#

#

ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम्। विश्वस्य एक परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वा अमृता भवन्ति ॥ 7 ॥            You are the Supreme Brahman, infinite, yet hidden in the hearts of all creatures. You pervade everything. They, who know You, are free from the cycle of birth, death and rebirth. (Svetasvatara 3 : 7)            परमात्मा सब प्रकार से सब काल में मुक्त और शुद्ध है। वह अपरिमित और अनन्त होते हुए भी सभी प्राणियों के हृदय में छिपा हुआ है। परमात्मा को जानने वाले व्यक्ति ही जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।

अज़ छि ज़्येठॖ ॴठम 30.05.2020 ज़्येठॖ (जेष्ठ) ज़ूनॖ पछॖ (शुक्ल पक्ष) ॴठम (अष्टमी) बटॖवार (शनिवार/शनिश्चरवार) श्री सप्तर्षि सम्वत 5096, राश सिंह (चलान) ....Today is Jyesth Maas Shukla Paksh Ashtamiyaam Shanivsasre sanayitaam. Kashmiri Pandit Nirvasan Samvat_31 Sapthrishi Samvat _5096
professional logo

भक्त श्रीएकनाथजी


भक्तश्रेष्ठ एकनाथ जी का जन्म सं॰ 1590 वि॰ के लगभग हुआ था। इनके पिता सूर्यनारायण बड़े मेधावी तथा माता रुक्मिणी बड़ी पतिव्रता और सुशीला थीं। पर दैवयोग से इनके जन्म के कुछ समय पश्चात् ही माता-पिता दोनों का देहावसान हो गया। एकनाथ जी का लालन-पालन अब पितामह चक्रपाणि जी के कंधों पर आ गया। वह भी बड़े पण्डित और भजन-पूजा में लीन रहने वाले पुरुष थे। चक्रपाणि  भक्तश्रेष्ठ भानुदासजी के पुत्रा थे। वह भी बड़े पण्डित और भजन-पूजा में लीन रहने वाले पुरुष थे। 
    चक्रपाणि  सद्गुणों की छाया में बालक एकनाथ अनायास ही श्रद्धा की पगडण्डियों पर चलने लगा। एकनाथ बचपन से ही बड़े बुद्धिमान्, श्रद्धावान् और भजनान्दी थे। पितामह ने छः वर्ष की आयु में एकनाथ जी का यज्ञोपवीत कराया और भागवत, महाराज, रामायण व छन्द-शास्त्रा, पुराणों आदि की शिक्षा की सगुचित व्यवस्था कर दी। घर में भगवद्  अर्चना-पूजा, भजन, नाम-स्मरण का शान्तिदायक वातावरण था ही। एकनाथ के लिए यह सब सोने में सुहागा सिद्ध हुआ। वह एकान्त में एक शिवालय में कई-कई घंटे ध्यान करने लगे। ऐसी ही अनुकूलता में आयु के बारह वर्ष बीत गए। बारह वर्ष की अवस्था में इनके अंदर ऐसी भगवत्प्रीति जागी कि भगवान् से मिलाने वाले सद्गुरु के लिये ये व्याकुल हो उठे।
    इसी स्थिति में, रात के चैथे पहर किसी शिवालय में बैठे ये हरिगुण गा रहे थे, शिवजी ने इनकी पुकार सुन ली। तब इन्हें एक आकाशवाणी सुनायी पड़ी- ‘ “वत्स, तुम देवगढ़ जाओ। वहाँ जनार्दन पंत के दर्शन करो; वे तुम्हें कृतार्थ करेंगे। जनार्दन पंत ही तुम्हारे सद्गुरु हैं। ’ बस, ये बिना किसी से कुछ कहे-सुन चल दिये। दो दिन और दो रात का रास्ता तै करके तीसरे दिन प्रातःकाल देवगढ़ पहुँचे। वहाँ इन्हें श्रीजनार्दन पंत के दर्शन हुए। इन्होंने उनके चरण पकड़ लिये। यह गुरु-शिष्य संयोग सं॰ 1602 वि॰ में हुआ।
एकनाथजी छः वर्ष गुरु की सेवा में रहे। गुरुकाल में गुरु से पहले सोकर उठते थे और गुरु की निद्रा लग जाने के बाद सोते थे। गुरु जब स्नान करने के लिये उठते, तब ये पात्रा में जल भर देते थे, धोती चुनकर हाथ में देते, पूजा की सब सामग्री पहले से ही जुटाकर रखते; जब तक पूजा होती, तब तक पास ही बैठे रहते; जब जो वस्तु आवश्यक होती, उसे आगे कर देते; गुरु भोजन कर लेते, तब उन्हें पान लगाकर देते और जब विश्राम करने लगते, तब ये पैर दबाते। इस प्रकार गुरु-सेवा को इन्होंने परम धर्म जानकर उसका भली-भाँति पालन किया। एकनाथ की गुरु-सेवा भी आदर्श थी। उनकी प्रत्येक सुविधा का ध्यान रखने में वह अपने शरीर को भी भूल जाते थे। 

