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ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम्। विश्वस्य एक परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वा अमृता भवन्ति ॥ 7 ॥            You are the Supreme Brahman, infinite, yet hidden in the hearts of all creatures. You pervade everything. They, who know You, are free from the cycle of birth, death and rebirth. (Svetasvatara 3 : 7)            परमात्मा सब प्रकार से सब काल में मुक्त और शुद्ध है। वह अपरिमित और अनन्त होते हुए भी सभी प्राणियों के हृदय में छिपा हुआ है। परमात्मा को जानने वाले व्यक्ति ही जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।

अज़ छि ज़्येठॖ ॴठम 30.05.2020 ज़्येठॖ (जेष्ठ) ज़ूनॖ पछॖ (शुक्ल पक्ष) ॴठम (अष्टमी) बटॖवार (शनिवार/शनिश्चरवार) श्री सप्तर्षि सम्वत 5096, राश सिंह (चलान) ....Today is Jyesth Maas Shukla Paksh Ashtamiyaam Shanivsasre sanayitaam. Kashmiri Pandit Nirvasan Samvat_31 Sapthrishi Samvat _5096
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भक्त दामाजी पंत   

भगवान ने अपनी विलक्षण कृपा से अपने अनेकानेक भक्तों का कल्याण किया है। काश हमारा भी करते। महाराष्ट्र की संत-सेवित भक्तिमयी नगरी मंगलवेडचा का ही एख पावन प्रसंग है। महाराष्ट्र में तेरहवीं शताब्दी में भयंकर अकाल पड़ा था।    उन दिनों गोल-कुण्डा बेदरशाही राज्य के अन्तर्गत मंगलबेड़या प्रान्त का शसनभार श्रीदामाजी पंत के ऊपर था। दामा जी पंथ वहाँ के सूबेदार थे।

     आज तक उस अकाल में लोग दुर्गादेवी के नाम से स्मरण करते है। सात वर्षो तक उस समय वर्षा न हुई थी। अन्न के अभाव से हजारों मनुष्य तड़प-तड़पकर मर गये। वृक्षों की छाल औऱ पत्ते तक नही बचे। कष्ट की कोई  सीमा नही थी। जो लोग जीवित बचे थे, उनको भी देखकर भय लगे-ऐसे वे हो गये थे। देह मे रक्त-मास का नाम तक नही जैसे ककाल पर चमड़ा चिपका दिया गया हो। भूखों के आर्तनाद से रात-दिन दिशाएँ रोया करती थीं। दुष्काल में बहुत-सी प्रजा नगर-ग्राम छोड-छोडकर अन्न-जल की खोज मे बाहर चली गई। गाँव के गाँव उजड़ने लगे। जो नही गए वे भूख से तड़प-तडपकर प्राण छोड़ने लगे। प्रजा में हाहाकार मच गया।

     दामाजी पंत औऱ उनकी स्त्री दोंनों ही भगवान के अनन्य भक्त थे। दामा जी पंत अपनी कर्तव्य निष्ठा, सवापरायणता औऱ पण्ढरनाथ बिठोवा की निष्काम भक्ति के लिए प्रसिद्ध थे। दीन-दुखियों की यथाशक्ति सेवा-सहायता करना उनके परम कर्त्तव्य था। पाण्डुरंग के चिन्तन में उनका चित लगा रहता था। श्रीहरि का स्मरण करते हुए निष्काम भाव से कर्तव्य कर्म करना उनका व्रत था। दीन-दुःखियों की हर प्रकार वे सेवा-सहायता करते थे। शत्रु को भी कष्टो में पड़ा देखकर व्याकुल हो जानते थे। दामा पत जी का भक्त-हदय ऐसी दशा देखकर विचलित हो उठा। उनके अधिकार में सरकारी अन्न भण्डार थे जिनमें पर्याप्त अन्न था। दामोदर पत जी ने प्रजा का असहा कष्ट देखते हुए विचार किया कि इस सरकारी अन्न से लाखों प्राणियों के जीवन की रक्षा हो सकती है। उनमे भूख तडपने वाला जीव भी तो उन्ही विट्ठलनाथ कका अंश है। उन्होने श्री विटठलनाथ का अंश है। उन्होने श्री विटठलनाथ की महिमा का स्मरण करते हुए अन्न के भण्डार खोल दिए। मन-ही-मन प्रार्थना की-“है भगवान दीननाथ, दीनबधु। यह आपका ही अन्न है, इसे मैं आपकी प्रजा को बांट रहा हूँ.... इससे हजारों प्राणियों को जीवन दान मिलेगा।

