतीं पर ग्राम की अन्य पुत्रावती युवतियाँ श्रेष्ठता के अभिमान से उन्हें तरह-तरह के ताने दिया करती थीं। कभी-कभी न चाहते हुए भी किसी की कर्णकटु वाणी सरल-हृदय को बेध जाती है। ऐसे ही एक अवसर पर श्रिया जी अत्यन्त विकल होकर अपने पति से कहने लगींµ “आप किसी दरिद्र बालक को ही गोद ले लीजिए, अथवा किसी बालक का यज्ञोपवीत और विवाह करा दीजिए... कुछ तो इस वृद्धावस्था में मन को सन्तोष हो।” गंगाधरदास जी ने भार्या को समझाया कि सच्चा सन्तोष तो हरि भजन में ही है। संतान होने से संसार की मोह-माया में ही फँसना पड़ता है। परन्तु वह साध्वी इस सत्परामर्श से सन्तुष्ट नहीं हुई। तब गंगाधरदास जी पत्नी को सांत्वना देकर हाट चले गए। घर लौटे तो उनकी गोद में भगवान् का एक अत्यन्त सुन्दर अर्चा विग्रह था। वह उसे एक शिशु के समान ही सार-सम्भाल के साथ गोद में ला रहे थे। 
उनकी मुख मुद्रा पर ऐसी ही प्रसन्नता थी जैसे वह अपने ही आत्मज को कहीं से ढूँढ़ लाए हों। घर आकर पत्नी से बोलेµ “लो, यह हमारा पुत्रा है। इसकी सेवा में अब किसी प्रकार की कोई कसर न रखना। यही हमारी बुढ़ापे की लाठी होगा। इसी से हमारा कल्याण होगा। पुत्रा जैसे पिता-माता की सारी कामनाएँ पूर्ण करता है, वैसे ही यह बालक हमारी समस्त कामनाओं को पूर्ण करेगा, यहाँ तक कि परलोक में भी हमारा साथ नहीं छोड़ने का, देवी!” कैसा आत्म-विश्वास! कैसी प्रसन्नता? कैसा पुत्रावत् स्नेह! कैसा उदार वात्सल्य। उस भक्त दम्पति ने सुन्दर सिंहासन पर अपने लाल को विराजमान किया। अपने शरीर से अधिक उसकी सुविधा का ध्यान रखते। उत्तम-से-उत्तम वस्त्रा अ£पत करते। समय से निद्रा कराते, पंखा डुलाते, उष्ण जल से स्नान कराते, ग्राम में कोई खिलौने बिकने आते तो दौड़कर अपने लला के लिए खिलौने खरीदते। श्रिया जी कभी उन्हें गोद में बैठातीं, कभी प्यार से चुम्बन लेतीं, कभी स्तनपान कराने का ‘अभिनय’ भी करातीं। उनकी प्रसन्नता सम्भवतः कोख से जन्मा बालक पाकर भी इस सीमा को नहीं छू पाती। चैबीस घन्टे लाला के ही चिन्तन और सुख पहुँचाने में वे पति-पत्नी अपने को धन्य मानने लगे। कुछ समय बाद गंगाधर दास अपने व्यवसाय के लिए ग्राम से बाहर गए। पर लाला का वियोग उनसे सहन नहीं हुआ। वे शीघ्र ही अपूर्व फल, मिठाई, और रेशमी वस्त्रा लेकर गोविन्दपुर लौट चले। मुख पर कृष्ण नाम था और पैरों में उतावली। दैवयोग से वह ग्राम में पहुँचते-पहुँचते ठोकर खाकर गिर पड़े और कृष्णनाम जपते-जपते परलोकवासी हो गए। ग्रामवासियों ने करुणावश यह समाचार श्रिया जी को सुनाया। वह शोकातुर हो अपने पुत्रा के आगे जाकर रोने लगींµ “तू ही बता बेटा, अब मैं क्या करूँ? हे, वंशीधर! तू तो हमारा बुढ़ापे का सहारा बना था। तूने हमारी रक्षा का भार अपने पर लिया और तेरे ही पिता यांे मार्ग में गिरकर स्वर्ग सिधार गए....” उसकी करुण पुकार से वह वात्सल्य के भूखे कृपानिधि बोल उठेµ ”अरी मैया! तू क्यों विलाप करे है? मेरा बाबा तो थक के सोय रह्यो है। जा तो, न् वाय अभाल जगा कै लै आ।....” श्रिया यह दिव्य वाणी सुनकर आश्वस्त हुई। वह दौड़ी-दौड़ी पति के पास पहुँची। साध्वीनारी की तरह ही उसने चरण-स्पर्श कर उन्हें उठाया। भगवत्कृपा से गंगाधर दास अपने लाला श्रीकृष्ण का नामोच्चार करते हुए उठ बैठे। घर आकर दोनों पति-पत्नी अपने लाला से और भी अधिक लाड़ लड़ाने लगे। परन्तु, यह संसारी जीव कभी-कभी भूलवश घर में धन-धान्य की वृद्धि को ही भगवत्कृपा मान बैठता है। ऐसी ही मोह-माया में फँसकर एक दिन गंगाधर दास अपने लाल से कहने लगाµ “ओ, कृष्ण भैया! तेरा एक क्षर का भी वियोग मुझसे अब सहन नहीं होता। फिर भी यह पेट बड़ा पापी है। इसके लिए कभी-कभी व्यापार के चक्कर में तुमसे दूर जाना ही पड़ता है।....” प्रभु की इच्छा-अनिच्छा की चिन्ता न कर गंगाधर दास ने घर से जाने की तैयारी की। भगवान ने देखा, भक्त मेरा वियोग सहन नहीं करने की बात बनाकर उल्टे मुझे वियोग में डालकर जा रहा है बस वह अन्तर्धान हो गए। जाते हुए गंगाधर से बोलेµ “पिता जी, आप चिन्ता न करें। आपका घर धन-धान्य से भर जाएगा। मेरे जैसा जिसका पुत्रा हो उसे अभाव नहीं सता सकते।...” भगवान की वाणी अमोघ होती है। गंगाधर दास के घर में सब कुछ हो गया, पर सिंहासन तत्काल सूना हो गया। अब तो दम्पत्ति की बुद्धि ठिकाने आ गई। कृष्ण-वियोग की असह्य वेदना से वे तड़पने लगे। “हा वत्स! तेरे बिना यह जीवन व्यर्थ है। तनिक से लोभ ने मुझे प्राणप्यारे से विलग कर दिया। हा कृष्ण! तुम कहाँ गए, बेटा...” विलाप का अन्त ही नहीं हो रहा था। ओठों से कृष्ण नाम की झड़ी लग गई और आँखों से प्रेमाश्रुओं की झड़ी। गंगाधर दास ने अपने प्यारे ‘लाला’ के वियोग में प्राण त्याग दिए। 
प्रातःकाल पति-परायणा श्रिया देवी ने घर की सारी सामग्री दान कर दी और चिता बनाकर पति के शव के साथ ही ‘कृष्ण-कृष्ण’ उच्चारण करते हुए परम शान्त भाव से सती हो गई। प्रसिद्ध है, वहाँ उपस्थित ग्रामवासियों ने एक दिव्य प्रकाश देखा और चिता से निकली दो दिव्य ज्योति-धाराएँ उस महान् ज्योति में विलीन हो गईं। श्रीमन्नारायण स्वयं विमान पर पधारे और अपने प्रति वात्सल्य भाव रखने वाले भक्त-दम्पत्ति को अपने परमधाम में ले गए। कैसी असीम कृपा! अनन्त कृपा!!  अगाध कृपा!!!

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