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ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम्। विश्वस्य एक परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वा अमृता भवन्ति ॥ 7 ॥            You are the Supreme Brahman, infinite, yet hidden in the hearts of all creatures. You pervade everything. They, who know You, are free from the cycle of birth, death and rebirth. (Svetasvatara 3 : 7)            परमात्मा सब प्रकार से सब काल में मुक्त और शुद्ध है। वह अपरिमित और अनन्त होते हुए भी सभी प्राणियों के हृदय में छिपा हुआ है। परमात्मा को जानने वाले व्यक्ति ही जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।

अज़ छि ज़्येठॖ ॴठम 30.05.2020 ज़्येठॖ (जेष्ठ) ज़ूनॖ पछॖ (शुक्ल पक्ष) ॴठम (अष्टमी) बटॖवार (शनिवार/शनिश्चरवार) श्री सप्तर्षि सम्वत 5096, राश सिंह (चलान) ....Today is Jyesth Maas Shukla Paksh Ashtamiyaam Shanivsasre sanayitaam. Kashmiri Pandit Nirvasan Samvat_31 Sapthrishi Samvat _5096
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श्री चैतन्य महाप्रभु

भारतीय इतिहास के मध्यकालीन भक्ति-काल में निमाई का नाम बड़ी श्रद्धा से लिया जाता है। भगवभक्ति के प्रचार से इन्होंने न केवल बंगाल को ही नहीं, अपितु समस्त भारत को प्रभावित किया। श्री चैतन्य महाप्रभु का प्राकट्य शक-संमत 1407 की फाल्गुनशुक्ला 15 को दिन के समय सिंहलग्र में पश्चिमी बंगाल के नवद्वीप नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री जगत्र्नाथ मिश्र और माता का नाम शचीदेवी था। ये भगवान् श्रीकृकृष्ण के अनन्य भक्त थे। इन्हें लोग श्रीराधा का अवतार मानते थे। बंगाल के वैष्णव तो इन्हें साक्षात् पूर्णब्रह्म ही मानते थे। इनके जीवन के अन्तिम छः वर्ष राधा भाव में ही बीते। उन दिनों इनके अंदर महाभाव के सारे लक्षण प्रकट हुए थे। 
    श्री चैतन्य महाप्रभु चैबीस वर्ष की अवस्था तक गृहस्थ थे। इनका  नाम ‘निमाई’ पण्डित था, ये न्याय के बड़े पण्डित थे। इन्होंने न्यायशास्त्रा पर एक अपुर्व ग्रन्थ लिखा था, जिसे देख कर इनके एक मित्रा को बड़ी ईष्र्या हुई। क्योंकि उन्हें भय हुआ कि इनके ग्रन्थ के प्रकाश में आने पर उनके ग्रन्थ का आदर कम हो जायगा। इस पर श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने ग्रन्थ को गंगाजी में बहा दिया। कैसा अपूर्व त्याग है!उनकी पहली पत्नी का नाम लक्ष्मीदेवी था। लक्ष्मीदेवी के देहान्त के बाद उन्होंने दूसरा विवाह विष्णुप्रिया के साथ किया था। इनका अपनी पत्नी के प्रति सदा पवित्रा भाव रहा। 
    चौबीस वर्ष की अवस्थामें इन्होंने केशव भारती नामक संन्यासी महात्मा से संन्यास की दीक्षा ग्रहण की। इन्होंने संन्यास इसलिये नहीं लिया था कि भगवत्प्राप्ति के लिये संन्यास लेना अनिवार्य है; इनका उदेश्य काशी आदि तीर्थांे के संन्यासियों को भक्तिमार्ग में लगाना था। बिना पूर्ण वैराग्य हुए ये किसी को संन्यास की दीखा नहीं देते थे। इसीलिये  इन्होंने पहली बार अपने शिष्य रघुनाथदास को संन्यास लेने से मना किया था।श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रधान- प्रधान अनुयायियों के नाम हैं- श्री नित्यानन्दप्रभु, श्री अद्वैतप्रभु, श्री रायरामानन्द, श्री रूपगोस्वामी, श्री सनातनगोस्वामी, श्री रघुनाथभट्ट और श्री गोपालभट्ट आदि थे।
