Vyas Dass Bhakt भक्त व्यासदास

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भक्त व्यासदास        श्यामाश्याम की अनुकम्पा
श्री राधाकृष्ण के महाभाग भक्त व्यासदास जी अपने प्रभु श्यामसुन्दर से नित्य अभिन्न थे। सच्चा भगवद्भक्त यह अटल विश्वास रखता है कि आकाशा, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वि, ग्रह-नक्षत्रा, प्राणी, दिखाएँ, वृक्ष, वनस्पति, नदियाँ, समुद्र सबके सब भगवान के शरीर हैं। सभी रूपों में नन्दनन्दन वृन्दावन-बिहारी भक्तवत्सल प्रकट हुए हैं। व्यास-दास जी जे यह कथन अपने जीवन में चरितार्थ कर दिय। भगवान जिसे कृपावश अपनी शरण में लेते हैं, उसे मानरहित कर देते हैं, मानों सोने को तपा कर सुन्दर बनाना उनका नियम है। व्यासदास जी का पूर्व आश्रम का नाम हरिराम था। वह ओरछा (बुन्देलखण्ड) नरेश के राज्य पुरोहित पण्डित सुमोखन शर्मा के यहाँ मार्ग कृष्ण पंचमी, संवत् 1567 को प्रकट हुए थे। बालकाल से ही हरिराम बड़े मेधावी थे। युवावस्था आते-आते वह वेद-शास्त्रा, छन्द, व्याकरण और शास्त्रों के विद्वान माने जाने लगे। उनकी बुद्धि प्रखर और युक्ति-संगत तर्क प्रस्तुत करने में अद्वितीय थी। ओरछा नरेश मधुकरशाह इनकी विद्वता एवं धर्मपरायणता पर मुग्ध थे। अतः पण्डित सुमोखन शर्मा के परलोकवासी होने पर इन्हें राजपुरोहित बना दिया। पण्डित हरिराम को शास्त्रार्थ का व्यसन हो गया। बड़े-बड़े नामी पण्डितों को शास्त्रार्थ में पराजित कर इन्होंने अपनी धाक जमा दी। राजा भी अपने राज्य पुरोहित की पण्डिताई पर अभिमान करने लगे। जहाँ भी पण्डित हरिराम शास्त्रार्थ के लिए जाते वहीं राजा मधुकर शाह इनके साथ अंगरक्षक भेज देता। एक बार हरिराम काशी गए वहाँ भी विद्वानों की सभा ने इनके शास्त्राज्ञान की उत्कृष्टता को स्वीकार किया। श्रवण मास था। पारिवारिक संस्कारवश इन्होंने बड़े विधि-विधान और श्रद्धा से भगवान विश्वनाथ का अभिषेक किया। यह बहुत प्रसन्न थे। वस्तुतः उनके हृदय में कहीं पण्डिताई का अभिमान छुपा बैठा था। उसी रात्रि स्वप्न में इन्हें एक साधु ने दर्शन दिए और शंका कीµ “विद्या कब सफल है?” इन्होंने स्वप्न में ही शंका-समाधान कियाµ “सत्यासत्य का विवेक कर ज्ञेय पदार्थ को जानने में ही विद्या की सफलता है।” अब साधु ने अपनी आँखों से आवरण हटायाµ “जब विद्या की पूर्णता प्राप्तव्य पदार्थ को पाने में है तो शास्त्रार्थ में दूसरों को लज्जित करने में तुम्हें क्या मिलता है? जो उपदेश मुझे कर रहे हो, उसी सत्य को स्वयं क्यों नहीं समझते? वह ज्ञेय पदार्थ केवल भक्ति से ही प्राप्त होता है। अतः विद्या की पूर्णता भक्ति से है। अधूरी विद्या का आडम्बर ढोते हुए क्यों विचर रहे हो?”
प्रातःकाल पण्डित हरिदास जागे तो उनका अन्तर जाग चुका था। बुद्धि जाग चुकी थी। वह तुरन्त ओरछा आए। मन में बार-बार यही ध्वनि आ रही थीµ ‘वही विद्या पढ़, जामें भक्ति का प्रबोध होय।’ धन-वैभव, राजसी ऐश्वर्य, प्रतिष्ठा, विद्वताµ ये सभी सांसारिक प्रभुता, राग और भोग जिनके पीछे वह सब दौड़ रहे थे, भक्ति के पथ में बाधक दिखाई देने लगे। मनुष्य का वास्तविक जागना तो तभी है जब समस्त सांसारिक विषयों से विराग उत्पन्न हो जाय। संयोगवश उन्हीं दिनों महाप्रभु हित-हरिवंश जी के एक शिष्य संत श्री नवलदास जी ओरछा पधारे। संत-चरणों में हरिराम जी का भी अनुराग जाग चुका था। उन्होंने नवलदास जी का सत्कार किया और सत्संग लाभ भी लिया। राम जिस पर कृपा दृष्टि डालते हैं, उसे ही सच्चे संत मिलते हैं। नवलदास जी के उपदेश का हरिराम जी पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि वह संवत् 1467 के का£तक मास में वृन्दावन आ गए। महाप्रभु हित-हरिवंश के पास जब वह उपस्थित हुए तो वह श्री राधावल्लभ के लिए भोग-सामग्री तैयार कर रहे थे। हरिराम जी ने उनसे वार्तालाप का आग्रह किया तो हरिवंश जी ने चूल्हा शांत कर दिया। इस पर हरिराम ने अपनी पण्डिताई के अभिमानवश और कुछ लज्जित होकर कहाµ “दोनों काम साथ-साथ हो सकते थे, आपने चूल्हा क्यांे बुझा दिया?”
