Dhaku Bhakt डाकू भगत 

पुराने जमाने की बात है। एक धनी गृहस्थ के घर भगवत कथा का बड़ा सुन्दर आयोजन हो रहा था। वैशाख का महीना, शुक्लपक्ष की रात्रि का समय। अतिथि-अभ्यागतों की सुख-सुविधा के लिये सब प्रकार का प्रबन्ध किया गया था। जूही, बेला, मौलसिरी आदि सुगन्धित पुष्पों की सौरभ से दिशाएँ सुवासित हो रही थीं। भगवान् के नैवेद्य के लिये आम, अंगूर, अनार, सेब आदि फल तराशे जा रहे थे। सारी सामग्री तैयारी हो जाने पर विधिपूर्वक भगवान् की पूजा सम्पन्न हुई। भगवान् की मनोहर मू£त के दर्शन, भगवत्कथा के श्रवण, सुगन्धित पुष्पों के आघ्राण और शान्तिमय वातावरण के प्रभाव से सभी उपस्थित सज्जन लोकोत्तर आनन्द का आस्वादन करने लगे। सब लोग इस पवित्रा उत्सव-कार्य में इतने संलग्न और तन्मय हो गये कि उन्हें समय का कुछ ध्यान ही न रहा।
    कथावाचक पण्डित जी विद्वान् तो थे ही, अच्छे गायक भी थे। वे बीच-बीच में भगवत्सम्बन्धी भावपूर्ण पदों का मधुर कण्ठ से गान भी करते। पहले उन्होंने श्रीमद्भागवत के आधार पर संक्षेप में भगवान् के जन्म की कथा सुनायी।
    कथा का प्रसंग आगे चला। श्रोतागण व्यवहार की चिन्ता और शरीर की सुधि भूलकर भगवदानन्द में मस्त हो गये। बहुतों के शरीर में रोमांच हो आया। कितनों की आँखों में आँसू छलक आये। सभी तन्मय हो रहे थे।
उसी समय सुयोग देखकर एक डाकू उस धनी गृहस्थ के घर में घुस आया और चुपचाप धन-रत्न ढूँढ़ने लगा। परंतु भगवान् की ऐसी लीला कि बहुत प्रयास करने पर भी उसके हाथ कुछ नहीं लगा। वह जिस समय कुछ-न-कुछ हाथ लगाने के लिये इधर-उधर ढूँढ़ रहा था, उसी समय उसका ध्यान यकायक कथा की ओर चला गया। कथावाचक पण्डितजी महाराज ऊँचे स्वर से कह रहे थेµ ‘प्रातःकाल हुआ। पूर्वदिशा उषा की मनोरम ज्योति और अरुण की लालिमा से रंग गयी। उस समय व्रज की झाँकी अलौकिक हो रही थी। वहाँ का पत्ता-पत्ता चमक रहा था। पक्षिगण मानो इसलिये और भी जोर-जोर से चहक रहे थे कि श्रीकृष्ण शीघ्र-से-शीघ्र आकर उनके नेत्रों की प्यास बुझावें। गौएँ और बछड़े सिर उठा-उठाकर नन्दबाबा के महल की ओर सतृष्ण दृष्टि से देख रहे थे कि अब हमारे प्यारे श्रीकृष्ण हमें आनन्दित करने के लिये आ ही रहे होंगे। उस समय भगवान् श्री कृष्ण के प्यारे सखा श्रीदामा, सुदामा, वसुदामा आदि ग्वालबालों ने आकर भगवान् श्रीकृष्ण और बलराम को बड़े प्रेम से पुकाराµ हमारे प्यारे कन्हैया, आओ न। अब तक तुम सो ही रहे हो? देखो, गौएँ तुम्हें देखे बिना रँभा रही हैं। हम कभी से खड़े हैं। चलो, वन में गौएँ चरने के लिये चलें। दाऊ दादा, तुम इतनी देर क्या कर रहे हो? इस प्रकार ग्वालबालों की पुकार और जल्दी देखकर नन्दरानी अपने प्यारे पुत्रों को बड़े ही मधुर स्वर से जगाने लगींµ