    जनार्दन स्वामी ने कुछ दिनों तक एकनाथ जी को हिसाब-किताब का काम सौंप रखा था। एक दिन इन्हें एक पाई का हिसाब नहीं मिला। इसलिये रात को गुरु सेवा से निवृत्त होकर ये बही-खाता लेकर बैठ गये। तीन पहर तक हिसाब जाँचते रहे। आखिर जब भूल मिली, तब इन्होंने बड़ी प्रसन्नता से ताली बजायी। स्वामी जी उस समय सोकर उठे थे। उन्होंने झरोखे से झाँककर देखा और पूछा कि ‘एकनाथ! आज यह कैसी प्रसन्नता है?’ एकनाथजी ने बड़ी नम्रता से पाई की भूल का हाल बतलाया। गुरुजी ने कहाµ ‘एक पाई की भूल का पता लगाने से जब तुम्हें इतना आनन्द मिल रहा है, तब इस संसार में आने की बड़ी भारी भूल जो तुमसे हुई है, उसका पता लग जाने पर तुम कितने आनन्दित होगे ! इसी प्रकार यदि तुम भगवान् के चिन्तन में लग जाओगे, तो भगवान् भी तो कहीं दूर थोड़े ही है इस बात का पता तुम्हें चल जायेगा ।’ एकनाथजी ने इसे गुरु का आशीर्वाद जाना और कृतज्ञता से उनके चरणों में मस्तक रख दिया। इसके कुछ ही दिनों बाद श्रीएकनाथजी को श्रीदत्तात्रोयभगवान् का साक्षात्कार हुआ। एकानाथी ने देखाµ श्रीगुरु ही दत्तात्रोय हैं और श्रीदत्तात्रोय ही गुरु हैं। इसके पश्चात् एकनाथजी को श्रीदत्तात्रोय भगवान् चाहे जब दर्शन देने लगे। इस 
एक बार एकनाथ जी ने हिसाब-किताब में एक पाई की भूल को जब तीन पहर के परिश्रम के बाद ढँूढ निकाला तो इन्हें अपार हर्ष और वह भावोन्मेष में ताली बजाकर पुलकित हुए। गुरु ने इनकी यह क्रिया देख ली। एकनाथ को उपदेश करते हुए वह बोले- “एक पाई की भूल का पता लगाकर तुम कितने आनन्दित हुए हो, यदि संसार में आने की भूल का पता लग जाए तो तुम्हारा आनन्द किस सीमा तक विशेष होगा, जानते हो? इसी प्रकार भगवान श्रीकृष्ण के चिन्तन में लग जाओगे, तो वह कहीं दूर थोड़ी हैं?” एकनाथ जी ने कृतज्ञता से गुरु के चरणों पर मस्तक रख दिया। भगवद् चिन्तन, अब तत्परता से आरम्भ हो गया। तभी कुछ समय पश्चात् इन्हें भगवान दत्ताश्रेय ने साक्षात्कार दिया। गुरु जनार्दन पंत और भगवान दत्तात्रोय में इन्होंने अभेद का दर्शन किया। इस सगुण साक्षात्कार के फलस्वरूप तो एकनाथ का भगवद्-भक्ति में ऐसा दृढ़ अनुराग हुआ जिसे शब्दों में अंकित नहीं किया जा सकता। गुरु बहुत प्रसन्न थे। इस सगुण-साक्षात्कार के अनन्तर श्रीगुरु ने एकनाथजी को श्रीकृष्णोपासना की दीक्षा देकर शूलभंजन पर्वत पर रहकर तप करने की आज्ञा दी।यही तुम्हारा अन्तिम अभीष्ट है।” 
एकनाथ जी उस पर्वत पर चले गये और वहाँ उन्होंने घोर तपस्या की। तप पूरा होने पर वे फिर गुरु के समीप लौटे। इसके बाद श्रीगुरु ने उन्हें संत-समागम और भागवत-धर्म का प्रचार करने के लिये तीर्थयात्रा करने की आज्ञा दी और स्वयं भी नासिक-त्रयम्बकेश्वर तक उनके साथ गये। इसी यात्रा में एकनाथ जी ने चतुःश्लोकी भागवत पर ओवी छन्द में एक ग्रन्थ लिखा, जिसको पहले-पहल उन्होंने पंचवटी पहुँचकर श्रीरामचन्द्र जी के सामने गुरु श्रीजनार्दनस्वामी को सुनाया।