इनके जीवन में अनकों अलौकिक घटनाएँ हुई, जो किसी मनुष्य के लिये सम्भव नहीं और जिनसे इनका ईश्वरत्व प्रकट होता है। इन्होने एक बार श्री अद्वैतप्रभु को विश्वरूप का दर्शन कराया था। श्री नित्यानन्दप्रभु को इन्होंने कई बार नारायण के रूप में व श्री कृष्ण के रूप में दर्शन दिया। अपनी माता शचीदेवी को इन्होंने श्री नित्यानन्दप्रभु के साथ श्री कृष्ण व बलराम के रूप में दर्शन दिया। गोदावरी के तटपर श्री रायरामानन्द के सामने ये रसराज श्री कृष्ण और महाभाव श्री राधा के युगल रूप  में प्रकट हुए, जिसे देखकर राय रामानन्द अपने शरीर को नहीं सम्हाल सके और मूर्छित होकर गिर पड़े।
श्री चैतन्य महाप्रभु अपने जीवन के शेष भाग में वह नीलाचल में रहते थे। एक बार ये वहाँ पर एक बंद कमरे में से बाहर निकल आये थे तो इनके शरीर के जाड़ खुल गये, जिससे इनके अवयव बहुत लंबे हो गये। इसी तरह एक दिन इनके अवयव सिकुड़ गये तो वह मिट्टी के लोधे के समान पृथ्वी पर पड़े रहे।  इन्होंने कई असाध्य रोगों से पीड़ित रोगियों को रोगमुक्त किया। दक्षिण में जब ये अपने भक्त नरहरि सरकार ठाकुर के गाँव में पहँुचे, नित्यानन्दप्रभु को मधु की आवश्यकता हुई। इन्होंने उस समय एक सरोवर के जल को शहद के रूप में पलट दिया, जिससे आजतक वह तालाब मधुपुष्करिणी के नाम से विख्यात है।
श्री चैतन्य महाप्रभु ने बतलाया है कि
हरे कृश्णा हरे कृश्णा । कृश्ण कृश्णा हरे  हरे।।   
हरे  रामा  हरे रामा। राम  रामा  हरे  हरे।।  
यह महामंत्रा सबसे अधिक लाभकारी और भगवत्प्रेम बड़ाने वाला है। भगवन्नाम का बिना श्रद्धा के उच्चारण करने से भी मनुष्य संसार के दुःखों से छूटकर भगवान् के परम धाम का अधिकारी बन जाता है। श्री चैतन्य महाप्रभु ने हमें बतलाया है कि भक्तों को भगवन्नाम के उच्चारण के साथ दैवीसम्पत्ति का भी अर्जन करना चाहिये। उन्होंने दैवीसम्पत्ति के कुछ  प्रधान लक्षण बताये है जो ऐसे हैं। दया, अहिंसा, मत्सरशून्यता, सत्य, समता, उदारता, मृदुता, शौच, अनासक्ति, परोपकार, निष्कामता,चित्त की स्थिरता, इन्द्रियदमन, युक्ताहारविहार,गम्भीरता, परदुंःखकातरता, मैत्राी, तेज, धैर्य इत्यादि। श्री चैतन्य महाप्रभु आचारण की पवित्राता पर बहुत जोर देते थे।
उनका  एक शिक्षाष्टक जिसमें उन्होंने अपने उपदेशों का सार भार दिया है। 
न धनं न जनं न सुन्दरीं कवितां वा जगदीश कामये। 
मम जन्मनि जन्मनीश्वरे भवता˜ भक्तिरहैतुकी त्वयि।।
‘‘ हे जगदीश्वर! मुझे न धन-बल चाहिये न जनबल , न सुन्दरी स्त्राी और न कवित्व- भक्ति अथवा सर्वज्ञत्व ही चाहिये। मेरी तो जन्म-जन्मान्तर में आप परमेयवर के चरणों में अहैतु की भक्ति- अकारण प्रीति बनी रहे।
बोलो भक्त और उनके भगवान् की जय!

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