फिर मैया ने स्नेह से उन्हें माखन-मिश्री का तथा भाँति-भाँति के पकवानों का कलेऊ करवाकर बड़े चाव से खूब सजाया। लाख करोड़ रुपयों के गहने, हीर-जवाहर और मोतियों से जड़े स्वर्णालंकार अपने बच्चों को पहनाये। मुकुट में, बाजूबन्द में, हार में जो मणियाँ जगमगा रही थीं, उनके प्रकाश के सामने प्रातःकाल का उजाला फीका पड़ गया। इस प्रकार भलीभाँति सजाकर नन्दरानी ने अपने लाड़ले पुत्रों के सिर सूँघे और फिर बड़े प्रेम से गौ चराने के लिये उन्हें विदा किया।’ इतनी बातें डाकू ने भी सुनीं। और तो कुछ उसने सुना था नहीं। अब वह सोचने लगा कि अरे यह तो बड़ा सुन्दर सुयोग है, मैं छोटी-मोटी चीजों के लिये इधर-उधर मारा-मारा फिरता रहता हूँ। यह तो अपार सम्पत्ति हाथ लगने का अवसर है। केवल दो बालक ही तो हैं। उनके दोनों गालों पर दो-दो चपत जड़े नहीं कि वे स्वयं अपने गहने निकालकर मुझे सौंप देंगे। यह सोचकर वह डाकू धनी गृहस्थ के घर से बाहर निकल आया और कथा के समाप्त होने की बाट देखने लगा।
डाकू के आनन्द की सीमा नहीं थी। कथावाचक पण्डित जी ने भगवान् श्रीकृष्ण और बलराम जी के सुन्दर शरीरों पर सजे हुए गहनों की जो बात कही थी, उसे याद कर-करके वह खिल उठता थाµ ‘अहा, वे गहने कितने चमकदार होंगे। उनको छीनकर लाते ही मैं बहुत बड़ा धनी हो जाऊँगा। फिर तो मेरे सुख का क्या पूछना। उन गहनों के चिन्तन से ही उसके हृदय में प्रकाश की रेखा खिंच गयी। गहनों के साथ ही भगवान् के दिव्य स्वरूप का भी चिन्तन होता ही था! वह अपने दुःख-दरिद्रî को भूलकर सुख के समुद्र में डूबने-उतराने लगा। बहुत रात बीतने पर कथा समाप्त हुई। भगवान् के नाम और जयकार के नारों से आकाश गूँज उठा। भक्त गृहस्थ बड़ी नम्रता से ठाकुर जी का प्रसाद ग्रहण करने के लिये सब श्रोताओं से अनुरोध करने लगे। प्रसाद बँटने लगा। आनन्द की धारा बह चली। जहाँ देखो, लोग भगवान् का प्रसाद पा-पाकर मस्त हो रहे हैं। इधर सब हो रहा था, परंतु डाकू के मन में इन बातों का कोई ध्यान नहीं था। वह तो रह-रहकर कथावाचक की ओर देख रहा था। उसकी आँखें कथावाचक जी की गति-विधि पर जमी हुई थी। कुछ समय बाद प्रसाद पाकर कथावाचक जी अपने डेरे की ओर चले। डाकू भी उनके पीछे-पीछे चलने लगा।
जब पण्डितजी खुले मैदान में पहुँचे तब डाकू ने पीछे से कुछ कड़े स्वर में पुकार कर कहाµ ‘ओ पण्डित जी! खड़े रहो।’ पण्डित जी के पास दक्षिणा के रुपये-पैसे भी थे, वे कुछ डरकर और तेज चाल से चलने लगे। डाकू ने दौड़ते हुए कहाµ ‘पण्डित जी, खड़े हो जाओ। यों भागने से नहीं बच सकोगे।’ पण्डित जी ने देखा कि अब छुटकारा नहीं है। वे लाचार होकर ठमक गये। डाकू ने उनके पास पहुँचकर कहाµ ‘देखिये पण्डित जी, आप जिन कृष्ण और बलराम की बात कर रहे थे, उनके लाखों-करोड़ों रुपयों के गहनों का वर्णन कर रहे थे, उनका घर कहाँ है? वे दोनों गौएँ चराने के लिये कहाँ जाते हैं? आप सारी बातें ठीक-ठीक बता दीजिये; यदि जरा भी टाल-मटोल की तो बस, देखिये मेरे हाथ में कितना मोटा डंडा है, यह तुरंत आपके सिर के टुकड़े-टुकड़े कर देगा।’ पण्डित जी ने देखा, उसका लंबा-चैड़ा दैत्य-सा शरीर बड़ा ही बलिष्ठ है। मजबूत हाथों में लाठी है, आँखों से क्रूरता टपक रही है। उन्होंने सोचा, हो-न-हो यह कोई डाकू है। फिर साहस बटोरकर कहाµ ‘तुम्हारा उनसे क्या काम है? डाकू ने तनिक जोर देकर कहाµ ‘जरूरत है।’ पण्डित जी बोलेµ ‘जरूरत बताने में कुछ अड़चन है क्या?’ डाकू ने कहाµ ‘पण्डित जी, मैं डाकू हूँ। मैं उनके गहने लूटना चाहता हूँ। गहने मेरे हाथ लग गये तो आपको भी अवश्य ही कुछ दूँगा। देखिये, टालमटोल मत कीजिये। ठीक-ठीक बताइये।’ पण्डित जी ने समझ लिया कि यह वज्रमूर्ख है। अब उन्होंने कुछ हिम्मत करके कहाµ ‘तब इसमें डर किस बात का है? मैं तुम्हें सब कुछ बतला दूँगा। लेकिन यहाँ रास्ते में तो मेरे पास पुस्तक नहीं है। मेरे डेरे पर चलो। मैं पुस्तक देखकर सब ठीक-ठीक बतला दूँगा।’ डाकू उनके साथ-साथ चलने लगा।
डेरे पर पहुँचकर पण्डित जी ने किसी से कुछ कहा नहीं। पुस्तक बाहर निकाली और वे डाकू को भगवान् श्री कृष्ण और बलराम की रूपमाधुरी सुनाने लगे। उन्होंने कहाµ ‘श्रीकृष्ण और बलराम दोनों के ही चरण-कमलों में सोने के सुन्दर नूपुर हैं, जो अपनी रुनझुन ध्वनि से सबके मन मोह लेते हैं। श्यामवर्ण के श्रीकृष्ण पीतवर्ण का और गौरवर्ण के बलराम नीलवर्ण का वó धारण कर रहे हैं। दोनों की कमर में बहुमूल्य मोतियों से जड़ी सोने की करधनी शोभायमान है। गले में हीरे-जवाहरात के स्वर्णहार हैं। हृदय पर कौस्तुभमणि झलमला रही है। ऐसी मणि जगत् में और कोई है ही नहीं। कलाई में रत्नजटित सोने के कंगन, कानों में मणिकुण्डल, सिर पर मनोहर मोहन चूड़ा। घुँघराले काले-काले बाल, ललाट पर कस्तूरी का तिलक, होठों पर मन्द-मन्द मुसकान, आँखों से मानों आनन्द और प्रेम की वर्षा हो रही है। श्रीकृष्ण अपने कर-कमलों में सोने की वंशी लिये उसे अधरों से लगाये रहते हैं। उनकी अंग-कान्ति के सामने करोड़ों सूर्यों की कोई गिनती नहीं। रंग-बिरंगे सुगन्धित पुष्पों की माला, तोते की-सी नुकीली नासिका, कुन्द-बीज के समान धौले दाँतों की पाँत, बड़ा लुभावना रूप है। अजी, जब वे त्रिभंगललित भाव से खड़े होते हैं; देखते-देखते नेत्रा तृप्त ही नहीं होते। बाँके बिहारी श्रीकृष्ण जब अपनी बाँसुरी में ‘राधे-राधे’ की मधुर तान छेड़ते हैं, तब बड़े-बड़े ज्ञानी भी अपनी समाधि से पिण्ड छुड़ाकर उसे सुनने के लिये दौड़ आते हैं। यमुना के तट पर वृन्दावन में कदम्ब वृक्ष के नीचे प्रायः उनके दर्शन मिलते हैं। वनमाली श्रीकृष्ण और हलधरी बलराम।’