     हर जगह उदार, पुण्यात्मा पुरूष की अकारण निन्दा करने वाले भी होते है। उधर एक ईर्ष्यालु अधिकारी (सहायक नायब सूबेदार) ने उनका पद छीन लेने की दुर्भावना से बादशाह को संदेश भेज दिया कि दामा पंत जी दोनों हाथों से राज्य का अन्न लुटा रहे है। उसने सोचा यदि दामाजी को बादशाह हटा दें तो मैं प्रधान सूबेदार बन सकूँगा। नायब सूबेदार का पत्र पाते ही बादशाह क्रोध से आग-बबूला हो गया। अभिमानवश बादशाह ने तुरन्त दामा पंत जी को राज्य के साथ विश्वासघात के आरोप में बंदी बनाकर ले आने की आज्ञा कर दी। उसने सेनापति को एक हजार सैनिकों के साथ दामाजी को गिरफ्तार करके ले आने की आज्ञा दी।

    मुसलमान सेनापति जब मंगलबेडया पहूँचा, उस समय दामाजी श्रीपाण्डुरंग की पूजा में लगे थे। सेनापति उन्हे जोर-जोर से पुकारने लगा। दामाजी की धर्मपत्नी ने तेजस्विता के साथ कहा-‘अधीर होने की आवश्यकता नही, वे पूजा में बैठे है। जब तक उनका नित्यकर्म पूरा न हो जाय, लाख प्रयत्न करने पर भी तब तक मैं किसी को उनके पास नही जान दूँगी। सेनापति पतिव्रता नारी के तेज से अभिभूत हो गया और प्रतिक्षा करने लगा। दामाजी की पूजा समाप्त होने पर स्त्री ने उन्हे सेनापति के आने का समाचार दिया। दामाजी समझ गये कि अन्न लुटवा देने का समाचार समाचार पाकर बादशाह ने उन्हे गिरफ्तार करने को सैनिक भेजे है। भय का लेशमात्र तक उनके चित में नही था। उन्होने पत्नी से कहा चिन्ता करने की कोई बात नही है। हमने अपने कर्तव्य का पालन ही किया है। बादशाह कठोर-से-कठोर दण्ठ दें, इसके लिये तो हम पहले से तैयार ही थे। भगवान् पाण्डुरंग का प्रत्येक विधान दया से पूर्ण होता है। जीव के मंगल के लिये ही उनका विधान है। हमें उनकी प्रसन्नता ही अभीष्ट है।

     पत्नी को आश्वासन देकर वे बाहर आये। सेनापति का अधिकार-गर्व दामाजी की तेजपूर्ण शान्त सौभ्य मुखाकृति देखते ही दूर हो गया। उसने नम्रतापूर्वक कहा- बादशाह ने आपको शीध्र बुला लाने के लिये मुझे भेजा है। दामाजी की भगवद् भत्ता पतिव्रता स्त्री ने पति की गिरफ्तारी का समाचार सुना। वह बडी स्थिरता से बोली-‘नाथ! भगवान पण्ढरीनाथ जो कुछ करते है, उसमे हमारा हित ही होता है। उन दयामय ने आपको एकान्त सेवन का अवसर दिया है। अब आप केवल उनका ही चिन्तन करेंगे। मुझे तो इतना ही दुख है कि यह दासी स्वामी की चरणसेवा से वंचित रहेगी। पत्नी से विदा लेकर वे बाहर आ गये। सेनापति ने उनके हाथों में हथकडी डाल दी। उनका बंदी करके वे ले चले।

