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ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम्। विश्वस्य एक परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वा अमृता भवन्ति ॥ 7 ॥            You are the Supreme Brahman, infinite, yet hidden in the hearts of all creatures. You pervade everything. They, who know You, are free from the cycle of birth, death and rebirth. (Svetasvatara 3 : 7)            परमात्मा सब प्रकार से सब काल में मुक्त और शुद्ध है। वह अपरिमित और अनन्त होते हुए भी सभी प्राणियों के हृदय में छिपा हुआ है। परमात्मा को जानने वाले व्यक्ति ही जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।

अज़ छि ज़्येठॖ ॴठम 30.05.2020 ज़्येठॖ (जेष्ठ) ज़ूनॖ पछॖ (शुक्ल पक्ष) ॴठम (अष्टमी) बटॖवार (शनिवार/शनिश्चरवार) श्री सप्तर्षि सम्वत 5096, राश सिंह (चलान) ....Today is Jyesth Maas Shukla Paksh Ashtamiyaam Shanivsasre sanayitaam. Kashmiri Pandit Nirvasan Samvat_31 Sapthrishi Samvat _5096
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भक्त श्रीनीलन् Bhakt Shree Neelan

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भक्त श्रीनीलन् (तिरुमंङैयालवार)
    किसी जंगल में हरिन को फँसाने के लिये पालतू हरिन की आवश्यकता होती है। इसी प्रकार जगद्गुरु भगवान नारायण भी भक्तों के द्वारा ही जीवों का उद्धार करते हैं। भगवान् जाति, कुल, विद्या आदि का विचार नहीं करते। वे तो केवल प्रेम से ही वशीभूत होते हैं। नीलन् (तीरुमंङैयालवार)- का जन्म चोल देश के किसी ग्राम में एक शैव के घराने में हुआ था। इनके पिता बहुत बड़े योद्धा थे। उन्होंने युद्धविद्या में भलीभाँति निपुण कर दिया। ये बाण चलाने में, घोड़े की सवारी करने में तथा सेना का नेतृत्व करने में बड़े कुशल हो गये। चोल देश के राजा ने इनकी वीरता पर प्रसन्न होकर इन्हें अपने सेनानायक के पद पर प्रतिष्ठित किया। जिस समय नीलन सेना लेकर किसी शत्राु पर आक्रमण करते, लोगों के मन में यह निश्चय हो जाता कि विजय इन्हीं के पक्ष में होगी। राजा ने इन्हें कुछ भूमि भी प्रदान की। यद्यपि इनकी अध्यात्म की ओर रुचि थी, तथापि वह रुचि उसी राजसी जीवन के कारण एक प्रकार दब-सी गयी थी।
    दक्षिण के तिरुवालि नामक क्षेत्रा में कुमुदवल्ली नाम की एक कुमारी कन्या रहती थी। जिस प्रकार विष्णुचित्त ने आण्डाल का पालन-पोषण किया था, उसी प्रकार इसका लालन-पालन भी किसी भक्त के द्वारा ही हुआ था। यह कुमारी तिरुवालि के मन्दिर में स्थित भगवान श्रीनारायण की बड़ी भक्त थी। वह देखने में भी बड़ी सुन्दर थी। बड़े-बड़े राजालोग उसका पाणिग्रहण करने के लिये लालायित थे, परन्तु उसने किसी के साथ विवाह करना स्वीकार नहीं किया। जब नीलन ने यह समाचार सुना, तब उनके मन में भी उस बालिका के प्रति बड़ा आकर्षण हुआ। उन्होंने कुमुदवल्ली के पिता के पास जाकर उनसे अपने हृदय का भाव कहा। पिता ने इस विषय में कुमुदवल्ली की राय पूछी। कुमुदवल्ली ने कहा- ‘मेरा विवाह किसी विष्णु भक्त से ही हो सकता है।’ नीलन ने यह शर्त मंजूर कर ली। वे तुरन्त किसी वैष्णव आचार्य के पास गये और उनसे दिक्षा लेकर चले आये। कुमुदवल्ली ने कहा- ‘केवल बाह्य परिवर्तन पर्याप्त नहीं है; यदि मुझसे विवाह करना है तो अपनी वैष्णवता का क्रियात्मक परिचय देना होगा। तुम्हें एक साल तक प्रतिदिन एक हजार आठ भक्तों को भोजन करवा कर मुझे उनका प्रसाद लाकर देना होगा।’ नीलन ने कुमुदवल्ली की यह दूसरी शर्त भी मंजूर कर ली और शर्त के अनुसार दोनों का विवाह हो गया।
    इस प्रकार प्रतिदिन हजार से ऊपर ब्राह्मणों को भोजन कराने से उनके अन्दर बड़ा परिवर्तन हो गया। उनका चित्त निरन्तर भगवान का चिन्तन करने लगा। उनके नेत्रों से अज्ञान का पर्दा हट गया। अपनी भक्तिमती पत्नी के संग के प्रभाव से वे भी भगवान श्रीनारायण के अनन्य भक्त हो गये। उन्होंने सोचा- ‘मेरी सारी सम्पत्ति और शक्ति भक्तों की चरण-धूलि के समान भी नहीं है।’ यह विचार कर वे बड़े प्रेम से भक्तों की सेवा में लग गये और प्रतिदिन हजारों संख्या में उन्हें भोजन कराने लगे। यहाँ तक कि उन्होंने अपनी सारी सम्पत्ति इसी काम में लगा दी और उनके पास कुछ भी नहीं बचा।
    परन्तु फिर भी उन्होंने भक्तों को भोजन कराने का काम बन्द नहीं किया। उन्होंने अपने मन में यह दृढ़ निश्चय कर लिया कि ‘चाहे हम भूखों मर जायँ, किंतु इस सेवा के कार्य को नहीं छोड़ सकते; भगवान नारायण हमारी रक्षा करेंगे।’ उन्होंने चोल देश के राजा को वा£षक कर देने के लिये जो रुपया बचा रखा था, वह भी इसी काम में खर्च हो गया। महीनों बीत गये, राजा के कोष में नीलन का कर नहीं पहुँचा। अब लोगों को उनके विरुद्ध राजा के कान भरने का अच्छा मौका हाथ लगा। राजा ने उन्हें गिरफ्तार करने के लिये एक बहुत बड़ी सेना भेजी। नीलन ने बड़ी वीरता के साथ राजकीय सेना का मुकाबला किया और उसे भगा दिया। तब राजा स्वयं बहुत बड़ी सेना लेकर आये। परन्तु नीलन फिर भी बड़ी निर्भीकता के साथ युद्ध करता रहा। राजा उसकी वीरता को देखकर दंग रह गये और उन्होंने उसके सामने सन्धि का प्रस्ताव भेजा। जब वे राजा के सामने आये, तब राजा ने उनसे कहा- ‘तुमने सेनापति होकर मेरी ही सेना के साथ युद्ध किया, यह उचित नहीं था; फिर भी तुम्हारे इस अपराध को मैं क्षमा करता हूँ। किंतु तुम्हें अपना वा£षक कर तो भरना ही होगा और जब तक तुम्हारा कर राज्य के कोष में जमा न हो जाय, तब तक तुम्हें मेरे कारागार में बन्दी होकर रहना होगा।’
