Mulak Dass Baba बाबा मलूकदास  

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बाबा मलूकदास        अजगर करै न चाकरी

तुलसीदास जी का एक दोहा हैः
स्वपच सबर खस जनम जड़, पाँवर कोल किरात। 
राम कहत पावन परम होत भुवन विख्यात।।

राम का नाम जप कर अधम भी परम पवित्रा हो जाते हैं। यही नहीं, राम के प्रभाव से वे भुवन-विख्सात हो जाते हैं। लोकप्रिय हो जाते हैं। पन्द्रहवीं और सोलहवीं शताब्दी से संत कवियों के बारे में तुलसी का यह दोहा कितना सत्य है। ऐसे ही एक भुवन-विख्यात संत कवि हैंµ बाबा मलूकदास। नाम के प्रभाव और प्रताप को स्वयं मलूकदास जी ने भी स्वीकार किया हैः

राम नाम एक रती, पाप के कोटि पहाड़। 
ऐसी महिमा राम की, जारि करै सब छार।।

राम नाम की ऐसी ही महिमा है। जिस प्रकार रुई के विशाल भण्डार को एक ही चिनगारी भस्म कर देती है, उसी प्रकार प्रभु का नाम जन्म-जन्मान्तर के पापों को नष्ट कर देता है। इससे भी बढ़कर बात यह है कि नाम के नशे में जो मस्त हो गया है, उससे तो इन्द्र भी छोटा है। अर्थात् इन्द्र का सुख नाम-जप-सुख से तुच्छ हैः

गाँठी सत्त कुपीन में, सदा फिरै निःसंक। 
नाम अमल माता रहै, गिनै इन्द्र को रंक।।

बाबा मलूकदास का जन्म विक्रम संवत् 1631 में इलाहाबाद जिले के कड़ा स्थान पर हुआ था। जाति के वह कक्कड़ खत्राी थे। इनके पिता का नाम सुन्दरदास था। भक्ति मार्ग की ओर जाने में इन्हंे अपने गुरु श्री विट्ठल दास जी से प्रेरणा मिली। देखिए, इस पद में इन्होंने गाया हैःµ

अब तेरी सरन आयो राम। 
जबै सुनिया साध के मुख, पतित-पावन नाम।।
वही जान पुकार कीन्ही, अति सतायो राम। 
विषय सेती भयो आजिज कह मलूक गुलाम।।

विषय-वासना भगवत्-भक्ति में सबसे बड़ी रुकावट है। विषय छूट जाते हैं, पर अहंकार छूटना उससे भी कठिन है। मलूकदास जी ने अपने पदों में अत्यन्त सरल और चालू भाषा मंे भक्ति मार्ग का निरूपण किया है। मोह, ममता, अहंकार छोड़कर ही भगवत्-प्राप्ति हो सकती है। काम, क्रोध त्यागना भी आवश्यक है। 

आपा मेटि न हरि भजे तेइ नर डूबे। 
हरि का मर्म न पाइया, कारन कर ऊबे।।1।।
करें भरोसा पुत्रा का साहिब बिसराया। 
डूब गए तरबोर को कहुँ खोज न पाया।।2।।
साधु मंडली बैठि के, मूढ़ जाति बखानी। 
हम बड़ि हम बड़ि करि मुए, डूबे बिन पानी।।3।।
काम क्रोध सब त्यागि के जो रामै गावै। 
दास मलूका यूँ कहैं तेहि अलख लखावै।।4।।

मलूक दास जी के पदों में निरभिमानिता भी खूब झलकती है। 
पीड़ितों का दुःख हरना ही सबसे बड़ा धर्म है। 
“परहित सरिस धर्म नहीं भाई। 
पर पीड़न सम नहिं अधमाई“ की भावना को 

मलूकदास जी के इन दोहों में देखिएः
जो दुखिया संसार में, खोवो तिनका दुःख। 
दलिद्दर सौंप मलूक को, लोगन दीजै सुक्ख।।
दुखिया जन कोई दूलिये, दुखिये अति दुःख होय। 
दुखिया रोय, पुकारि है, सब गुण माटी होय।।
बाबा मलूकदास के दोहों और पदों में लोकोक्तियाँ और मुहावरे प्रचुर मात्रा में मिलते हैं। परहित की भावना से जहाँ उनका काव्य लोकप्रिय हुआा है, वहाँ इस विशेषता से उनकी वाणी बिना पढ़े-लिखे लोगों की जबान पर भी चढ़ गई। उनका यह दोहा किसने नहीं सुना होगाः-
अजगर करै न चाकरी, पंछी करै न काम। 
दास मलूका कह गए, सब के दाता राम।।

