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ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम्। विश्वस्य एक परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वा अमृता भवन्ति ॥ 7 ॥            You are the Supreme Brahman, infinite, yet hidden in the hearts of all creatures. You pervade everything. They, who know You, are free from the cycle of birth, death and rebirth. (Svetasvatara 3 : 7)            परमात्मा सब प्रकार से सब काल में मुक्त और शुद्ध है। वह अपरिमित और अनन्त होते हुए भी सभी प्राणियों के हृदय में छिपा हुआ है। परमात्मा को जानने वाले व्यक्ति ही जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।

अज़ छि ज़्येठॖ ॴठम 30.05.2020 ज़्येठॖ (जेष्ठ) ज़ूनॖ पछॖ (शुक्ल पक्ष) ॴठम (अष्टमी) बटॖवार (शनिवार/शनिश्चरवार) श्री सप्तर्षि सम्वत 5096, राश सिंह (चलान) ....Today is Jyesth Maas Shukla Paksh Ashtamiyaam Shanivsasre sanayitaam. Kashmiri Pandit Nirvasan Samvat_31 Sapthrishi Samvat _5096
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आदि कवि वाल्मीकि Valmiki Rishi

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रत्नाकर एक ब्राह्मण घर में पैदा हुआ था। बचपन से ही कुसंगत में पड़ने से वह क्रूर सभाव का बन गया था। धर्म- कर्म कि तरफ तो विचार ही नहीं आया। विद्या श्ी प्राप्त नहीे की। वनों व जगलो में घूमता रहता था। बड़ा हुआ तो षादी हो गयी। परिवार के श्रण- पोषण के लिये वह लोगो को लूटता। वन में छिपा रहता और उधर से निकलने वाले यात्रियों को लूटता व मार श्ी ड़ालता। ऐसा ही बहुत दिनो तक चलता रहा।
  जब जीव के कल्याण का समय आ पहुँचता है, तभी उसे सच्चे साधु के दर्षन होते हैं। ऐसा ही रत्नाकर के साथ श्ी हुआ। एक दिन वह षिकार की ताक में बैठा था उधर से नारद जी निकले। रत्नाकर ने उन्हें श्ी ललकारा। देवर्षि ने निर्भय होकर बड़े स्नेह से कहा- ‘भैया! मेरे पास धरा ही क्या है। परंतु तुम प्राणियों को क्यों व्यर्थ में मारते हो? जीवों को पीड़ा देने और मारने से बड़ा दूसरा कोई पाप नहीं है। इस पाप से तुम्हारा छुटकारा कैसे होगा। ’
 रत्नाकर आज तक जिसे लूटता वह रोता, गिड़गिडाता़, श्यभीत होता। आज उसने एक 
अöुत तेजस्वी साधु को देखा था, जो तनिक श्ी उससे डरा नहीं, जिसने अपनी प्राणरक्षा के लिये एक षब्द नहीं कहा, उल्टा उसे उपदेष दे रहा था। क्रूर डाकू पर प्रभाव पड़ा। इस साधु की निभ्रयता और स्नेहपूर्ण वाणी ने उसे प्रभावित कर दिया। वह बोला ‘मेरा परिवार बड़ा हे । उन सबका पालन-पोषण अकेले मुझे करना पड़ता है। मैं यदि लूटकर धन न ले जाँँऊ तो वे श्ूखों मर जाए। ’
देवर्षि ने कहा-‘ शई! तुम  जिनका श्रण- पोषण करने के लिये इतने पाप करते हो, वे तुम्हारे इस पाप में शग लेंगे या नहीं- यह उनसे पूछ कर आओ। डरो मत, मैं शगकर कहीं नहीं जाँँऊगा। विष्वास न हो तो मुझे एक वृक्ष से बाँँध दो। ’
नारद जी को बाँँधकर रत्नाकर घर आया। उसने घर के सभी लोगो से पूछा । सबने उसे एक ही उत्तर दिया- ‘  हमारा पालन-पोषण करना तुम्हारा कर्तव्य है। हमें इससे कोई मतलब नहीं कि तुम किस प्रकार धन ले आते हो। ’
रत्नाकर कि आखें खुल गई। वह परेषान हो गया कि जिनके लिये इतनें प्राणियों  को उसने मारा, लूटा, इतना पाप किया और वही उसके परिवार वाले उसके किसी पाप पुण्य से कुछ श्ी मतलब नही रखते ? मारे षोक के रत्नाकर पागल सा हो गया। एक क्षण में उसके मोह का बन्धन टूट गया। रोता हुआ वह वन में गया और देवर्षि के चरणों पर गिर पड़ा  और जोर- जोर से रोने लगा और पुछने लगा कि उसका उद्वार कैसे होगा?
देवर्षि ने ,श्गवत्र्ााम ही तारने का सोच कर, उनको ‘राम’ का नाम जपने को कहा।  क्योंकि श्गवत्र्ााम  ही श्गवान् का साक्षात् स्वरूप है। पापी रत्नाकर ‘राम’ का सीधा सरल नाम श्ी नहीं ले पा रहा था। देवर्षि श्ी सोच- विचार में पड़ गये। फिर कुछ सोच कर देवर्षि नारद ने उसे ‘मरा’ नाम जपने का आदेष दिया और चले गये।
रत्नाकर वही बैठकर ‘मरामरामरामरामरामरामरामराम़़ ़  ़ ़ ़ ़ ़ ़ ़ ़ ़ ़ ़ ’ जपने लगा। मास बीते, ऋतुएँ बीतीं, वर्ष बीता, युग बीता; किंतु रत्नाकर उठा नहीं। उसने नेत्र नहीं खेले। उसका जप अखण्ड चलता रहा। उसके  षरीर पर दीमकों ने घर बना लिया। वह उनकी बाँबी- वाल्मीक से ढक गया। अन्त में ब्रह्मा  जी आये और उसे वाल्मीकि कहकर पुकारा और वह वाल्मीकि ऋषि हो गये। वह एक परम दयालु ऋषि बन गये। जब उसके सामने एक दिन एक व्याध ने क्रौंैच पक्षी के जोड़े में से एक को मार दिया, तब दया के कारण व्याध को षाप देते समय उसके मुख से ष्लोक निकला। उसी छन्द से वाल्मीकि ऋषि आदि कवि हुए।
मर्यादा पुरूषोेतम श्री राम उनके आश्रम में वनवास के समय गये थे। अन्तिम समय में जब मर्यादा पुरूषोेतम श्री राम ने श्री विदेहनन्दिनी का त्याग कर दिया था तब वे वाल्मीकि ऋषि के ही आश्रम में रहीं। वहीं पर लव- कुष का जन्म हुआ। वाल्मीकि ऋषि ने अपने दिव्य ज्ञान के प्रभाव से रामायण की रचना रामावतार से पहले ही कर दी थी।


 

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