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ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम्। विश्वस्य एक परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वा अमृता भवन्ति ॥ 7 ॥            You are the Supreme Brahman, infinite, yet hidden in the hearts of all creatures. You pervade everything. They, who know You, are free from the cycle of birth, death and rebirth. (Svetasvatara 3 : 7)            परमात्मा सब प्रकार से सब काल में मुक्त और शुद्ध है। वह अपरिमित और अनन्त होते हुए भी सभी प्राणियों के हृदय में छिपा हुआ है। परमात्मा को जानने वाले व्यक्ति ही जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।

अज़ छि ज़्येठॖ ॴठम 30.05.2020 ज़्येठॖ (जेष्ठ) ज़ूनॖ पछॖ (शुक्ल पक्ष) ॴठम (अष्टमी) बटॖवार (शनिवार/शनिश्चरवार) श्री सप्तर्षि सम्वत 5096, राश सिंह (चलान) ....Today is Jyesth Maas Shukla Paksh Ashtamiyaam Shanivsasre sanayitaam. Kashmiri Pandit Nirvasan Samvat_31 Sapthrishi Samvat _5096
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डॉक्टर दुर्गाचरण  

 देशभक्त ज्ञानी और सन्तों की भूमि बंगाल मे नारायण गंज के समीप देवभोग नाम के छोटे से गाँव में दुर्गा चरण का जन्म हुआ था। आठ वर्ष की उम्र मे ही आपकी माता का शरीर शान्त हो जाने पर इनकी बुआ ने उनका पालन.पोषण किया। इनके पिता श्री दीनदयालए कोलकत्ता में छोटी सी नौकरी करते थे अतः उन्होने पिता के साथ जाकर कोलकते में प्रसिद्ध डॉक्टर भादुरी जी से होमियोपैथी की शिक्षा ग्रहण की । वैरागी स्वभाव के दुर्गाचरण शामशानों में जाकर मुर्दों को जलते देखते रहते और जीवन की नशवरता से प्रभावित  हो गए थे। वह सन्तों सन्यासियों की संगत में उठने दृबैठने लगे । बुआ की मृत्यु के बाद तो आपमें वैराग्य बहुत ही बढ़ गया ।
      जीवनोपार्जन से बेखबर सदा चिन्तन दृमनन में रहते थे लेकिन पिता के आग्रह करने.पर दुर्गाचरण ने चिकित्सक का का कार्य शुरू किया और जल्दी ही उनकी ख्याति सब ओर फैल गई ।लेकिन उनके साधारण से पहनावे और रहन.सहन के कारण शुरू में कोई भी डाक्टर मान ही नही पाता था । इसलिये इनके पिता ने एक बार पुत्र के लिये पैंट दृकोट बनवाकर पहनने के लिये दिया लेकिन बेटे ने यह कहकर कि जो धन आपने पेंट.कोट में लगायी इसे किसी गरीब पर लगाया होता तब इसका सही उपयोग होताए मेरे लिये तो यह कपड़े व्यर्थ ही है ।
    किसी मरीज को कितनी दूर भी देखने जाना पड़ता तब डॉक्टर साहब पैदल ही हाथ में सम्बन्धित सामान लेकर जाया करते थे और यदि मरीज गरीब होता तो वे फीस ही नहीं दवा के पैसे भी नहीं लेते थे । अनेक बार तो असहायों के लिये बाज़ार से फलादि तक स्वयं लाकर दे आया करते थे । कितनी बार जिन रोगियों के सिर पर छत नही होती उनको अपने घर ले आते और उनकी पूरी सेवा करते ।
     वैसे तो रोग दृरोगी दृचिकित्सक सम्बधित इनके जीवन में इतनी सच्ची घटनाएँ है कि यदि उनको लिखा जाये तो हजारों पृष्ठों का ग्रन्थ तैयार हो जाएगा। फिर भी मै कुछ जिनका बंगयात्रा के दौरान मुझे पता चला था उनमे से एक को लिखने का साहस कर रहा हूँ ।
    घटना ऐसी है कि एक बालक ने डॉ0 बाबू से जिसको आप जानते थे उसने कहा कि हमारे पडोस के काका बहुत बीमार पडे है। वहाँ उनके पास कोई नहीं है। डॉ0 बाबू ने इसे बच्चे द्बारा किया मजाक समझ कर अनदेखा कर दिया। लेकिन दोपहर को दवाखाना बन्द करते समय उस बालक की आवाज उनके कानों में गूँजी और डॉक्टर सहाब पहुँच गए मरीज के घर ।वहाँ जाकर देखा कि रोगी के पास कोई  नहीं है और रोगी कुछ अचेतावस्था में है। बस फिर क्या था आप उसकी दवा दृदारू और सेवा में लग गए । कभी दवा देतेए कभी पानी गर्म करतेए सर पर पट्टी रखतेए कभी उसके हाथ पैरो की मालिश करते। जब तक रोगी सहजावस्था में आया चार घण्टे लग चुके थे। जब डाक्टर बाबू को कुछ स्वस्थ होने का भरोसा हुआ तब वह दवा और खाने की विधि बताकर घर वापस आए। रात को डां बाबू फिर अपने रोगी को देखने गए जो कि टूटी.