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ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम्। विश्वस्य एक परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वा अमृता भवन्ति ॥ 7 ॥            You are the Supreme Brahman, infinite, yet hidden in the hearts of all creatures. You pervade everything. They, who know You, are free from the cycle of birth, death and rebirth. (Svetasvatara 3 : 7)            परमात्मा सब प्रकार से सब काल में मुक्त और शुद्ध है। वह अपरिमित और अनन्त होते हुए भी सभी प्राणियों के हृदय में छिपा हुआ है। परमात्मा को जानने वाले व्यक्ति ही जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।

अज़ छि ज़्येठॖ ॴठम 30.05.2020 ज़्येठॖ (जेष्ठ) ज़ूनॖ पछॖ (शुक्ल पक्ष) ॴठम (अष्टमी) बटॖवार (शनिवार/शनिश्चरवार) श्री सप्तर्षि सम्वत 5096, राश सिंह (चलान) ....Today is Jyesth Maas Shukla Paksh Ashtamiyaam Shanivsasre sanayitaam. Kashmiri Pandit Nirvasan Samvat_31 Sapthrishi Samvat _5096
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भक्त शंकर देव Bhakt Shankar Dev

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भक्त शंकर देव        वैष्णव-भक्ति के सूर्य
भारत के साँस्कृतिक इतिहास में वैष्णव संतों की जो समृद्ध परम्परा रही है, उसमें असम में पंद्राहवीं शताब्दी के मध्य में जन्में श्री शंकरदेव का स्थान अत्यन्त महत्वपूर्ण है। 12वीं शताब्दी से ही वर्तमान नेफा के लोहित प्रभाग से लगाकर पश्चिम में उत्तरी बंगाल और पूर्वी पाकिस्तान के बीच विभाजन-रेखा का कार्य करने वाली करतोया नदी तक का क्षेत्रा जो कामरूप नाक से जाना जाता था, शाक्त-मत का केन्द्र था। इस क्षेत्रा में 11वीं अथवा 12वीं शताब्दी में रचित कालिकापुराण के अनुसार कामाख्या देवी की ही मान्यता थी और शाक्त धर्म को राज्य की ओर से प्रश्रय प्राप्त था। शाक्त धर्म के विरुद्ध आचरण करने वाले राजद्रोही माने जाते थे। ऐसे ही कठिन कट्टर धर्मान्धता के युग में श्री शंकरदेव का प्रादुर्भाव अक्टूबर, 1446 ईस्वी में कुसुमवरा कायस्थ भूमान् परिवार में हुआ। अवढर दानी भगवान शिव की आराधना के फलस्वरूप परिवार में बालक का जन्म हुआ था, इसलिए उसका नाम शंकर रखा गया। 
शंकर बाल्यकाल से गायें चराने वन में जाते और उन्हीं के प्रेम में मस्त रहते हुए भगवान कृष्ण की गौ-चारण लीला का ध्यान करते थे। बारह वर्ष की अवस्था तक जब इन्होंने अक्षर-ज्ञान प्राप्त न किया तो उनकी पिमामही रसस्वती ने उन्हें पूर्वजों की विद्वत परम्परा का उपदेश करके विद्याजंन के लिए महेन्द्र कंण्दाली नामक पंडित की पाठशाला में भेजा। बचपन में माता-पिता दोनों स्वर्गवासी हो गए थे, अतः दादी ने ही उनका पालन-पोषण किया। पाठशाला में एक दिन वह सूर्य के प्रचण्ड ताप में ही सो गए। सहसा गुरु ने देखा कि एक विशाल सर्प ने अपने फन से शंकर पर छाया-रूप वितान फैला रखा था। तभी गुरु ने अद्भुत बालक मानकर उन्हें शंकरदेव नाम से अभिहित किया। 