दृढ़ ईश्वर-निष्ठा की कैसी सुन्दर अभिव्यिक्ति है। ऐसी अटूट श्रद्धा से ही तो ‘उसका’ ज्ञान प्राप्त होता है। मलूकदास जी की ऐसी लोकप्रियता होते हुए भी, यह कैसे आश्चर्य की बात है कि और संत-कवियों की भाँति, उनके नाम पर कोई ‘पंथ’ नहीं चला। मलूकदास जी ने अपने जीवन-काल के 108 वर्षों में सम्प्रदायवाद की कड़ी भत्र्सना की।
ना वह रीझै जप तप कीन्हें, ना आतम को जारे। 
ना वह रीझै धोती टाँगै, ना काया के पखारे।।
दाया करै, धरम मन राखै, घर में रहे उदासी। 
अपना सा दुख सबका जानै, ताहि मिलै अविनासी।।

किसी मत-सम्प्रदाय से प्रभु प्रसन्न नहीं होते। 
उन दया-धाम को दया से ही पा सकते हैं या फिर दिल में ढूँढ़ने से ‘वह’ मिलेगा।

मक्का मदीना द्वारिका, बदरी और केदार। 
बिना दया सब झूठ है, कहै मलूक विचार।।


उसकी उपलब्धि हृदय में होगीः- 
तौजी और निमाज न जानूँ, ना जानूँ धरि रोजा। 
बाँग जिकर तबही से बिसरी, जब से यह दिल खोजा।।
कहैं मलूक अब कजा न करिहौं, दिल ही सौं दिल लाया। 
मक्का हज दिये मंे देखा, पूरा मुरसिद पाया।।

राम-भक्ति की महिमा जन-जन को बताते हुए, मलूकदास जी ने उपांशु जप को ही सर्वश्रेष्ठ बताया हैः-
जो तेरे घर प्रेम है तो कहि कहि न सुनाय। 
अन्तरजामी जानि हैं, अन्तरगत के भाय।।
औरः-    सुमिरन ऐसा कीजिए, दूजा लखै न कोय। 
होंठ न फरकत देखिये, प्रेम राखिये गोय।।

इस प्रेम की महिमा ही ऐसी है। अनन्य भाव को प्राप्त होकर मलूकदास जी कहते हैंः- 
माला जपौं, न कर जपौं, जिह्ना जपौं न राम। 
सुमिरन मेरा हरि करै, मैं पाया विश्राम।।
वे भगवान कितने दयालु हैं कि स्वयं भक्त का स्मरण करते हैः-

परस दयाल राया राय परसोत्तम जी, 
ऐसी प्रभु छाँड़ि और कौन के कहाइये।
सीतल सुभाव जाके तामस को लेस नहीं, 
मधुर वचन कहि राखै समझाइये।
भक्त बछल गुन सागर कला निधान, 
जौको जस पाँत नित वेदन में गाइये।
कहत मलूक बल जाउँ ऐसे दरस की, 
अधम उधार जाके देखे सुख पाइये।

तुलसीदास जी ने कहा
भूति भनिति कीरति भलि सोई। 
सुरसरि सम परहित जे¯ह होई।। 

कवित ऐश्वर्य तथा यश वही होता है, जो गंगा के समान परहितकारी हो। 
मलूकदास जी ने भी भगवत्भक्ति की पराकाष्ठा से अपनी वाणी को लोक-कल्याणकारी जनाकर पवित्रा किया है। मानवता के इस गायक ने आत्मिक विकास के लिए सबका उत्साह बढ़ाया है। 

साधू सन पूसौं चित लाई। जिनके दरसन हिया जुड़ाई।।
भाव-भक्ति करते निष्काम। निस दिन सुमिरैं केवल राम।।
साहिब मिल साहिब भये, कछु रही न तमाई। 
कहैं मलूक तिस घर गये, जहूँ पवन न जाई।।

 

 

 

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