     दामाजी को न तो बंदी होने का दुःख है औऱ न पदच्युत होने की चिन्ता। वे तो पाण्डुरंग विट्ठल की धुन में तन्मय थे। कीर्तन करते चले जा रहे थे। गोवल-कुण्डा के मार्ग में ही पण्ढरपुर पडता था। दामा पंत जी ने सिपाहियों के अधिनायक से आज्ञा माँगकर श्री विट्ठलनाथ के दर्शन की इच्छा की। सेनापति ने स्वीकृति दे दी। दामाजी के नेत्रों से प्रेमाश्रू झर रहे थे। शरीर की सुधि जाती रही। कुछ देर में अपने को सम्हाकर वे भावमग्न होकर भगवान की स्तुति करने लगे। दामाजी को साष्टांग प्रणाम करके उनकी मोहिनी मूर्ति हदय में धारण किये बाहर आ गये। बिठोबा का दर्शन कर उन्हें बड़ा सुख-सतोष मिला। वह भय-मुक्त हो गए। उन्हे लेकर सेनापति अपने सिपाहियों के साथ आगे चल पडा।

      दूसरी ओर बेदर का बादशाह जब मंगलवेड़चा से सिपाहियों व कैदी सूबेदार के आने की प्रतीक्षा कर रहा था। इतने में एक काले रंग का किशोर अवस्था का ग्रामीण पुरूष हाथ में छोटी-सी लकड़ी लिये, कन्धे पर काली कम्बल डाले निर्भयतापूर्वक दरबार में चला आया। उसने जोहार करके कहा- ‘बादशाह सलामत! यह चाकर मंगलबेडया से अपने स्वामी दामाजी पंत चाकर मंगलबेड़या से अपने स्वामी दामाजी पंत के पास से आ रहा है।

     दामाजी का नाम सुनते ही बादशाह ने उत्तेजित होकर पूछा- ‘क्या नाम है तेरा? उत्तर मिला- मेरा नाम तो बिटू है, सरकार! दामाजी के अन्न से पला हुआ मैं चमार हूँ। यह अदभुत सुन्दर रूप, यह हदय को स्पर्श करती मधुर वाणी-बादशाह एकटक देख रहा था उस बिटु को। उन्होने पूछा- ‘यहाँ क्यों आये हो?’

         उस ग्रामीण ने कहा- ‘सरकार! अपराध क्षमा हो। अकाल में आपकी प्यारी प्रजा भूखों मर रही थी। मेरे स्वामी ने आपके कोठार का गल्ला उसकी प्राण- रक्षा के लिये बाँट दिया। मैं उस गल्लें का मूल्य खजाने में जमा कर लें औऱ मुझे रसीद दिलवाने की दया करें।

    बादशाह तो ठ्क- से हो गया। अब वह मन-ही-मन बड़ा लज्जित हुआ। पश्चाताप करने लगा-‘मैने दामाजी- जैसे सच्चे सेवक पर बिना सोचे-समझे बेईमानी का दोष लगाया और उसे गिरफ्तार करने को फोज भेज दी। पश्चाताप के साथ बिटू का अदभुत सुंदर रूप हदय में एक विचित्र हलचल मचा रहा था।

    बादशाह को व्याकुल देखकर बिटू ने एक थैली बगल से निकाल कर सामने धर दी औऱ बोला- सरकार मुझे देर हो रही है। ये रूपये जमा कराके मुझे शीध्र रसीद दिलवा दे।

   बादशाह का जी नही चाहता कि बिटु सामने से एक पल को भी हटे; कितु किया क्या जाय? उन्होने उसे खजाची के पास भेज दिया।

    ग्रामीण ने थैली उलट दी, खजाची रूपये गिनने लगा। इसी बीच थैली फिर भर गई। कई बार थैली खाली हुई, औऱ भरी। जब तक अनाज की रकम पूरी नही हो गई, हैरान था। आखिर ग्रामीण रसीद लेकर चल पड़ा। रसीद लेकर बिटू फिर बादशाह के सामने आया। बादशाह ने रसीद पर हस्ताक्षर किये और शाही मुहर लगाकर रसीद दे दी। बिटू ने कहा- ‘मेरे स्वामी चिन्ता करते होगें। अब मुझे आज्ञा दीजिये।’ अभिवादन करके वह एकदम ओझल हो गया। बादशाह ने दीवान को आज्ञा दी कि ‘तुम शीध्रतापूर्वक जाओ और दामाजी पंत को सादर बंधन-मुक्त कर के साथ ले आओ।’

