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ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम्। विश्वस्य एक परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वा अमृता भवन्ति ॥ 7 ॥            You are the Supreme Brahman, infinite, yet hidden in the hearts of all creatures. You pervade everything. They, who know You, are free from the cycle of birth, death and rebirth. (Svetasvatara 3 : 7)            परमात्मा सब प्रकार से सब काल में मुक्त और शुद्ध है। वह अपरिमित और अनन्त होते हुए भी सभी प्राणियों के हृदय में छिपा हुआ है। परमात्मा को जानने वाले व्यक्ति ही जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।

अज़ छि ज़्येठॖ ॴठम 30.05.2020 ज़्येठॖ (जेष्ठ) ज़ूनॖ पछॖ (शुक्ल पक्ष) ॴठम (अष्टमी) बटॖवार (शनिवार/शनिश्चरवार) श्री सप्तर्षि सम्वत 5096, राश सिंह (चलान) ....Today is Jyesth Maas Shukla Paksh Ashtamiyaam Shanivsasre sanayitaam. Kashmiri Pandit Nirvasan Samvat_31 Sapthrishi Samvat _5096
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अष्टावक्र  Aashtavrak

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अष्टावक्र 

राजा जनक का नाम आपने सुना ही होगा कि देह  के होते हुए भी वे विदेह कहलाते थे। कभी यह भी विचार किया है कि वे विदेह कैसे हो गये जबकि गृहस्थ के सब कार्य करते थे। उनके जीवन की एक घटना को अच्छी प्रकार विचार करने पर पता लग जायेगा कि वह कौन-सा साधन गुरु में मिला जिससे वे विदेह (जीवन मुक्त) कहलाये। एक समय जनक जी को बड़ी बेचैनी थी। अर्धरात्रि तक उनको नींद भी नहीं आयी। उन्होंने सोने के लिए बड़ा ही प्रयत्न किया परन्तु बेचैनी दूर न हुई। अर्ध रात्रि के उपरान्त उनको एक झपकी आयी। वे स्वप्न में क्या देखते हैं कि मेरा सब राज्य शत्राुओं ने छीन लिया है और मैं उनके भय से नगर छोड़ कर वनों में भाग गया हूँ। वहाँ पर मुझे बहुत ज़ोर की भूख लगी हुई है। एक ग्राम में मैंने एक बुढ़िया ब्राह्मणी के द्वार पर जाकर कहा- माता जी! यदि आपके पास कुछ खाने को हो तो दो। बुढ़िया कहने लगी- बेटा! मेरे पास खाने को तो काई पदार्थ नहीं है। हाँ, यदि इच्छा हो तो दाल चावल रखे हैं, तुम खिचड़ी बना कर खा लो। मैंने उस बुढ़िया से दाल-चावल लेकर उसकी झोंपड़ी के बाहर ही एक वृक्ष के नीचे बैठकर खिचड़ी बनानी प्रारंभ की। लकड़ियो गीली होने के कारण अग्नि अच्छी प्रकार नहीं जलती थी। इस कारण बारम्बार फूँक लगाते रहने से नेत्रों में धुआँ घुसने से आँसुओं की धारा बंधी हुई थी।
