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Rig Veda      इममिन्द्र सुतं पिब ज्येष्ठममर्त्यं मदं।     शुक्रस्य त्वाभ्यक्षरन्धारा ऋतस्य सादने।। ऋग्वेद १-८४-४।।               हे इंद्र (जीवात्मा), तुम अमृत्व और भक्ति का रस पान करो। पवित्र और आनंदमय उपासना की सत्य और विधियुक्त धाराओं को अपने हृदयप्रदेश में बल और महिमा प्रदान करने के लिए बहने दो। (ऋग्वेद १-८४-४)            O Indra (soul), you drink the juice of immortal and devotion. Let the purifying and blissful streams of devotion flow for you into the seat (heart) of truth and law to achieve pure and brilliant power and glory. (Rig Veda 1-84-4)

02.06.2020 अज़ छि न्यर्ज़ला काह (निर्जला एकादशी) ज़्येठॖ (ज्येष्ठ) ज़ूनॖ पछॖ (शुक्ल पक्ष) काह (देवादेव) (एकादशी) बॊम्वार (मंगलवार) श्री सप्तर्षि सम्वत 5096, Jyesth Maas Shukla Paksh Nerzala Ekadashmiyaam Partamiyaam Duadashmiyaam Mangalvaasra sanayitaam. Kashmiri Pandit Nirvasan Samvat_ 31 Sapthrishi Samvat _ 5096
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