    नीलन राजा के कारागार में बन्द हो गये; परन्तु उन्होंने यह प्रण कर लिया था कि ‘मैं भगवान के भक्तों को भोजन कराकर ही उनका प्रसाद ग्रहण करूँगा।’ भोजन कराने की व्यवस्था कैदखाने में हो नहीं सकती थी, इसलिये उन्होंने वहाँ पर अन्न-जल कुछ भी नहीं लिया। उनके इस व्रत को देखकर भगवान् प्रसन्न हो गये। उन्होंने नीलन को स्वप्न में दर्शन देकर कहा- ‘कांचीनगरी में वेगवती नदी के तट पर अमुक स्थान में विपुल सम्पत्ति गड़ी हुई है, उस सम्पत्ति को स्वायत्तकर उससे अपना सेवा का कार्य चालू रख सकते हो।’ नीलन ने राजा से कहला भेजा- ‘मैं कांचीनगरी में जाकर अपना कर चुका दूँगा।’ राजा ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और उन्हें कई अधिकारियों के साथ कांची भेज दिया। नीलन को निर्दिष्ट स्थान में अपार सम्पत्ति प्राप्त हो गयी, जिससे उन्हांेने ब्याज सहित राजा का कर भी चुका दिया और भक्तों को भोजन कराने का कार्य फिर से शुरू कर दिया। कांची में भगवान् वरदराज ने नीलन को दर्शन दिये। तब चोल देश के राजा को यह निश्चय हो गया कि नीलन कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं, वे भगवान के बड़े भक्त और कृपापात्रा हैं और भगवान सदा उनकी रक्षा करते हैं। राजा स्वयं भक्त के पास आये और उनके चरणों पर गिरकर उनसे क्षमा माँगने लगे। जो रुपया कर के रूप में उनसे वसूल किया गया था, वह भी उन्हांेने लौटा दिया और कहा कि ‘इसे अपने पवित्रा काम में लगा देना।’
    नीलन ने अब और भी अधिक उत्साह के साथ भक्तों को भोजन कराने का कार्य प्रारम्भ कर दिया। भोजन करने वालों की संख्या प्रतिदिन बढ़ती जाती थी। भगवान् की कृपा से इन्हें जो कुछ धन प्राप्त हुआ था। वह भी खर्च हो गया और भक्त पहले की भाँति फिर कंगाल हो गये; परंतु कुमुदवल्ली और नीलन ने अपना आग्रह नहीं छोड़ा। जब तक उन्हें भक्तों का प्रसाद नहीं मिल जाता; तब तक वे अन्न-जल ग्रहण नहीं करते; परंतु भक्तों को भोजन कराने के लिये धन कहाँ से आये? अन्त में नीलन ने सोचा- ‘मैं एक बलवान सिपाही हूँ। धनवानों को क्या अधिकार है कि वे आवश्यकता से अधिक धन अपने पास बटोरकर रखें और हजारो मनुष्य निर्धन होकर उनका मुँह ताका करें। अच्छा, मैं इन लोगों को लूटकर इनके अन्यायोपा£जत धन को दरिद्रों में बाँट दूँगा; तब इन लोगों की आँखें खुलंेगी।’ यह कहकर उन्होंने एक बहुत बड़ा गिरोह बनाया और दिनदहाड़े अमीरों को लूटना आरम्भ कर दिया; परंतु वे लूट के मामलें में से अपने पास एक पैसा भी नहीं रखते थे, सारा-का-सारा गरीब भक्तों में बाँट देते थे।
    नीलन का उद्देश्य अच्छा होने पर भी उसका यह कार्य कदापि अनुमोदनीय नहीं था। भगवान् ने जब देखा कि मेरा भक्त विपरीत मार्ग पर चल रहा है, तब उन्होंने उसे रास्ते पर लाकर अपने लक्ष्य पर स्थिर करने का विचार किया। 