कुछ समय बीतने के बाद तीर्थयात्रा नि£वघ्न समाप्त कर जब एकनाथ जी पैठण लौटे आये, परंतु अपने घर न जाकर पिप्पलेश्वर महादेव के मन्दिर में ठहर गये। उसी मन्दिर में जाकर भगवद् चरणों में नतमस्तक हुए जहा गुरु जनार्दन पंत के समीप जाने की आकाशवाणी हुई थी। वृद्ध दादा-दादी वर्षों से अपने संत पौत्रा की प्रतीक्षा में आयु का अन्तिम पड़ाव पार कर रहे थे। उनकी अभिलाषा पौत्रा का विवाह देखने की थी और इस दृष्टि से उन्होंने एकनाथ के लिए गुरु जनार्दन पंत का आज्ञा-पत्रा ‘एकनाथ! अब तुम विवाह करके गृहस्थाश्रम में रहो।’ लेकर अपना काम पक्का कर लिया था। इस पर एकनाथजी ने वहीं अपनी तीर्थयात्रा समाप्त कर दी। गुरुजनों और बड़ों की आज्ञा मानना व उनकी सेवा करना शास्त्रों में भक्ति पंथ का प्रथम सोपान कहा गया है। गुरुदेव की आज्ञानुसार इनका विवाह हुआ। इनकी धर्मपत्नी गिरिजाबाई बड़ी पतिपरायणा, परम सती और आदर्श गृहिणी थीं और इस कारण इनका सारा प्रपंच भी परमार्थ परायण ही हुआ। 
    तीनों समय गोदावरी तट पर संध्या करना, शेष समय भगवद्-चिंतन, भजन, कीर्तन, पूजा में व्यतीत करना, अन्न कोष की तनिक भी चिन्ता न कर नित्य सदाव्रत बाँटना और गीतोक्त क्षमा, दान, मैत्राी, निःसंगता का जीवन बितानाµयही एकनाथ जी की दिनचर्या थी। इनके यहाँ सदावर्त चलता रहता था। सबको अन्न बाँटा जाता था। रात को जब ये कीर्तन करने लगते थे, उस समय दूर-दूर के लोग इनके यहाँ आते थे, जिनमें अधिकांश ऐसे ही श्रोता होते थे, जो इन्हीं के यहाँ भोजन पाते थे। नित्य नये अतिथि आया ही करते थे। इस प्रकार यद्यपि एकनाथजी के यहाँ बड़ी भीड़-भाड़ रहती थी, फिर भी इनका सारा काम मजे में चलता था। इन्हें कभी कोई चिन्ता नहीं करनी पड़ती थी। अन्न-दान और ज्ञान-दान का प्रवाह इनके यहाँ निरन्तर बहा ही करता था। क्षमा, शान्ति, समता, भूतदया, निरहंकारता, निस्संगता, भक्तिपरायणता आदि समस्त दैवी सम्पत्तियों के निधान श्रीएकनाथ महाराज के दर्शनमात्रा से असंख्य स्त्राी-पुरुषों के पाप-ताप-संताप नित्य निवारित होते थे। इनके परोपकारमय निःस्पृह साधुजीवन की अनेकों ऐसी घटनाएँ हैं, जिनसे इनके विविध दैवीगुण प्रकट होते हैं। इनके जीवन की कुछ विशेष घटनाओं का उल्लेख यहाँ किया जाता है
 एकनाथ महाराज नित्य गोदावरी स्नान के लिये जाया करते थे। रास्तें में एक सराय थी, वहाँ एक यवन रहा करता था। यह उस रास्ते से आने-जाने वाले लोगोें को बहुत तंग किया करता था। परपीड़न में ही उसको संतोष होता था। एकनाथ महाराज को भी इसने बहुत तंग किया। एकनाथ जी को कष्ट पहुँचाने के अभिप्राय से उसने एक बार उन पर कुल्ला कर दिया और खिलखिला कर हँस पड़ा। एकनाथ जी उल्टे पैरों फिर गोदावरी गए और स्नान करके लौट आए।एकनाथ महाराज जब स्नान करके लौटते, तब यह उन पर कुल्ला कर देता। एकनाथ महाराज नदी को लौटकर स्नान कर आते। वह फिर उन पर कुल्ला करता। इस तरह दिन में पाँच-पाँच बार इन्हें स्नान करना पड़ता। एक दिन तो इस अत्याचार की सीमा हो गयी। एक सौ आठ बार उस यवन ने इन पर पानी से कुल्ला किया और एक सौ आठ बार ये स्नान कर आये। लौकिक क्रिया में तो स्नान उन्होंने किया, परन्तु हृदय-निर्मल हुआ यवन का। एकनाथ जी की शान्ति और प्रसन्नता ज्यों-की-त्यों बनी रही! यह देखकर वह यवन अपने किये पर बड़ा लज्जित हुआ और महाराज केे चरणों में आ गिरा। एकनाथ जी की कृपा से वह अपना स्वभाव बदल कर भगवद्परायण हो गया। तब से उसका जीवन ही बदल गया। 