डाकू ने पूछाµ ‘अच्छा पण्डित जी, सब गहने मिलाकर कितने रुपयों के होंगे?’ पण्डित जी ने कहाµ ‘अहो, इसकी कोई गिनती नहीं है। करोड़ों-अरबों से भी ज्यादा!’ डाकूµ ‘तब क्या जितने गहनों के आपने नाम लिये, उनसे भी अधिक हैं? पण्डित जीµ ‘तो क्या? संसार की समस्त सम्पत्ति एक ओर और कौस्तुभमणि एक ओर। फिर भी कोई तुलना नहीं।’ डाकू ने आनन्द से ग०द होकर कहाµ ‘ठीक है, ठीक है! और कहिये, वह कैसी है?’ पण्डित जीµ ‘वह मणि जिस स्थान पर रहती है, सूर्य के समान प्रकाश हो जाता है। वहाँ अँधेरा रह नहीं सकता। वैसा रत्न पृथ्वी में और कोई है ही नहीं?’ डाकूµ ‘तब तो उसके दाम बहुत ज्यादा होंगे। क्या बोले? एक बार भलीभाँति समझा तो दिजिये। हाँ, एक बात तो भूल ही गया। मुझे किस ओर जाना चाहिये?’ पण्डित जी ने सारे बातें दुबारा समझा दीं। डाकू ने कहाµ ‘देखिये पण्डित जी, मैं शीघ्र ही आकर आपको कुछ दूँगा। यहाँ से ज्यादा दूर तो नहीं है न? मैं एक रात में पहुँच जाऊँगा, क्यों? अच्छा; हाँ-हाँ, एक बात और बताइये। क्या वे प्रतिदिन गौएँ चराने जाते हैं?’ पण्डित जीµ ‘हाँ, और तो क्या?’ डाकूµ ‘कब आते हैं?’ पण्डित जीµ ‘ठीक प्रातःकाल। उस समय थोड़ा-थोड़ा अँधेरा भी रहता है।’ डाकूµ ‘ठीक है मैंने सब समझ लिया। हाँ तो, अब मुझे किधर जाना चाहिये?’ पण्डित जीµ ‘बराबर उत्तर की ओर चले जाओ।’ डाकू प्रणाम करके चल पड़ा।
पण्डित जी मन-ही-मन हँसने लगे। देखो, यह कैसा पागल है! थोड़ी देर बार उन्हें चिन्ता हो आयी, यह मूर्ख दो-चार दिन तो ढूँढ़ने का प्रयत्न करेगा। फिर लौटकर कहीं यह मुझ पर अत्याचार करने लगा तो? ¯कतु नहीं, यह बडा विश्वासी है। लौटकर आयेगा तो एक रास्ता और बतला दूँगा। यह दो-चार दिन भटकेगा, तब तक मैं कथा समाप्त करके यहाँ से चलता बनूँगा। इससे पिण्ड छुड़ाने का और उपाय ही क्या है? पण्डित जी कुछ-कुछ निश्चिन्त हुए। 
डाकू अपने घर गया। उसकी भूख, प्यास, नींद सब उड़ गयी। वह दिन-रात गहनों की बात सोचा करता, चमकीले गहनों से लदे दोनों नयन-मन-हरण बालक उसकी आँखों के सामने नाचते रहते। क्षणभर के लिये भी तो उसका मन इधर-उधर नहीं जाता। कहीं भूल जाय तो हाथ लगी सम्पत्ति खो जायगी। भगवान् के दिव्य अंग और उस पर सजे गहनों की चमक-दमक उसकी आँखों के सामने सदा झिलमिलाती रहती। इसी ध्यान में रात बीत गयी। उसे पता तक न चला। सूर्योदय हुआ। फिर भी उसे एक ही चिन्ताा, एक ही ध्यान। दुनिया के लोग अपने-अपने कामों में लगे थे। कोई मनोरंजन कर रहा था, कोई आलस्य से दिन काट रहा था, हवा चल रही थी, नदी बह रही थी, पक्षी चहक रहे थे और डाकू मन-ही-मन श्याम-गौर किशोरों के देदीप्यमान शरीरों से गहने उतारने में व्यस्त था। एक क्षण की तरह पलक मारते-मारते सारा दिन बीत गया। परंतु डाकू के मन में एक ही धुन। लगन हो तो ऐसी! मस्ती हो तो ऐसी!! अँधेरा हुआ, डाकू ने लाठी उठाकर कंधे पर रखी। वह उत्तर दिशा की ओर चल पड़ा। वह उत्तर भी उसकी अपनी धुन का ही था, दूसरांे के देखने में शायद वह दक्खिन ही जा रहा हो! उसे इस बात का भी पता नहीं था। उसके पैर धरती पर पड़ रहे हैं या काँटों पर। 
