Bhardwaj Muni मुनि भरद्वाज

मुनि भरद्वाज प्रयाग नगरी में रहते हैं उनकी भगवान श्री राम के चरणों में असीम श्रद्धा है।
वे तपस्वी मुनि जिनका चित्रा गृह बन्धनों से मुक्त है वो जितेन्द्रिय दया के सागर हैं तथा दूसरों के हितों पर चलने वाले बहुत ही समझदार मुनि हैं। 
वहाँ महऋषि भरद्वाज का अति पवित्रा आश्रम है जो कि बहुत सुन्दर है वह बड़े-बड़े मुनियों के मन को भाने वाला है।
तीर्थराज प्रयाग मंे ऋषि मुनी और समाज के जो लोग स्नान करने आते हैं वे सब भरद्वाज आश्रम में एकत्रित होते हैं और वह प्रातः की बेला में उठकर वहां स्नान करने के बाद आपस में मिल-जुलकर भगवान की लीलाओं का वर्णन करते हैं। 
वहां तीर्थ यात्रियों के संवाद का विषय ब्रह्मचर्चा, धर्म का क्या काम और धाfमकता को किस प्रकार बढ़ाया जाए तथा अज्ञान एवं विषयों से कैसे विराग हो आदि पर गहन विचार करके निर्णय पर पहुँचने का प्रयास करते हैं। भगवान में मनुष्य का भक्ति भाव कैसे बढ़े पर चर्चा करते हैं।
इस प्रकार भक्ति, ज्ञान व मुक्ति पर चर्चा करते हुए तीर्थ मार्ग सारे माघ के महीने स्नान करते हैं और स्नान का महीना पूरा होने पर सब अपने-अपने आश्रमों को लौट जाते हैं। यह तन-मन को शुद्ध करके आनन्द देने वाला समय हर वर्ष आता है तथा वहां आए मुनिजन मकर स्नान करके चले जाते हैं। 
एक बार जब सारे मुनिगण मकर स्नान कर पूरे तृप्त हो गए तब वह अपने-अपने आश्रमों में चले गए लेकिन भरद्वाज जी ने परम ज्ञानी याज्ञावल्क्य मुनि के चरण पकड़ लिये और उनको अपने आश्रम में ही रोक लिया। 
और भरद्वाज मुनि ने बहुत ही श्रद्धा से परम ज्ञानी याज्ञावल्क्य के चरण कमलों को धोकर प्रेमपूर्वक पवित्रा आसन पर बैठाया और उनकी आदर सहित पूजा करके ज्ञानी मुनि सुयश गाथाओं का वर्णन किया। फिर हृदय को छूने वाली अत्यन्त पवित्रा और कोमल भाषा में बोलेः-
भरद्वाज मुनि ने जिज्ञासा व संशय युक्त भाव से कहाः- हे नाथ! सारे वेदों का तत्त्व आपकी उंगलियों पर लिखा पड़ा है और मुझे यह कहते हुए शर्म आ रही है कि मैं अभी तक इससे अनभिज्ञ हूँ। अपने संशय को कहते हुए मुझे भय और लज्जा का अनुभव हो रहा है। यदि मैं अपने संशय को नहीं करूँगा तब मेरी बहुत हानी होगी, मैं अज्ञानी रह जाऊँगा। अतः कृपया आप मेरी जिज्ञासा का समाधान करने के लिये वेदों के गूढ़ तत्त्व को मुझे समझाने की कृपा करें।
कल्याण स्वरूप, ज्ञान और गुणों की राशि अविनाशी भगवान शम्भु निरन्तर राम नाम का जप करते रहते हैं। संसार में चार जाति के जीव हैं, काशी में आने से सभी परमपद को प्राप्त होते हैं।।2।।
हे प्रभो! जिनको त्रिपुरारी (शिवजी) जपते हैं वह दशरथ पुत्रा राम हैं या कोई और? समस्त सत्य को आप जानते हैं, कृपया सोच-विचार कर ज्ञान सम्मत जो सत्य है उसे उजागर करें।।46।।
   मन, वचन और कर्म से सभी प्रकार तुम भगवान श्री राम के सच्चे भक्त हो। मैं तुम्हारी चतुरता को भली प्रकार समझ गया हूँ। तुम्हारा लक्ष्य भगवान राम के गहन रहस्य युक्त गुणों को सुनना है। इसी लिये अपने को महान मूर्ख बताते हुए अपने जिज्ञासा युक्त प्रश्न को मानने के लिये मुझसे पूछा।।2।।
    ज्ञानी याज्ञावल्क्य ने प्रेम पूर्वक आदर देते हुए तात सम्बोधन से कहा कि तात मैं भगवान राम की सबको आनन्द देने वाली सुन्दर कथा को करता हूँ उसे तुम एक चित्त होकर आदरपूर्वक सुनो। भगवान श्री राम की कथा का श्रवण हर प्रकार के अज्ञान और मोह को नाश करने वाली है, चाहे वह अज्ञान महिषासुर के समान विशाल ही क्यों न हो। यह राम कथा उसे नष्ट करने वाली भयंकर मां काली है।

Online Chat

© 2021 - All Rights Reserved