    इधर भूख भी बेचैनी को बढ़ाती जाती थी। अभी खिचड़ी कुछ कच्ची, कुछ पकी ही थी कि मैंने खाने के लिए पत्तों पर ठंडा होने के लिए रख दिया। खिचड़ी अभी ठंडी भी नहीं होने पायी थी कि अकस्मात् दो सांड लड़ते-लड़ते खिचड़ी पर आ गिरे और सारी खिचड़ी को धूल में मिला दिया। खिचड़ी के बिखरने से मुझे और भी अधिक संताप हुआ और जोर-जोर से रोने लगा। इतने में मेरी आँखें खुल गईं। भय के मारे मेरा शरीर काँप रहा था। मैं विचार करने लगा कि यह क्या तमाशा है, अभी-अभी एक मुट्ठी खिचड़ी खाने के लिए तड़फ रहा था और दूसरे क्षण चक्रवर्ती राजा हूँ। इन दोनों में कौन-सा सत्य है, अवश्य जानना चाहिए। इस समय तो मुझे वह याद है परन्तु उस समय तो मुझको इसकी याद भी नहीं थी कि मैं सुन्दर पलंग पर सोया हुआ हूँ और मेरा इतना बड़ा राज्य है। जनक जी ने उठते ही सारे राज्य में मुनादी करा दी कि जो राजा जनक के प्रश्न का उत्तर देगा उसको राजा जनक अपना गुरु बनायेंगे।
    जनक जी ने एक ऐसे स्थान पर प्रबन्ध किया जिसमें वही व्यक्ति प्रवेश कर सकता था जो राजा की बात का उत्तर दे। गुरु के लिए एक ऊँचे स्थान पर स्वर्ण सिंहासन लगाया गया था और शेष विद्वानों, महात्माओं और पण्डितोें के लिए नीचे स्थान पर बैठने का प्रबन्ध किया गया था। राजा जनक की आज्ञा थी कि जो कोई उत्तर देने के लिए इस दरबार में प्रवेश करेगा और उत्तर न देगा तो फलस्वरूप मेरे प्रश्न का उत्तर मिलने तक कैद करके रखा जायेगा। यदि कोई सिंहासन पर बैठकर उत्तर देना चाहे तो उस पर बैठकर भी उत्तर दे सकता है परन्तु उत्तर न दे सका तो उसको मृत्यु दण्ड दिया जायेगा और जो नीचे खड़ा होकर उत्तर देगा तो उत्तर ठीक न होने पर केवल बन्दी रखा जायेगा। खाने, पीने और नित्य क्रिया कर्म का पूरा प्रबन्ध होगा। जनक जी ने गुरु बनने की आकांक्षा से बडे़-बड़े विद्वान, चतुर्वेदी, द्विवेदी, षट्शास्त्राी, तपस्वी, महामंडलेश्वर, महात्मा आ-आकर उत्तर देने लगे परन्तु मृत्यु के भय से सभी नीचे खड़े होकर उत्तर देते थे। उन आने वालों में से जनक जी की कोई भी तसल्ली न कर सका अर्थात् वेदों के महावाक्य ‘अहं ब्रह्मस्मि’ ‘तत्वमसि’ को सुनाया और बताया कि सारा जगत् मिथ्या है, ब्रह्म ही सत्य है। जनक जी का केवल बातों के पकवान से पेट न भरा। कितने ही आ-आकर बन्दी हो गये।
    अष्टावक्र के पिता भी जनक के बन्दी हो गये थे। एक दिन अष्टावक्र जब बालकों में खेलने के लिये गये तो उन बालकों ने उनको अपने संग खेलने से मना करते हुए कहा कि हम एक बन्दी के लड़के को अपने संग नहीं खेलने देंगे। अष्टावक्र अपनी माता से कहने लगे- मैया! बताओ कि मेरे पिता किसके और किस स्थान पर बन्दी हैं, मैं उन्हें अवश्यमेव छुड़ा कर लाऊँगा। मुझे तभी शांति मिलेगी। माता ने कहा- बेटा! वे तो बन्दी हो ही गये हैं, तुम मत जाओ, नहीं तो तुम्हें भी बन्दी होना पड़ेगा क्योंकि वहाँ जब बड़े-बड़े धुरन्धर विद्वान भी उत्तर न दे सके फिर तुम तो एक छोटे से बालक हो। माता ने अपने पुत्रा को बहुत समझाने का प्रयत्न किया परन्तु अष्टावक्र किसी भाँति भी जाने से न माने। तब हार कर माता ने राजा जनक का पता बता दिया। मिठाई का