महाप्रभु ने समझायाµ “दो कामों में चित्तवृत्ति लगाना तो व्यभिचार है। ऐसी चित्तवृत्ति काल सर्प से ग्रसित समझनी चाहिए। उसे काल-नाग से मुक्त कराने का एकमात्रा उपाय है चित्त का सब ओर से निरोध कर श्यामाश्याम के चरणाविन्द में संयुक्त कर देना।” हरिराम का मोह दूर हो गया। हितहरिवंश जी ने उनका  अन्तःकरण निर्मल कर दिया। उन्हें दीक्षा देकर कृतार्थ किया। ओरछा का राज्य-पुरोहित अब व्यासदास हो गया और सेवाकुंज की कुटिया में रहकर श्रीराधाकृष्ण के युगल-स्वरूप की भक्ति में तल्लीन हो गया। राजा मधुकर शाह स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के उपासक थे। अपने राज्य पुरोहित का कुशल समाचार एवं उनकी श्रीराधाकृष्ण की भक्ति का वृत्तान्त सुन कर उन्होंने अपने सेवकों को इन्हें ओरछा वापस लाने के लिए वृन्दावन भेजा। राजसेवकों के आगमन का समाचार जानकर हरिराम जी श्रीजमुना जी के तट पर झाऊओं में छिपते फिरे। जब गुरु भाइयों ने इन्हें ढूँढ़कर गुरु का आदेश सुनाया तो यह देर तक श्रीयमुना जी में स्नान करते रहे। तदनन्तर अपने मुँह पर कोयला घिस कर पोत लिया और एक गधा पकड़ कर गुरु स्थान की ओर चले। अपने गुरु भाइयों से इन्होंने कहाµ “गुरु मुझे वृन्दावन से निकालना चाह रहे हंै। उस समय गधा मिले या न मिले, इसलिए मैंने अभी से गधा साथ ले लिया। मुँह काला करके गधे पर चढ़कर मैं फिर संसार में जाऊँगा।...” श्री हितहरिवंश जी ने जब यह समाचार सुना तो उनके नेत्रा भी शिष्य की उत्कट भक्तिभावना के कारण अश्रुप्लावित हो आए। उन्होंने राजसेवकों को लौटा दिया। पर मधुकर शाह को इनके न लौटने का दुःख था। उन्होंने पुनः मंत्राी को भेजा। मंत्राी वृन्दावन आए। उन्होंने इनके साथ अपने कुछ अनुचर लगा दिए ताकि कहीं फिर छुप न जाएँ। दूसरे दिन जब ठाकुर जी को राजभोग आने के पश्चात् साधुओं ने पंक्तिबद्ध हो प्रसाद ग्रहण किया तो व्यासदास जी ने भक्तों के उठ जाने पर उनकी पत्तलों में से ‘सीथ’µ उच्छिष्ठ उठाकर खाना आरम्भ किया। मंत्राी की उनमें अश्रद्धा हो गई। उसने सोचाµ ‘राज्य पुरोहित आचारहीन हो गए हैं।’ परन्तु उन्हें इतना विवेक कहाँ था कि वह आज अखिल ब्रह्माण्ड के नायक के राज्य पुरोहित हो चुके थे। वह ओरछा लौट गया। राजा से सारा वृत्तान्त कहा। पर मंत्राी के विचारों से सहमत न हो राजा तो उलटा गद्गद् हो गए। अब वह स्वयं अपने भगवद्भक्त राज पुरोहित को सादर लिवा जाने वृन्दावन आए। ‘भाई, वह महापुरुष एक बार ओरछा पधारे तो मैं धन्य हो जाऊँ। 