एकनाथ महाराज के पिता का एक दिन श्राद्ध था। रसोई तैयार हुई, आमन्त्रिात ब्राह्मणों की प्रतीक्षा में आप द्वार पर खड़े थे। उधर से चार-पाँच महार (मृत पशुओं का चमड़ा उतारने वाल) परस्पर यह कह रहे थे- “कैसी बढ़िया सुगन्ध आ रही है। मिठाई की सुन्दर गन्ध जो बाहर निकल रही थी।   भूख न हो तो भूख लग जाय! पर ऐसा भोजन हम लोगों के भाग्य में कहाँ।’ एकनाथ महाराज ने यह बात सुन ली एकनाथ जी ने सोचा की भूखे को अन्नदान देने से बढ़कर ऐसा कोई कार्य नहीं जिससे भगवान श्रीकृष्ण प्रसन्न होते हैं और उन्होंने महार लोगों को सादर घर में आमंत्रित किया और बड़ी श्रद्धापूर्वक उन्हें पिता के श्राद्ध की सामग्री अ£पत की और जो कुछ बचा, वह भी गिरिजाबाई ने इन महारों के घरवालों को बुलाकर खिला दिया।फिर स्थान को भली-भाँति धो-लीपकर ब्राह्मणों के लिये दूसरी रसोई बनायी गयी। पर निमन्त्रिात ब्राह्मणों को जब यह बात मालूम हुई, तब उनके क्रोध का पार नहीं रहा। उन्होंने एकनाथ जी को धर्मभ्रष्ट समझकर बहुत अंट-संट सुनाया और फटकार कर कहाµ ‘तुम्हारे-जैसे पतित के यहाँ हमलोग भोजन नहीं करंेगे।’ एकनाथजी ने विनयपूर्वक समझाया कि ‘आपलोग भोजन कीजिये, सब शुद्धि करके नयी रसोई बनी है’ पर ब्राह्मण नहीं माने। उन्हें चर्म-चक्षुओं से भगवान का वह दिव्य स्वरूप कैसे दिखाई देता, जो एकनाथ जी को सुलभ था? एकनाथ जी ने इसमें भी भगवत्कृपा का दर्शन किया। तब उन्होनें यथाविधि श्राद्ध का संकल्प करके एकनाथ जी ने पितरों का ध्यान और आवाहन किया। स्वयं पितर मू£तमान् होकर प्रकट हो गये। उन्होंने स्वयं श्राद्धान्न ग्रहण किया और परितृप्त होकर आशीर्वाद देकर अन्तर्धान हो गये। जिस पर भगवान का अनुग्रह हो उसके लिए कुछ भी असम्भव नहीं है। वस्तुतः उसकी प्रत्येक क्रिया और आचरण भक्ति का ही अंग होते हैं। वह जो कर्म करता है, वही धर्म होता है। समदर्शी भगवद् परायण भक्त हठध£मयों के दुराग्रह से बहुत दूर होता है और बहुत ऊँचा। एकनाथ जी तो भक्ति की उस भूमिका में थे जहाँ सब कुछ ही प्रभुमय दिखाई देता है। ब्राह्मणों को जब इस बात का पता लगा, तब वे बहुत लज्जित हुए। 