चलते-चलते एक स्थान पर डाकू की आँख खुली। उसने देखा, बड़ा सुन्दर हरा-भरा वन है। एक नदी भी कल-कल करती बह रही है। उसने सोचा, निश्चय किया ‘यही है, यही है! परंतु वह कदम्ब का पेड़ कहाँ है?’ डाकू बड़ी सावधानी के साथ एक-एक वृक्ष के पास जाकर कदम्ब को पहचानने की चेष्टा करने लगा। उसने न जाने कितने वृक्षों का स्पर्श किया, कितनों के पत्ते देखे! अन्त में वहाँ उसे एक कदम्ब मिल ही गया। अब उसके आनन्द की सीमा न रही! उसने संतोष की साँस ली और आस-पास आँखे दौड़ायीं। एक छोटा-सा पर्वत, घना जंगल और गौओं के चरने का मैदान भी दीख गया। हरी-हरी दूब रात के स्वाभाविक अँधेरे में घुल-मिल गयी थी। फिर भी उसके मन के सामने गौओं के चरने और चराने वालों की एक छटा छिटक ही गयी। अब डाकू के मन में एक ही विचार था। कब सबेरा हो, कब अपना काम बने। वह एक-एक क्षण सावधानी से देखता और सोचता कि आज सबेरा होने में कितनी देर हो रही है! पल-पल उसके उत्साह में वृद्धि होती। वह देखता कि मेरा मनोरथ पूरा होने का समय निकट आ रहा है। वह कदम्ब वृक्ष की एक-एक डाल पर पैनी दृष्टि डालकर और चढ़कर इस बात की परीक्षा करता कि कहाँ बैठने से मैं उन दोनांे के आते ही झपपट कूद पडूँगा और गहने छीन लेने में सुविधा होगी। मैं किस तरह उन्हें पकडूँगा, किस तरह गहने छीनूँगा, इस बात को वह बार-बार पक्की करने लगा। ज्यों-ज्यों रात बीतती, त्यों-त्यों उसकी चिन्ता, उद्वेग, उत्तेजना, आग्रह और आकुलता बढ़ती जाती। 
कभी-कभी उसे ऐसा मालूम होता, मानो कौस्तुभ मणि उसकी आँखों के सामने चमक गयी हो। उसने सोचा, कौस्तुभ मणि से तो अँधेरा दूर हो जाता है। यदि उन बालकों ने मणि के प्रकाशमें मुझे देख लिया तो सारा किया-कराया चैपट हो जायगा। वे मुझे देखकर भागने की चेष्टा करेंगे। हाँ, तो मैं अभी कदम्ब की सबसे ऊँची डाल पर चढ़ गया। अभी थोड़ी ही देर हुई कि उसके मन में आयाµ ‘नहीं, नहीं; यहाँ से जिनती देर में मैं उतर पाऊँगा, उतनी देर में तो वे भाग जायँगे। यहाँ ठहरना ठीक नहीं।’ वह नीचे उतर आया। सोचने लगाµ ‘कुछ वृक्षों के झुरमुट में चुपचाप खड़ा हो जाऊँ और आते ही झपटकर उन्हें पकड़ लूँ।’ वह जाकर वृक्षों की आड़ में खड़ा हो गया। खड़े होते ही उसके मन में विचारों का तूफान उठने लगाµ ‘ना-ना, शायद वे दोनों मुझे यहाँ देख लेें। तब तो सारा बना बनाया काम बिगड़ जायगा। अच्छा, सामने वाले गड्डे में छिप जाऊँ। ठीक तो है, वह आते ही बाँसुरी बजायेगा। वंशी की धुन सुनते ही मैं दौड़कर उसे पकड़ लूँगा।’ यह विचार कर डाकू गड्डे में जाकर छिप गया। क्षणभर बाद ही उसके मन में आया कि ‘कहीं वंशी की धुन मेरे कानों मे न पड़ी तो? बाहर रहना ही ठीक है।’ अब वह बाहर आकर बार-बार कान दे-देकर वंशी की धुन अकलने में लगा। जब उसे किसी शब्द की आहट न मिली तब वह फिर कदम्ब पर चढ़ गया और देखने लगा कि किसी ओर उजाला तो नहीं है। कहीं से वंशी की आवाज तो नहीं आ रही है। मैं ज्यों ही वंशी की धुन सूनूँगा, त्यों ही टूट पड़ूँगा।’ इस प्रकार सोचता हुआ बड़ी ही उत्कण्ठा के साथ वह डाकू सबेरा होने की बाट जोहने लगा।