       जब वे यात्रा के मध्य दामा जी पंत के पास पहुँचे तो वह एक स्थान पर पड़ाव डालकर स्नान करके पाठ-पूजा कर रहे थे। गीता पाठ करने लगे उन्हे उसमें एक रूक्का दिखाई दिया। उत्सुकतावश उसे खोला दामा पंत जी तो धक् से रह गए। बेदरशाह की राजकीय रसीद थी वह जिस पर अनाज की पूरी राशि बिटटू चमार के हस्ते प्राप्त होने का उल्लेख था। प्रभु की अपार कृपा का स्मरण कर दामापंत जी गदगद् हो रोने लगे।

     उधर बादशाह की विचित्र दशा हो रही थी। बिटू के जाते ही वे जैसे पागल हो गये। ‘बिटू, बिटू’  की पुकार मचा दी उन्होने। चारों ओऱ घुड़सवार दौड़ाये गये, पर क्या बिटू इस प्रकार मिला करता है? जब सवार निराश होकर लौट आये, तब तो बादशाह की व्याकुलता की सीमा पार कर गयी। ‘बिटू कहाँ है?  वह बिटू  कहते पैदल ही वे राजधानी से बाहर दौड़ पड़े। उसी समय दामाजी सामने से आ रहे थे। बादशाह दौडकर उनके गले से लिफ्ट गये औऱ बड़ी कातरता से कहने लगे- ‘दामाजी! जल्दी बताओ, मुझे पापी को बताओ-वह प्यारा बिटू कहाँ है? मेरे प्राण निकले जा रहे है, दामाजी उस बिटू के सुन्दर सुख को देखे बिना में अभी मर जाऊँगा। देर मत करो। बता दो। मैं तुम्हारे पैरों पड़ता हूँ। मुझे बिटू का पता बता दो।’

     दामाजी तो हल्के-बक्के-से हो गये। वे बोले- ‘हजूर! कौन बिटू?’

     बादशाह ने कहा- दामाजी! छिपाओ मत! हाथ जोड़ता हूँ। अपने उस बिटू महार का पता जल्दी बता दो। वही साँवरा-साँवरा, लँगोटी लगाये, हाथ में लकुटी लिये तुम्हारे पास से रूपये लेकर आने वाला मेरा बिटू कहाँ है वह?’

     सहसा दामाजी के सामने से एक पर्दा हट गया। वे सारा रहस्य समझ गये। रोते-रोते वे बोले- ‘आप धन्य है! त्रिभुवन के स्वामी ने आपको दर्शन दिये। मुझे अभोगे के लिये वे सर्वेश्वर एक दरिद्र चमार बने औऱ एक सामान्य मनुष्य का अभिवादन करन आये। नाथ! मैने जिसका अन्न लुटवाया था, वह मेरे प्राण लेने के अतिरिक्त औऱ क्या कर सकता था? दयाधाम! सर्वेश्वर!आपने इतना कष्ट क्यों किया?’

     आर्द कण्ट से उन्होने कहा-“बादशाह सलामत, आप धन्य है कि आपको बिठोबा का अक्षय फल देने वाला दर्शन हुआ है। हे प्रभो, मेरे लिए आपने माहर का वेश धरा?-हे बिठोबा, दया करो.....” कहकर रोने लगे। “हे पाण्डु रंग! हे बिठोबा....” कहते-कहते दामा पंत जी मूर्छित हो गए। राजा ने उनके चरण पकड़ लिए- “मेरा अपराध क्षमा करना, महाराज।” कुछ ही समय बाद वही चित्तचोर ग्रामीण वेश-भूषाधारी श्यामकिशोर प्रकट हो गया। अपने दिव्य स्पर्श से उसने दामा जी को चेतना दी। बादशाह उसका दर्शन कर कृतकृत्य हो गया औऱ दामा जी तो अपने प्रिय पाण्डुरंग के चरणों में ही लिपट गए। भक्त की कृपा से घोर पापियों का भी उद्धार हो जाता है।

      दामाजी प्रेम में उन्मत होकर ‘पाण्डुरग! पाण्डुरग!’  पुकारते हुए मूर्छिच हो गये। भक्तवत्सल भगवान ने उन्हें उठाया। बादशाह भी उन सौदर्य-सागर के पुनः दर्शन करके क़ृतार्थ हो गया।

 

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