    आज नीलन को गहरा माल हाथ लगने वाला है। सामने से एक बहुत बड़ा धनी गहनों से लदी हुई अपनी पत्नी के साथ आ रहा है। ज्यों ही वे दम्पत्ति निकट पहुँचे, नीलन के दल ने उन्हें घेर लिया और कहा कि ‘भगवान के नाम पर अपना सारा मालमता हमारे सुपुर्द कर दो, नहीं तो अपनी जान से भी हाथ धो बैठोगे।’ ये कहकर उन्होंने उस धनी स्त्राी के सारे गहने छीन लिये। उनके सामने सोने और जवाहरात का ढेर लग गया; परंतु गठरी इतनी भारी हो गयी कि वह किसी के उठाये न उठी। सब-के-सब अपना-अपना जोर लगाकर हार गये, किंतु वह गठरी टस-से-मस न हुई। अब तो नीलन के मन में कुछ सन्देह हुआ कि अवश्य ही इसमें कोई जादू है। उन्होंने उस धनी से कहा- ‘अवश्य तुमने किसी मन्त्रा के बल से इस गठरी को भारी बना दिया है; अतः या तो वह मन्त्रा मुझे बताओ, नहीं तो मैं तुम्हें यहाँ से जाने न दूँगा।’ धनी ने नीलन को अलग ले जाकर उसके कान में ‘¬ नमो नारायणय’ यह अष्ठाक्षर मन्त्रा पढ़ दिया। उस मन्त्रा के कान में पड़ते ही नीलन के शरीर में मानो बिजली-सी दौड़ गयी। वह उस मन्त्रा का उच्चारण करते हुए नाचने लगा। इतने में ही उन्होंने देखा कि न तो वे दम्पत्ति हैं और न वह धन का ढेर ही है। अब तो नीलन के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उन्होंने आँख उठाकर ऊपर की ओर देखा तो उनके नेत्रा वहीं अटक गये। उन्होंने देखा- साक्षात् भगवान नारायण लक्ष्मी जी के सहित गरुड़ पर सवार होकर आकाशमार्ग से जा रहे हैं। अब तो नीलन को सारा रहस्य मालूम हो गया। वे मन-ही-मन पछताने लगे और कहने लगे कि ‘मैं कैसा दुष्ट और पापी हूँ कि मुझे इस पापकर्म से बचाने के लिये साक्षात् मेरे इष्टदेव और इष्टदेवी को इतना कष्ट उठाना पड़ा। हाय! मैंने अपने इन पापी हाथों से उनके शरीर पर हाथ लगाया, उन्हें डराया-धमकाया और उन्हें मारने पर उतारू हो गया। हाय! मैं कितना नीच हूँ। किंतु साथ ही अहा! मेरे स्वामी कितने दयालु हैं। प्रभो! मेरे अपराधों को क्षमा कीजिये और मुझे अपनी शरण में ले लीजिये। प्रभो! आज तुमने मुझे बचा लिया। प्रभो! मैंने आपके साथ कितने अत्याचार किये; परंतु आपने मेरे अपराधों की ओर न देखकर मेरी रखा की।’ उनकी इस आत्मग्लानि को सुनकर ऊपर से आवाज आयी- ‘मेरे प्यारे नीलन! मैं तुम पर प्रसन्न हूँ, तुम किसी प्रकार की ग्लानि मन में न लओ। अब तुम श्रीरंगम् जाकर वहाँ के मन्दिर को पूर्ण कराओ और अपने भजनरूपी हारों से मेरी पूजा करो। जब तक जिओ, मेरी भक्ति और प्रेम का प्रचार करो और शरीर त्यागने पर मेरे धाम में मुझसे मिलो।’
    उस दिन से नीलन का जीवन पलट गया। उन्हें वह मन्त्रा मिल गया, जिससे उनके सारे पाप धुल गये। उन्होंने भगवान् विष्णु की स्तुति के हजारो पद बनाये, जिन्हें लोग ‘महावाक्य’ कहते हैं। ये भगवान के शंर्गधनुष के अवतार माने जाते हैं। इन्होंने लाखों रुपये लगाकर भगवान् श्रीरंग जी के मन्दिर को पूर्ण करवाया। वे भगवान् की दास्यभाव से उपासना करते थे और इनके जीवन का प्रत्येक क्षण भगवान की सेवा में बीतता था। ये प्रसिद्ध शैवाचार्य श्रीज्ञानसम्बन्ध के समसामयिक थे और वे भी इनके पदों का बड़ा आदर करते थे। इन्होंने एक बार बौद्धों को शाóार्थ में हराकर विशिष्टाद्वैत-सिद्धान्त की स्थापना की थी। 

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