देखते-ही-देखते मानो किसी ने प्राची दिशा का मुख रोली के रंग से रँग दिया। डाकू के हृदय में आकुलता और भी बढ़ गयी। वह पेड़ से कूदकर जमीन पर आया, परंतु वंशी की आवाज सुनायी न पड़ने के कारण फिर उछलकर कदम्ब पर चढ़ गया। वहाँ भी किसी प्रकार की आवाज सुनायी नहीं पड़ी। उसका हृदय मानो क्षण-क्षण पर फटता जा रहा था। अभी-अभी  उसका हृदय विहर उठता, परंतु यह क्या उसकी आशा पूर्ण हो गयी! दूर, बहुत दूर वंशी की सुरीली स्वर-लहरी लहरा रही है। वह वृक्ष से कूद पड़ा। हाँ, परन्तु हृदय पर फिर अविश्वास की रेखा ¯खच गयी। कहीं मेरा भ्रम तो नहीं था! वह तुरंत वृक्ष की सबसे ऊँची डालपर चढ़ गया। हाँ, ठीक है; बाँसुरी ही तो है। अच्छा, यह स्वर तो और समीप होता जा रहा है! डाकू आनन्द के आवेश में अपनी सुध-बुध खो बैठा और मू£च्छत होकर धरती पर गिर पड़ा। कुछ ही क्षणों में उसकी बेहोशी दूर हुई, आँखें खुलीं; वह उठकर खड़ा हो गया। देखा तो पास ही जंगल में एक दिव्य शीतल प्रकाश चारों ओर फैल रहा है। उस मनोहर प्रकाश में दो भुवन-मोहन बालक अपने अंग की अलौकिक छटा बिखेर रहे हैं। गौएँ और ग्वाल-बाल उनके आगे-आगे कुछ दूर निकल गये हैं। 
डाकू ने उन्हें देखा, अभी पुकार भी नहीं पाया था कि मन मुग्ध हो गयाµ ‘अहाहा! कैसे सुन्दर चेहरे हैं इनके, आँखों से तो अमृत ही बरस रहा है और इनके तो अंग-अंग बहुमूल्य आभूषणों से भरे हैं। हाय-हाय! इतने नन्हें-नन्हें सुकुमार शिशुओं को माँ-बाप ने गौएँ चराने के लिये कैसे भेजा? ओह! मेरा तो जी भरा आता हैµ मन चाहता है, इन्हें देखता ही रहँू! इनके गहने उतारने की बात कैसी, इन्हें तो और भी सजाना चाहिये। नहीं, मैं इनके गहने नहीं छीनूँगा। ना, ना, गहने नहीं छीनूँगा तो फिर आया ही क्यों? ठीक है। मैं गहने छीन लूँगा। परंतु इन्हें मारूँगा नहीं। बाबा रे बाबा, मुझसे यह काम न होगा! दुत् तेरे को! यह मोह-छोह कैसा? मैं डाकू हूँ, डाकू! मैं और दया! बस, बस, मैं अभी गहने छीने लेता हूँ।’ यह कहते-कहते वह श्रीकृष्ण और बलराम की ओर दौड़ा। भगवान् श्रीकृष्ण और बलराम के पास पहुँचकर उनका स्वरूप देखते ही उसकी चेतना एक बार फिर लुप्त हो गयी। पैर लड़खड़ाये और वह गिर पड़ा फिर उठा कुछ देर टकटकी लगाये देखता रहा, आँखें आँसुओं से भर आयीं। फिर न मालूम क्या सोचा, हाथ में लाठी लेकर उनके सामने गया और बोलाµ ‘खड़े हो जाओ। सारे गहने निकालकर मुझे दे दो।’
श्रीकृष्णµ ‘हम अपने गहने तुम्हें क्यों दें?
डाकूµ ‘दोगे नहीं? मेरी लाठी की ओर देखो।’
श्रीकृष्णµ ‘लाठी से क्या होगा।’
डाकूµ ‘अच्छा, क्या होगा? गहना न देने पर तुम्हारे सिर तोड़ डालूँगा, और क्या होगाा?
श्रीकृष्णµ ‘नहीं, हम लोग गहने नहीं देंगे।’
डाकूµ ‘अभी-अभी मैं कान पकड़के ऐठूँगा और सारे गहने छीन-छानकर तुम्हें नदी में फेंक दूँगा।’
श्रीकृष्णµ ‘(जोर से) ‘बाप-रे-बाप! ओ बाबा!! ओ बाबा!!!’