फूटी झोपडी में सर्दी से ठिठुर रहा थाएरोगी की स्थिति में सुधार थाएलेकिन अब भी उसके लिये सहजता से उठ पाना कठिन था।अतः डां साहब ने उसे लेटे रहने का ही इशारा किया। फिर मरीज की जाँच करके झोपडी में चारों ओर उनकी आँखे कुछ तलाशाने लगी लेकिन आँखे जो ढूढ रही थी वह उन्हे नही दिखा। दीखता भी कैसे वह वस्तु गरीब की झोपडी में थी ही नही। अतः कुछ देर रोगी की सेवा की जिससे रोगी को नींद आ गई और उसके सोते ही ठिठुरती सर्दी में डां मुशाये उठे और धीरे से अपनी गर्म चादर मरीज को उडाकर दबे पाँव झोपडी से बाहर हो गए और हथेलियों को बगलों में दबाए तीव्रगति से घर पहुँचे। प्रातः कुछ खाद्य सामग्री लेकर फिर अपने रोगी के पास पहँचे तो देखा कि रोगी चादर ओढे आँसू टकटकी लगाए झोपडी से बाहर देख रहा था मानों वह डाक्टर बाबू की ही राह देख रहा हो। डाक्टर बाबू के प्रवेश करते ही स्वस्थ रोगी उनके चरणों में गिर गया और अपने गर्म आँसुओं से डाँ बाबू के पैर पखार दिये। निःशब्द रोगी और डाँ बाबू अलौकिक आनन्द से भर उठ थे। डाँ बाबू ने रोगी की आँखों मे कृतज्ञाता देखी उसे प्रकट करने में मेरी लेखनी असहाय है। हाँए कोई अच्छा चित्रकार शायद उन भावों को रंग दे सकने मे समर्थ हो सकता है।
     इसी प्रकार अनेकों ह्दय.दावक घटनाओं से भरा पडा है हमारे डाँ नाग बाबू का जीवन। स्वयं उनके परिवार का जीवन भी इसी प्रकार के अभावों से भरा था। फिर भी वह जन.सेवा और भक्ति में लगे रहते थेए इसी कारण नगरवासी उन्हे भक्त डाँ बाबू के नाम से पुकारते थे। पित्र.भक्त भगवान में आस्था रखने वाले जन सेवक भक्त डाँ दुर्गाचरण नाग कभी भी अपने निजि काम के लिये नौकर नही रखते थे। वह अपनी ख्याती के कारण चाहते तोएअतुल सम्पति एकत्रित कर सकते थे। लेकिन ऐसा उन्होने कभी सोचा ही नही।फीस या दवा के कभी पैसे मागते ही न थे जिनकी जो इच्छा होती दे जाता अन्यथा नही भी। उधार माँगने वाले को कभी ना नही कहते थे।जितना भी जेब में होता दे देते। उनकी इन आदतों के चलते कभी दृकभी परिवार को भुजिया खाकर या बिना खाए एकादशी का वृत मान कर भूखा रहना पडता था। परन्तु गरीबो की सहायता करने में उन्होने अपनी गरीबी पर कभी नही सोचा। वह सबमे भगवान का वास मानते थेएगरीबों को तो खासतौर पर नारायण का रूप मानते थे।
     उनकी सेवाओं को कौन रोगी हैएकौन दुःखी हैए किसके पास खाने को नही जिसे उनकी जरूरत हैण्ण्ण् पता चलते ही निष्काम कर्मयोगी की तरह प्रभावित की सेवा में लग जाते।
     सीमित आए और सीमित साधानों के होते हुए भी भक्त डाँ बाबू अपने आकाश समान हदय के नीचे सबको ढके रहते थे।यदि वह अधिक वृद व्यक्ति का भी इलाज कर उसे न बचा पाते तो इसको वह अपनी असमर्थता और निजि हानि ही समझ अपने को दुखीः मानते और सम्बन्धित रोगी के परिवार से कुछ भी नही लेते थे।
    सदा सबकी सेवा में रत अपने कष्ठों को अनदेखा करते हुए डाँ नाग बाबू का परिवार लगभग अभाव में ही अपना जीवन व्यतीत करता रहा। मानव के प्रति उनका हदय बहुत ही भावुक था। अपने घर की टूट.फूट वह स्वयं ही ठीक करते रहते। वह किसी को भी कष्ट नही देना चाहते थे।फलस्वरूप उनका एक कमरा बरसात में टपकने कमरे में ही जाग कर रात काटनी पडी।
   यदि कभी कोई कारीगर घर की मरम्मत के लिये आता तब उसको चाय पिलाकर कारीगर की सेवा करते थे।
   उनके जीवन में ऐसी अनगिनत घटनएँ है जिनसे उनके सहजस्वाभावए भगवद्भभक्ति अहिसाए परदुःख कातरता एवं अनोखी सहनशीलता का प्रमाण मिलता है।वह परमहंस रामकृष्ण के शिष्य थे। स्वामी विवेकानन्द डाँ बाबू को परमहंस जी के असली पथगामी मानते थे।
   पित्रभक्त डाँ दुर्गाचरण नाग को सन्तों का साथ बहुत अच्छा लगता था। इसी प्रकार चलता रहा हमारे भक्त डाँ बाबू का जीवन और सब प्रकार के कष्टों को वह सहर्ष सहते रहे और  पिता की मृत्यु के दो.तीन वर्ष बाद ही डाँ नाग ने भी इस नश्वर संसार को छोड दिया।
 
 

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