एक बार आधी रात के समय चार प्रवासी ब्राह्मण पैठण में आये और आश्रय ढूँढ़ते-ढूँढ़ते एकनाथ जी के घर पहुँचे। एकनाथजी ने उनका स्वागत किया। मालूम हुआ कि प्रवासी ब्राह्मण भूखे हैं। उनके लिये रसोई बनाने को गिरिजाबाई तैयार हुईं, पर इधर कुछ दिनों से लगातार मूसलाधार वृष्टि होने से घर में सूखा ईंधन नाममात्रा को भी नहीं रह गया था। इतनी रात में अब लकड़ी कहाँ से आये? एकनाथजी ने अपने पलंग की निवार खोल दी और पावा-पाटी तोड़कर लकड़ी तैयार कर दी। पैर धोने के लिये ब्राह्मणों को गरम पानी दिया गया, तापने के लिये अँगीठियाँ दी गयीं और यथेष्ट भोजन कराया गया। ब्राह्मण तृप्त हुए और एकनाथजी को धन्य-धन्य कहने लगे। 

एक अवसर पर एकनाथजी काशी से काँवर में गंगाजल लेकर रामेश्वरनाथ जी के दर्शन-लाभ के लिए अत्यन्त निष्ठा और भक्ति के साथ जा रहे थे, उस समय लगता था जैसे एक-एक पग पर अश्वमेघ यज्ञ कर रहे हों। मार्ग में एक मरुस्थल से गुज़रता था। उस मरुस्थल में दूर-दूर तक न किसी पक्षी या किसी पशु का तो कोई निशान तक नहीं था। वहाँ पर तो न कहीं तृण था और न कहीं फल। ऐसे विकट मार्ग में चलते-चलते उन्हें सहसा एक गधा रेत में पड़ा छट-पटाता हुआ दृष्टिगत हुआ। वस्तुतः उसके प्राण कण्ठगत थे। मृत्यु निकट थी। जल के अभाव में उसका मुँह फट गया था, लम्बी जिह्ना बाहर आ गई थी। पैरों को वह बारम्बार रेत में पटक-पटक कर रगड़ रहा था। एकनाथ जी का संत-हृदय द्रवित हो आया। उनसे एक जीव का इस प्रकार तड़पना देखा नहीं गया। उन्होंने बिना किसी विलम्ब के अपनी काँवर का गंगाजल बड़े दुलार से गधे को पिला दिया। देखते-देखते गधा दोनों घड़ों का जल पी गया। एकनाथ जी ने उसके मुँह पर प्रेम से हाथ फेरा। गधा प्रभु कृपा से उठ बैठा। उसमें प्राणों का नव-संचार हो आया और वह दौड़कर आँखों से ओझल हो गया। एकनाथजी के संगी और आश्रित उद्धवादि लोग प्रयाग के गंगाजल का ऐसा उपयोग होते देख बहुत दुःखी हुए। सह-यात्रियों की त्योरियाँ चढ़ी देखकर एकनाथजी ने  उन्हें समझाया कि ‘भलेमानसो! बार-बार सुनते हो कि भगवान् घट-घटवासी हैं और फिर भी ऐसे बावले बनते हो? समय पर जो काम न दे, ऐसा ज्ञान किस काम का? बंधुओं मेरी काँवर का जल श्री रामेश्वरनाथ जी ने ही ग्रहण किया है।”

© 2018 - All Rights Reserved