डाकू ने झपटकर अपने हाथ से श्रीकृष्ण का मुँह दबाना चाहा, परंतु स्पर्श करते ही उसके सारे शरीर में बिजली दौड़ गयी। वह बेहोश होकर धड़ाम से धरती पर पड़ा। कुछ क्षणों के बाद जब होश आया तब वह श्रीकृष्ण से बोलाµ ‘अरे, तुम दोनों कौन हो? मैं ज्यों-ज्यों तुम दोनों को देखता हूँ त्यों-त्यों तुम मुझे और सुन्दर, और मधुर, और मनोहर क्यों दीख रहे हो? मेरी आँखों की पलकें पड़नी बंद हो गयीं। हाय! हाय! मुझे रोना क्यों आ रहा है! मेरे शरीर के सब रोएँ क्यांे खड़े हो गये हैं। जान गया, जान गया, तुम दोनों देवता हो, मनुष्य नहीं हो।’
श्रीकृष्णµ (मुस्कुराकर) ‘नहीं, हम मनुष्य हैं। हम ग्वालबाल हैं। हम ब्रज के राज नन्दबाबा के लड़के हैं।’
डाकूµ ‘अहा! कैसी मुसकान है! जाओ, जाओ; तुम लोग गौएँ चराओ। मैं अब गहने नहीं चाहता। मेरी आशा-दुराशा, मेरी चाह-आह सब मिट गयीं। हाँ, मंै चाहता हूँ कि तुम दोनों के सुरंग अंगों में अपने हाथों से और भी गहने पहनाऊँ। जाओ, जाओ। हाँ, एक बार अपने दोनों लाल-लाल चरण-कमलों को तो मेरे सिर पर रख दो। हाँ, हाँ; जरा हाथ तो इधर करो। मैं एक बार तुम्हारी स्निग्ध हथेलियों का चुम्बन करके अपने प्राणों को तृप्त कर लूँ। ओह, तुम्हारा स्पर्श कितना शीतल, कितना मधुर! धन्य! धन्य!! तुम्हारे मधुर स्पर्श से हृदय की ज्वाला शान्त हो रही है। आशा-अभिलाषा मिट गयी। जाओ, हाँ-हाँ अब तुम जाओ। मेरी भूख-प्यास मिट गयी। अब कहीं जाने की इच्छा नहीं होती। मैं यहीं रहूँगा। तुम दोनों रोज इसी रास्ते से जाओगे न? एक बार केवल एक क्षण के लिये प्रतिदिन, हाँ, प्रतिदिन मुझे दर्शन देते रहना। देखो, भूलना नहीं। किसी दिन नहीं आओगेµ दर्शन नहीं दोगे तो याद रखो, मेरे प्राण छटपटा कर छूट ही जायँगे।
श्रीकृष्णµ ‘अब तुम हम लोगों को मारोगे तो नहीं? गहने तो नहीं छीन लोगे? हाँ, ऐसी प्रतिज्ञा करो तो हम लोग प्रतिदिन आ सकते हैं।
डाकूµ ‘प्रतिज्ञा, सौ बार प्रतिज्ञा! अरे भगवान् की शपथ! तुम लोगों को मैं कभी नहीं मारूँगा। तुम्हें मार सकता हो ऐसा कोई है जगत् मे? तुम्हें तो देखते ही सारी शक्ति गायब हो जाती है, मन ही हाथ से निकल जाता है। फिर कौन मारे और कैसे मारे? अच्छा, तुम लोग जाओ!’
श्रीकृष्णµ ‘यदि तुम्हें हम लोग गहना दें तो लोगे?’
डाकूµ ‘गहना! गहना!! अब गहने क्या होंगे? अब तो कुछ भी लेने की इच्छा नहीं है।’
श्रीकृष्णµ ‘क्यों नहीं, ले लो। हम तुम्हें दे रहे हैं न?’
डाकूµ ‘तुम दे रहे हो? तुम मुझे दे रहे हो? तब तो लेना ही पड़ेगा, परंतु तुम्हारे माँ-बाप तुम पर नाराज होंगे, तुम्हें मारेंगे तो?’