लालच देकर कुछ बालकों की सहायता से अष्टावक्र जनक के दरबार पर पहुँचे। जक अन्दर जाने लगे तो दरबानों ने रोका और कहा कि भाई, तुम अन्दर मत जाओ। अन्दर जाने पर बन्दी बना लिये जाओगे। अष्टावक्र जी ने कहा- मैं तो राजा के प्रश्न का उत्तर देने जा रहा हूँ। दरबानों ने कहा कि जब बड़े-बड़े ‘तत्त्वमसि’ ‘अहं ब्रह्मस्मि’ कहने वाले भी उत्तर न दे सके तो तुम क्या उत्तर न दे सके तो तुम क्या उत्तर दोगे?’ अष्टावक्र कहने लगे कि यदि मुझे आप लोग अन्दर नहीं जाने दोगे तो जनक जी से तुम्हारी शिकायत करूँगा। दरबानों ने जनक जी के भय के कारण बालक को अन्दर जाने दिया। अष्टावक्र जी दरबार में पहुँचे और जाते ही स्व£णम सिंहासन पर विराजमान हो गये। उनको देखते ही सारा विद्वत् समाज खिल-खिलाकर हँस पड़ा। उनको हँसता देखकर अष्टावक्र भी खूब जोर से हँसने लगे और राजा जनक जी से कहने लगे- हे राजन्! तुमने ये चमार क्यों इकट्ठे किये हैं? राजा जनक हाथ जोड़ कर कहले लगे- महाराज! ये सब विद्वान ब्राह्मणों का समाज ही है। आप इनको चमार कयों कह रहे हैं? अष्टावक्र जी कहने लगे- राजन्! इनमें एक भी ब्राह्मण नहीं है। यदि ये ब्राह्मण होते तो आठ अंगों के टेढे-मेढे़ शरीर को देखकर कभी भी न हँसते, ब्राह्मण वह है जो ब्रह्म को जानने वाला हो अर्थात् जो सब शरीर में निवास करने वाली आत्मा को जानता हो, आत्मदर्शी हो।’ ‘विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। शूनि चैव श्वपाके च पण्डिंताः समद£शनः विद्या।’ विनयमुक्त ब्राह्मण में तथा गौ, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल में जो एक ही आत्मा को देखता है उसे ही ज्ञानी अथवा ब्राह्मण कहते हैं।
    हे राजन्! ये सब चमड़े के पारखी हैं तभी तो मेरे इस भद्दे और टेढ़े-मेढ़े चमड़े के शरीर को देख कर इनको हँसी आयी। मेरा शरीर ही तो टेढ़ा है आत्मा तो टेढ़ी नहीं है, वह तो सब में ही एक रस समान रूप से व्यापक है। गन्ना तो टेढ़ा होता है परन्तु उसमें जो रस है वह टेढ़ा नहीं होता है, नदी भले ही टेढ़ी हो पर बहने वाला जन टेढ़ा नहीं होता है। अष्टावक्र की बातों को सुनकर सारा विद्वत् समाज उनके मुख की ओर देखता रह गया और कोई भी उत्तर न बन पड़ा। जनक जी को ऐसा सुनने पर धीरज हुआ और पूर्ण विश्वास हो गया कि ये मेरे प्रश्न का उत्तर दे सकेंगे।
    तदुपरान्त जनक के मंत्राी अष्टावक्र के सम्मुख हाथ जोड़कर कहने लगे- महाराज, जनक जी का प्रश्न है कि ‘जागृति सत्य है या स्वप्न?’ अष्टावक्र कहने लगे- क्या राजा जनक के मुँह में जिह्वा नहीं है, जो उनकी ओर से आप बोल रहे हैं? जनक जी ने ऐसा सुना तो अष्टावक्र के चरणों में शीश झुकाते हुए हाथ जोड़कर कहने लगे- महाराज, मेरा प्रश्न यह है कि ‘यह सत्य है या वह सत्य है?’ अष्टावक्र जी ने कहा-न यह सत्य है न वह सत्य है। जनक जी ने विचारा था कि स्वप्न तथा जागृति में एक तो अवस्था सत्य ही बतायेंगे, परन्तु ये तो दोनों को ही असत्य बता रहे हैं, इस कारण और भी संदेह उत्पन्न हो गया। फिर विचार कर पूछा कि महाराज, फिर सत्य क्या है? अष्टावक्र कहने लगे, सत्य का ज्ञान गुरुद्वारा ही होता है। इसलिए प्रथम यह बताओं कि गुरुदक्षिणा में क्या दोगे? राजा जनक ने कहा- महाराज, यह सारा राज्य आपके चरणों में अ£पत है। अष्टावक्र ने कहा- यह राज्य तो तुम्हारे से पहले तुम्हारे पिता का था और इसके उपरान्त तुम्हारे पुत्रा का होगा। केवल थोड़े समय के लिए बीच में तुम्हारा है। इसलिए अपनी वस्तु भेंट करो। जनक ने कहा- महाराज! स्त्राी, पुत्रा आपके लिए भेंट हैं।
    अष्टावक्र ने कहा कि वे भी तुम्हारे नहीं हैं, क्योंकि न साथ लाये थे और न ले जाओगे। जनक ने कहा कि यह शरीर ही आप के लिए भेंट है। अष्टावक्र जी कहने लगे कि यह संग आया तो है परन्तु तुम्हारे साथ नहीं जायेगा। हमें वही वस्तु भेंट में चाहिए। राजा जनक का कहना था कि मैं गुरु उनको बनाऊँगा जो मुझे परमतत्त्व का ज्ञान इतने ही समय में कर दे जितनी देर में घोड़े की एक रकाब में एक पांव रखने के उपरान्त उछल कर दूसरी रकाब में दूसरा पाँव डाले। जब शिष्य गुरु को मन अर्पण कर देता है तो उसके पास कुछ बाकी नहीं रहता है। महात्मा कबीर कहते हैंः ‘मन दिया तिन सब दिया, मन के लार शरीर। अब देवन को कुछ नहीं, कह गये दास कबीर।।’ अष्टावक्र जी जनक जी को साथ लेकर वन गये और जनक जी से कहा कि घोड़े की एक रकाब में पाँव रख लो मैं तुम्हें परमतत्व का ज्ञान कराऊँगा। राजा जनक ने ऐसा ही किया। अष्टावक्र कहने लगे कि बताओ, तुम्हारा मन किसका है? जनक ने कहा- महाराज, आपका ही है। अष्टावक्र ने सर्वव्यापक परमात्मा के नाम का ज्ञान कराते हुए कहा कि यह अविनाशी प्रणव ही परब्रह्म परमात्मा का नि£वशेष रूवरूप है। यही परमेश्वर की प्राप्ति के लिए सब प्रकार से सर्वश्रेष्ठ साध्य है। इसलिए मेरी आज्ञानुसार मुझे दिये हुए मन का श्रद्धा और प्रेम पूर्वक इस नाम में लगा दो। राजा जनक ने नाम में मन को लगा दिया। अष्टावक्र जी तुरन्त ही वहाँ से चले गये। 
    जब अष्टावक्र प्रस्थान कर गये तो राजा जनक सोचने लगे कि दूसरे पाँव को रकाब में डालूँ या न डालूँ परन्तु फिर विचार किया कि मन तो गुरु महाराज जी को दे दिया है और उनकी आज्ञा है कि मन को नाम में लगाओ। इसलिए मन की इस आज्ञा को न मान कर नाम में ही मन को लगाना चाहिए। राजा जनक ने नम को नाम सुमिरण मंे लगाया और विदेह हो गये। शरीर का कुछ भी भान न रहा। कुछ काल पश्चात् अष्टावक्र जी आये और राजा जनक से कहा कि अब जाओ, राज्य मेरा समझ कर करो और मन से सत्य नाम का सुमिरण करते रहो। अब तुम्हें कोई भी कर्म बाँध नहीं सकेगा। इसी अभ्यास को करते राजा जनक विदेह, मुक्त हो गये। इसके उपरान्त सब ब्राह्मणों को ज्ञान की ओर लगाया गया।

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