शंकरदेव सचमुच ही अद्भुत प्रतिभा-सम्पन्न बालक सिद्ध हुए। उन्होंने पंडित महेन्द्र कंण्दाली के सानिध्य में छह-सात वर्षों की अल्प अवधि में ही वेद, शास्त्रा, पुराण, दर्शन, मीमांसा आदि का गहन अध्ययन किया। यही नहीं, शंकरदेव स्वयं संस्कृत और असमिया में काव्य-रचना भी करने लगे। छात्रावस्था में ही ‘हरिशचन्द्र उपाख्यान’ की रचना की। इन्हीं दिनों शंकरदेव ने ‘तत्त्व’ दर्शन की आकांक्षा से योग-साधना आरम्भ की, परन्तु जैसे ही उन्होंने ‘भागवत-पुराण’ का श्रद्धापूर्वक मनन किया, यह योग का क्षरस्य-धारा सम मार्ग छोड़कर भक्ति के अगाध, किन्तु सुखद-सरल प्रवाह से आनन्द-विभोर होकर वह चले। पितामही का आग्रह स्वीकार कर शंकरदेव ने पारिवारिक जमींदारी का काम सँभाला और सूर्यावती नाम की एक सुन्दर कन्या से विवाह किया, किन्तु पत्नी मनु या हरिप्रिय नाम की एक सुन्दर कन्या से विवाह किया, किन्तु पत्नी मनु या हरिप्रिया नाम की एक कन्या को जन्म देने के पश्चात् स्वर्गवासी हो गई। यहीं से शंकरदेव में सांसारिक आसक्ति का लोप होना आरम्भ हुआ। सन् 1481 मंे शंकरदेव ने अपने समस्त पारिवारिक दायित्व एकमात्रा जामाता और अपने चाचाओं को सौंप दिए और स्वयं तीर्थ-यात्रा पर उत्तर भारत में चले गए। तब उनकी अवस्था 32 वर्ष की थी। जगन्नाथपुरी, वाराणसी और बदरिकाश्रम आदि तीर्थों की यात्रा करते हुए वह भगवान श्रीकृष्ण की उपासना में काव्य-रचना करते रहे। पुरी के गोवर्धन मठ के महंत श्रीधर स्वामी की ‘भागवत-दीपिका’ ने शंकरदेव पर स्थायी प्रभाव डाला। बारह वर्षों तक तीर्थ-यात्राओं में पावन धामों को मस्तक नवाकर वह अपनी साधना को परिपुष्ट करते रहे। सन् 1467 में कालिन्दी नामक कन्या से उनका दूसरा विवाह हुआ, परन्तु वह विरक्तावस्था से बाहर नहीं आ सके। एकान्त स्थान में उन्होंने एक छोटा-सा मन्दिर नि£मत कराया और वहाँ नियमपूर्वक श्रीकृष्ण का कीर्तन करने लगे। वह उनके लिये नये संघर्ष का श्रीगणेश करने वाला सिद्ध हुआ। शाक्त मतावलम्बियों ने उनका तीव्र विरोध किया। उन्हें शास्त्रार्थ के लिए चुनौती दी। 
तब उन्होंने समझायाµ 
यथातरोर्मूल निषेचनेन तृष्यन्ति ततस्कन्ध भुजोपशाखाः। प्राणी वहराच्च यथोद्रियाणाँ तथैव मच्युतेज्जा।।
अर्थात् जैसे मूल को सींचने से ही वृक्ष के फूल-पत्ते, शाखा आदि सभी पल्लवित होते हैं, उसी प्रकार अच्युत (विष्णु) भगवान की उपासना में सभी देवी-देवताओं की उपासना हो जाती है। धर्म-सम्प्रदाय की संकीर्णताओं की चुनौती देते हुए उन्होंने घोषणा की कि ‘चाण्डाल पर्यन्तकारी हरि-भक्ति अधिकारी।’ 
वैष्णव भक्ति के प्रचार से शाक्त पुरोहित बहुत विद्वेषी हो आए और उन्होंने राजा सुहूयंग (1467-1431) के यहाँ फरियाद की। इस तरह शाक्त मतावलम्बी राज्याश्रय पाकर शंकरदेव की संकीर्तन प्रथा और वैष्णव-भक्ति प्रचार के कट्टर विरोधी होते गए। इस विरोध का भीषण परिणाम यह हुआ कि कालान्तर में एक अहोम राजा  ने शंकरदेव के एकमात्रा जामाता की हत्या का आदेश दिया। कूच राजाओं से जो शंकरदेव के मत से प्रभावित थेµ उनका भीषण युद्ध हुआ और अहोम राजाओं ने उन्हें (1436-1442) खदेड़ दिया। इसी काल में शंकरदेव भी कूच राज्य में पातबोसी नामक स्थान में जीवन के अन्तिम अठारह-बीस वर्षों तक रहे। वहीं रहते हुए उन्होंने ‘रुकमिणी हरण’, ‘कालिया दहन’, ‘केलिगोपाल’ और ‘पारिजात हरण’ आदि प्रसिद्ध नाटकों की रचना की। श्री शंकरदेव की भक्ति-निष्ठा