श्रीकृष्णµ ‘नहीं-नहीं’, हम राजकुमार हैं। हमारे पास ऐसे-ऐसे न जाने कितने गहने हैं। तुम चाहो तो तुम्हें और भी बहुत-से गहने दे सकते हैं।’
डाकूµ ‘ऊहूँ, मैं क्या करूँगा? हाँ, हाँ; परंतु तुम्हारी बात टाली भी तो नहीं जाती। क्या तुम्हारे पास और गहने हैं? सच बोलो।’
श्रीकृष्णµ ‘हैं नहीं तो क्या हम बिना हुए ही दे रहे हैं? लो तुम इन्हें ले जाओं।’
भगवान् श्रीकृष्ण अपने शरीर पर से गहने उतारकर देने लगे। डाकू ने कहाµ ‘देखो भाई! यदि तुम मुझे देना ही चाहते हो, तो मेरा यह दुपट्टा ले लो और इसमें अपने हाथों से बाँध दो। ¯कतु देखो लाला! यदि तुम मेरी इच्छा जानकर बिना मन के दे रहे हो तो मुझे गहने नहीं चाहिये। मेरी इच्छा तो अब बस, एक यही है कि रोज एक बार तुम्हारे मनोहर मुखड़े को मैं देख लिया करूँ और एक बार तुम्हारे चरणतल से अपने सिर का स्पर्श करा लिया करूँ।’ श्रीकृष्णµ ‘नहीं-नहीं, बेमन की बात कैसी? तुम फिर आना, तुम्हें इस बार और गहने देंगे।’ श्रीकृष्ण ने उसके दुपट्टे में सब गहने बाँध दिये। डाकू ने गहने की पोटली हाथ में लेकर कहाµ ‘क्यों भाई! मैं फिर आऊँगा तो तुम मुझे और गहने दोगे न? गहने चाहे न देना परंतु दर्शन जरूर देना।’ श्रीकृष्ण ने कहाµ ‘अवश्य! गहने भी और दर्शन भी दोनों।’ डाकू गहने लेकर अपने घर के लिये रवाना हुआ।
डाकू आनन्द के समुद्र में डूबता-उतराता घर लौटा। दूसरे दिन रात के समय कथावाचक पण्डित जी के पास जाकर सब वृत्तान्त कहा और गहनों की पोटली उनके सामने रख दी। बोलाµ ‘देखिये, देखिये; पण्डित जी! कितने गहने लाया हूँ। आपकी जितनी इच्छा हो ले लीजिये। पण्डित जी! उसने और गहने देना स्वीकार किया है।’ पण्डित जी तो यह सब देख-सुनकर चकित रह गये। उन्होंने बड़े विस्मय के साथ कहाµ ‘मैंने जिनकी कथा कही थी उनके गहने ले आया?’ डाकू बोलाµ ‘और तब क्या, देखिये न यह सोने की वंशी! यह सिर का मोहन चूड़ामणि।।’ पण्डित जी हक्के-बक्के रह गये। बहुत सोचा, बहुत विचारा, परंतु वे किसी निश्चय पर नहीं पहुँच सके। जो अनादि अनन्त पुरुषोत्तम हैं। बड़े-बड़े योगी सारे जगत् को तिनके के समान त्यागकर भूख-प्यास-नींद की उपेक्षा कर सहò-सहò वर्ष पर्यन्त जिनके ध्यान की चेष्टा करते हैं, परंतु दर्शन से वंचित ही रह जाते हैं; उन्हें यह डाकू देख आया! उनके गहने ले आया!! अजी कहाँ की बात है? असम्भव। हो नहीं सकता। परंतु यह क्या? यह चूड़ामणि, यह बाँसुरी, ये गहने सभी तो अलौकिक हैं। इसे ये सब कहाँ, किस तरह मिले? कुछ समझ में नहीं आता। क्षणभर ठहर कर पण्डित जी ने कहाµ ‘क्यों भाई! तुम मुझे उसके दर्शन करा कसते हो?’ डाकूµ ‘क्यों नहीं, कल ही चलिये न?’ पण्डित जी पूरे अविश्वास के साथ केवल उस घटना का पता लगाने के लिये डाकू के साथ चल पड़े और दूसरे दिन नियत स्थान पर पहुँच गये। पण्डित जी ने देखाµ एक सुन्दर-सा वन है। छोटी-सी नदी बह रही है, बड़ा-सा मैदान और कदम्ब का वृक्ष भी है। वह ब्रज नहीं है, यमुना नहीं है; पर है कुछ वैसा ही। रात बीत गयी, सबेरा होने के पहले ही डाकू ने कहाµ देखिये पण्डित जी! आप नये आदमी हैं। आप किसी पेड़ की आड़ में छिप जाइये। वह कहीं आपको देखकर न आवे तो? अब प्रातःकाल होने में विलम्ब नहीं है। अभी आवेगा।’ डाकू पण्डित जी से बात कर ही रहा था कि मुरली की मोहक ध्वनि उसके कानों में पड़ी। व

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