राजा ने वृन्दावन आकर इनके चरणों में अपनी प्रार्थना रखी। पर व्यासदास जी भगवान की लीलाओं और उनके भव्य दर्शन, शृंगार और उत्सवों की आढ़ में मधुकर शाह को टालते रहे। अन्त में गुरु जी ने समझाया कि ‘राजा कर रहे हैं तो एक दिन को ओरछा हो आओ, हानि क्या है?’ अब तो व्यासदास जी की दशा देखने ही योग्य थी। वह ससुराल जाने वाली बेटी की तरह वृन्दावन के एक-एक कदम्ब और तमाल से भुजाएँ पसार कर मिलने लगे। रोते जाते और उन्हें कण्ठ से लगाकर भावविभोर हो जाते। “तुम्हारे बिना मैं एक क्षण भी कैसे रहूँगा... तुम मेरे सर्वस्व हो....” किसी लता को भेंटते तो कहतेµ “तुम्हीं मुझ पर दया करो...।” प्रभु की मनोहारी छवि ही उन्हंे सर्वत्रा दृष्टिगत होने लगी। आर्द्र कण्ठ से वह कहतेµ “मेरे पुरुषार्थ तुम्हीं हो। मुझसे क्या अपराध बना है, श्यामाश्याम जो जाने को कहते हो?... अच्छा, भेजना ही है तो मेरा शरीर भेज दो.... हृदय तो अपने पास रहने दो।...” उनकी करुणा से राजा द्रवित हो गए। उनके पैर छू कर बोलेµ “मैंने आपको व्यर्थ कष्ट दिया.... आपका तो वृन्दावन के कण-कण में अटूट अनुराग है। मुझे उपदेश करके कृतार्थ करो, प्रभु....।” संत-सेवा का उपदेश ग्रहण कर राजा ओरछा लौट आए। व्यासदास जी भगवत्सेवा में अब संसार को पूर्णतः भूल चुके थे। उनकी दृष्टि में अब सब कुछ श्रीराधाकृष्णमय हो गया था। भजन, पूजा, रासलीला और संत-सेवा में उनका जीवन सार्थ हो उठा। एक बार रासलीला के समय श्री राधारानी का नूपुर टूट गया। व्यासदास जी ने तुरन्त अपना यज्ञोपवीन तोड़ घुँघुरूँ बाँध दिए। हँस कर बोलेµ “आज जनेऊ सार्थक भयो। अब ताईं तो यह बोझ ही हतो।” भगवान श्रीराधाकृष्ण इन्हें कृपापूर्वक अपनी मनोहारी छवि का दर्शन देकर धन्य कर चुके थे। ठाकुर जी को शृंगार धराते समय इनसे एक अवसर पर पाग (पगड़ी) नहीं बाँधी। चिकनाई के कारण वह बारम्बार फिसल जाती। इन्होंने ऊबकर कहाµ ”मेरी बाँधी पाग नाहीं जँचै तो आपुहि बाँध लै।” इन्हांेने पीठ  फेरी और भक्त-हृदय ठाकुर जी ने स्वयं पाग बाँध लिया। इसी प्रकार एक अन्य अवसर पर ओरछा नरेश द्वारा भेंट स्वरूप प्रदान की गई रत्नजड़ित मुरली जब ठाकुर जी को धराने लगे तो बाँसुरी मोटी होने से ठाकुर जी की अंगुली छिल गई। वह दुःख से हृदय भर लाए। तभी ठाकुर जी ने स्वयं वह वंशी धारण कर ली। संत-सेवा इनकी भक्ति का विशिष्ट अंग था। एक बार एक संत ने इनकी परीक्षा लेनी चाही। जब भोग धराया उसी समय आकर बोलेµ “मुझे बड़ी भूख लगी है।.... कुछ दे दो।” इन्होंने कहाµ“तनिक धैर्य रखें! अभी भोग उसार लें, तो दे...।”
“मोअ तो सबर नाय है....” वह संत जाने लगें तो उन्होंने तुरन्त ठाकुर जी के आगे से थाल उठाकर इन्हें अ£पत किया। भोजन करने के उपरान्त संत ने इनके सिर पर थाल पटक मारा। इन्हें ¯कचित भी आवेश नहीं हुआ। यह जूठन उठा-उठाकर प्रसन्नता से उस प्रसाद की सराहना करके खाने लगे। वह संत तब इनकी चरण रज लेने को झुके। तब इन्होंने पीछे हट कर स्वयं उनके चरण छू लिए। निर्मल, निष्कपट, उदार, संत-सेवी और श्रीराधाकृष्ण चरणानुरागी व्यास दास जी इस प्रकार संतों को ही हरि का सच्चा मन्दिर मानते थे। कालान्तर में उन्होंने अपनी पत्नी को दीक्षा देकर ‘वैष्णवदासी’ नाम दिया और एक पुत्रा को भी चतुर युगलकिशोर दास नाम से हरि-सेवा में प्रवृत्त किया।

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