का इन रचनाओं में प्रचुर प्रमाण मितला है। वास्वत में शंकरदेव इन नाटकों के माध्यम से पदों की रचना करते थे, जिन्हें कीर्तन की शैली में ही उन ‘नामाघरों’ में गाया जाता था जिनकी स्थापना उन्होंने गाँव-गाँव में नाम-कीर्तन के उद्देश्य से की थी। उनके ‘कीर्तन-घोष’ और ‘भक्ति-रत्नाकर’ ग्रन्थ भी यहीं लिखे गए। शंकरदेव मुख्यतः ‘श्रीमद्भागवत महापुराण’, ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ और ‘पद्म पुराण’ के ‘सहòनाम’ अंश से विशेष प्रभावित थे। विष्णु-अवतार कृष्ण की अनन्य भक्ति का ही उन्होंने एक शरण्य’ नाम से  प्रचार किया। 
वह जीवन में ‘चार तत्त्व’ अपनाने पर बल देते थेµ (1) नामµ भगवन्नामोच्चार, (2) देव अर्थात् विष्णु-श्रीकृष्ण, (3) गुरु और (4) भक्त। उनका दृढ़ विश्वास था कि भक्तों की कृपा से ही भगवान श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त की जा सकती है। भक्ति में भी शंकरदेव माधुर्य, सत्य अथवा वात्सल्य भाव को प्रमुखता नहीं देते थे। उनका सिद्धान्त केवल ‘दास्य-भाव’ से भगवच्चरणों में सम्पूर्ण समर्पण करना था। उनकी भक्ति-रचना ‘सोई-सोई ठाकुर’ में कहा गया हैµ
सोई सोई ठाकुर मोई जो हरि परकाशा। नाम धरत रूप स्मरत ताकेरि हामु दासा।।
कृष्ण किंकर शंकर कह भज गोविंद पाय। सोहि पंडित सोहि मंढित जो हरि गुण गाय।।
अर्थात् वही केवल मेरा स्वामी है जो हरि-नाम लेता है। जो कृष्ण का नाम स्मरण करता है और उन्हीं का ध्यान धरता है, मैं उनका दास हूँ। श्रीकृष्ण का दास ‘शंकर’ कहता है कि गोविंद के चरणों से प्रीति कर, क्योंकि जो हरि गुणगान करता है, वही पंडित है और वही जग-भूषण है! श्री शंकरदेव की अपनी अनन्य भक्ति गोपी-प्रेम के माध्यम से अनेक पदों मंे प्रकट हुई है। कीर्तन-घरों से वह खेल, मृदंग आदि के मधुर संगीत के साथ कीर्तन घोष करते हुए गाते थे। 
श्री शंकरदेव नवधा भक्ति पर भी बल देते थे, पर उसमें भी श्रवण-कीर्तन का स्थान प्रथम था। वह विश्वासपूर्वक कहते थे कि यज्ञ, तप, तीर्थ योग-अभ्यास आदि कुछ भी साधन करो, अथवा पर्वत से छलांग भी क्यों न लगा दो, परµ ‘हरि कीर्तन नकरि तथापि, नेरय मृत्यु त्रास।’ हरि-कीर्तन बिना मृत्यु-त्रास से छुटकारा नहीं होता। प्रत्येक पद के अन्त में शंकरदेव ने अपने को ‘कृष्ण-किंकर’ कहकर अपनी दास्य-भक्ति को ही प्रधानता दी है। वह आजीवन गृहस्थ रहे। 1439 में एक सौ बीस वर्ष की लम्बी आयु में उन्होंने अपनी इहलीला का संवरण किया, तथापि उनका नाम संकीर्तन के अवतारी महापुरुष श्री चैतन्य महाप्रभु से कभी साक्षात्कार नहीं हुआ। कुछ इतिहासकारों ने यह अवश्य स्वीकार किया है कि श्री चैतन्य महाप्रभु के वृन्दावनवासी शिष्य रूप और सनातन शंकरदेव के सम्बन्ध में जानते थे एवं उन्हें भगवान का अवतार ही स्वीकार करते थे। हमारे युग के प्रकांड दर्शन-मर्मज्ञ प्रोफेसर वासुदेवशरण अग्रवाल ने उनके सम्बन्ध में लिखा हैµ “श्री शंकरदेव ऐसे दिव्य प्रकाशमान सूर्य थे जिनकी किरणों से असम में वैष्णव-भक्ति का कमल सहòदल होकर पूर्ण विकसित हुआ।” ऐसे उच्चकोटि के वैष्णव-भक्त एवं संकीर्तन प्रथा के निःस्पृह जनक को हमारा आस्थावान समाज कैसे भुला सकता है। 

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