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ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम्। विश्वस्य एक परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वा अमृता भवन्ति ॥ 7 ॥            You are the Supreme Brahman, infinite, yet hidden in the hearts of all creatures. You pervade everything. They, who know You, are free from the cycle of birth, death and rebirth. (Svetasvatara 3 : 7)            परमात्मा सब प्रकार से सब काल में मुक्त और शुद्ध है। वह अपरिमित और अनन्त होते हुए भी सभी प्राणियों के हृदय में छिपा हुआ है। परमात्मा को जानने वाले व्यक्ति ही जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।

अज़ छि ज़्येठॖ ॴठम 30.05.2020 ज़्येठॖ (जेष्ठ) ज़ूनॖ पछॖ (शुक्ल पक्ष) ॴठम (अष्टमी) बटॖवार (शनिवार/शनिश्चरवार) श्री सप्तर्षि सम्वत 5096, राश सिंह (चलान) ....Today is Jyesth Maas Shukla Paksh Ashtamiyaam Shanivsasre sanayitaam. Kashmiri Pandit Nirvasan Samvat_31 Sapthrishi Samvat _5096
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भक्तिमती शबरी Bhaktimati Shabri

1

त्रोतायुग का समय है, वर्णाश्रम-धर्म की पूर्ण प्रतिष्ठा है, वनों में स्थान-स्थान पर ऋषियों के पवित्रा आश्रम बने हुए हैं। तपोधन ऋषियों के यज्ञधूम से दिशाएँ आच्छादित और वेदध्वनि से आकाश मुखरित हो रहा है। ऐसे समय दण्डकारण्य में पति-पुत्रा-विहीना, भक्ति-श्रद्धा-सम्पन्ना एक वृद्धा भीलनी रहती थी, जिसका नाम था शबरी।
    शबरी ने एक बार मतंग ऋषि के दर्शन किये। संतदर्शन से उसे परम हर्ष हुआ और उसने विचार किया कि यदि मुझसे ऐसे महात्माओं की सेवा बन सके तो मेरा कल्याण होना कोई बड़ी बात नहीं है। यह सोचकर उसने ऋषियों के आश्रमों से थोड़ी दूर पर अपनी छोटी-सी कुटिया बना ली और कन्द-मूल-फल से अपना उदर-पोषण करती हुई अपने को नीच समझकर वह अप्रकटरूप से ऋषियों की सेवा करने लगी। जिस मार्ग से ऋषिगण स्नान करने जाया करते, उषःकाल के पूर्व ही उसको झाडू-बुहार कर साफ कर देती, कहीं भी कंकड़ या काँटा नहीं रहने पाता। इसके सिवा वह आश्रमों के समीप ही प्रातः-काल में पहले-पहले सूखे ढेर लगा देती। कँकरीले और कँटीले रास्ते को निष्कण्टक और कंकड़ों से रहित देखकर तथा द्वारपर समिधा का संग्रह देखकर ऋषियों को बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्होंने अपने शिष्यों को यह पता लगाने की आज्ञा दी कि प्रतिदिन इन कामों को कौन कर जाता है। आज्ञाकारी शिष्य रात को पहरा देने लगे और उसी दिन रात के पिछले पहर शबरी ईंधन का बोझा रखती हुई पकड़ी गयी। शबरी बहुत ही डर गयी। शिष्यगण उसे मतंग मुनि के सामने ले गये और उन्होंने मुनि से कहा कि ‘महाराज! प्रतिदिन रास्ता साफ करने और ईंधन रख जाने वाले चोर को आज हमने पकड़ लिया है। यह भीलनी ही प्रतिदिन ऐसा किय करती है।’ शिष्यों की बात को सुनकर भयकातरा शबरी से मुनि ने पूछा, तू कौन है और किसलिये प्रतिदिन मार्ग बुहारने और ईंधन लाने का काम करती है?’ भक्तिमती शबरी ने काँपते हुए अत्यन्त विनयपूर्वक प्रणाम करके कहा, ‘नाथ! मेरा नाम शबरी है, मन्दभाग्य से मेरा जन्म नीच कुल में हुआ है, मैं इसी वन में रहती हूँ और आप-जैसे तपोधन मुनियों के दर्शन से अपने को पवित्रा करती हूँ। अन्य किसी प्रकार की सेवा में अपना अनधिकार समझकर मैंने इस प्रकार की सेवा में ही मन लगाया है। भगवान्! मैं आपकी सेवा के योग्य नहीं। कृपापूर्वक मेरे अपराध को क्षमा करें।’ शबरी के इन दीन और यथार्थ वचनों को सुनकर मुनि मतंग ने दयापरवश हो अपने शिष्यों से कहा कि ‘यह बड़ी भाग्यवती है, इसे आश्रम के बाहर एक कुटिया में रहने दो और इसके लिये अन्नादि का उचित प्रबन्ध कर दो।’ ऋषि के दयापूर्ण वचन सुनकर शबरी ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और कहा- ‘कृपानाथ! मैं तो कन्द-मूलादि से ही अपना उदर-पोषण कर लिया करती हूँ। आपका अन्न-प्रसाद तो मुझे इसीलिये इच्छित है कि इससे मुझ पर आपकी वास्तविक कृपा होगी, जिससे मैं कृतार्थ हो सकूँगी। मुझे न तो वैभव की इच्छा है और न मुझे यह असार संसार ही प्रिय लगता है। दीनबन्धो! मुझे तो आप ऐसा आशीर्वाद दें कि जिससे मेरी भगवान् में प्रीति हो।’ विनयावनत श्रद्धालु शबरी के ऐसे वचन सुनकर मुनि मतंग ने कुछ देर सोच-विचाकर पे्रमपूर्वक उससे कहा- ‘कल्याणि! तू निर्भय होकर यहाँ रह और भगवान् के नाम का जप किया कर।’ ऋषि की कृपा से शबरी जटा-चीर-धारिणी होकर भगवद्भजन में निरत हो आश्रम में रहने लगी। अन्यान्य ऋषियों को यह बात अच्छी नहीं लगी। उन्होंने मतंग ऋषि से कह दिया कि ‘आपने नीच जाति शबरी को आश्रम में स्थान दिया है, इससे हम लोग आपके साथ भोजन करना तो दूर रहा, सम्भाषण भी करना नहीं चाहते।’ भक्तित्व के मर्मज्ञ मतंग ने इन शब्दों पर कोई ध्यान नहीं दिया। वे इस बात को जानते थे कि ये सब भ्रम में हैं, शबरी के स्वरूप का इन्हें ज्ञान नहीं है, शबरी केवल नीच जाति की साधारण स्त्राी ही नहीं है, वह एक भगवद्भक्तिपरायणा उच्च आत्मा है। उन्होंने इसका कुछ भी विचार नहीं किया और वे अपने उपदेश से शबरी की भक्ति बढ़ाते रहे। 
    इस प्रकार भगवद्गुण-स्मरण और गान करते-करते बहुत समय बीत गया। मतंग ऋषि ने शरीर छोड़ने की इच्छा की, यह जानकर शिष्यों को बड़ा दुःख हुआ, शबरी अत्यन्त क्लेश के कारण क्रन्दन करने लगी। गुरुदेव का परमधाम में पधारना उसके लिये असहनीय हो गया। वह बोली- ‘नाथ! आप अकेले ही न जायँ, यह किंकरी भी आपके साथ जाने को तैयार है।’ विषण्णवदना कतांजलि दीना शबरी को सम्मुख देखकर मतंग ऋषि ने कहा- ‘सुव्रते! तू यह विषाद छोड़ दे, कोसलकिशोर भगवान् श्रीरामचन्द्र इस समय चित्राकूट में हैं। वे वहाँ अवश्य पधारेंगे। उन्हें तू इन्हीं चर्म-चक्षुओं से प्रत्यक्ष देख सकेगी, वे साक्षात् परमात्मा नारायण हैं। उनके दर्शन से तेरा कल्याण हो जायगा। भक्तवत्सल भगवान् जब तेरे आश्रम में पधारें, तब उनका भली-भाँति आतिथ्य करके अपने जीवन को सफल करना। तब तक तू श्रीराम-नाम का जप करती हुई उनकी प्रतीक्षा करी।’
    शबरी को इस प्रकार आश्वासन देकर मुनि दिव्यलोक को चले गये। इधर शबरी ने श्रीराम-नाम में ऐसा मन लगाया कि उसे दूसरी किसी बात का ध्यान ही नहीं रहा। शबरी कन्द-मूल फलों पर अपना जीवन-निर्वाह करती हुई भगवान् श्रीराम के शुभागमन की प्रतीक्षा करने लगी। ज्यों-ही-ज्यों दिन बीतते हैं, त्यों-ही-त्यों शबरी की राम-दर्शन-लालसा प्रबल होती जाती है। जरा-सा शब्द सुनते ही वह दौड़कर बाहर जाती है और बड़ी आतुरता के साथ प्रत्येक वृक्ष, लता, पत्रा, पुष्प और फलों से तथा पशु-पक्षियों से पूछती है कि ‘अब श्रीराम कितनी दूर हैं, यहाँ कब पहुँचेंगे?’ प्रातःकाल कहती है कि भगवान् आज सन्ध्या को आयंेगे। सायंकाल फिर कहती है, कल सबेरे तो अवश्य पधारेंगे। कभी घर के बाहर जाती है, कभी भीतर आती है। कहीं मेरे राम के कोमल चरण-कमलों में चोट न लग जाय, इसी चिन्ता से बार-बार रास्ता साफ करती और काँटे-कंकड़ों को बुहारती है। घर को नितय गोबर-गोमूत्रा से लीप-पोतकर ठीक करती है। नित नयी मिट्टी-गोबर की चैकी बनाती है। कभी चमककर उठती है, कभी बाहर जाती है और सोचती है, भगवान् बाहर आ ही गये होंगे। वन में जिस पेड़ का फल सबसे अधिक सुस्वाद और मीठा लगता है, वही अपने राम के लिये बड़े चाव से रख छोड़ती है। इस प्रकार शबरी उन राजीवलोचन राम के शुभ दर्शन की उत्कण्ठा से ‘रामागमनकाङ्क्षया’ पागल-सी हो गयी है। सूखे पत्ते वृक्षों से झड़कर नीचे गिरते हैं तो उनके शब्द को शबरी अपने प्रिय राम के पैरों की आहट समझकर दौड़ती है। इस तरह आठों पहर उसका चित्त श्रीराम में रमा रहने लगा, परंतु राम नहीं आये। एक बार मुनिबालकों ने कहा- ‘शबरी! तेरे राम आ रहे हैं।’ फिर क्या था! बेर आदि फलों को आँगन में रखकर वह दौड़ी सरोवर से जल लाने के लिये। प्रेम के उन्माद में उसे शरीर की सुधि नहीं थी। एक ऋषि स्नान करके लौट रहे थे। शबरी ने उन्हें देखा नहीं और उनसे उसका स्पर्श हो गया। मुनि बड़े क्रुद्ध हुए। वे बोले- ‘कैसी दुष्टा है! जान-बूझकर हमलोगों का अपमान करती है।’ शबरी ने अपनी धुन में कुछ भी नहीं सुना और वह सरोवर पर चली गयी। ऋषि भी पुनः स्नान करने को उसके पीछे-पीछे गये। ऋषि ने ज्यों ही जल में प्रवेश किया, त्यों ही जल में कीड़े पड़ गये और उसका वर्ण रुधिर-सा हो गया। इतने पर भी उनको यह ज्ञान नहीं हुआ कि यह भगवद्भक्तिपरायणा शबरी के तिरस्कार का फल है। इधर जल लेकर शबरी पहुँचने ही नहीं पायी थी कि दूर से भगवान् श्री राम ‘मेरी शबरी कहाँ है?’ पूछते हुए दिखायी दिये। यद्यपि अन्यान्य मुनियों को भी वह निश्चय था कि भगवान् अवश्य पधारेंगे, फिर भी उनकी ऐसी धारणा थी कि वे सर्वप्रथम हमारे ही आश्रमों में पदार्पण करंेगे। परंतु दीनवत्सल भगवान् श्रीरामचन्द्र जब पहले उनके यहाँ न जाकर शबरी की मँढै़या का पता पूछने लगे, तब उन तपोबल के अभिमानी मुनियों को बड़ा आश्चर्य हुआ। शबरी के कानों में भी सरल ऋषि बालकों के द्वारा यह बात पहुँची। श्रीराम का अपने प्रति इतना अनुग्रह देखकर शबरी को जो सुख हुआ, उसकी कल्पना कौन कर सकता है। 
    इतने में ही भगवान् श्रीराम लक्ष्मणसहित शबरी के आश्रम में पहुँचे-
सबरी देखि राम गृहँ आए। मुनि के बचन समुझि जियँ भाए।।
सरसिज लोचन बाहु बिसाला। जटा मुकुट सिर उस बनमाला।।
स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। सबरी परी चरन लपटाई।।
प्रेम मगन मुख बचन न आवा। पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा।।
(रामचरितमानस)
    आप शबरी के आनन्द का पार नहीं है। वह प्रेम में पगली होकर नाचने लगी। हाथ से ताल दे-देकर नृत्य करने में वह इतनी मग्न हुई कि उसे अपने उत्तरीय वस्त्रा तक का ध्यान नहीं रहा, शरीर की सारी सुध-बुध जाती रही। इस तरह शबरी को आनन्दसागर में निमग्न देखकर भगवान् बड़े ही सुखी हुए और उन्होंने मुसकराते हुए लक्ष्मण की ओर देखा। तब श्रीलक्ष्मणजी ने हँसते हुए गम्भीर स्वर से कहा कि ‘शबरी! क्या तू नाचती ही रहेगी? देख! श्रीराम कितनी देर से खड़े हैं? क्या इनको बैठाकर तू इनका आतिथ्य नहीं करेगी?’ इन शब्दों से शबरी को चेत हुआ और उस धर्मपरायणा तापसी सिद्धा संन्यासिनी ने धीमान् श्रीराम-लक्ष्मण को देखकर उनके चरणों में हाथ जोड़कर प्रणाम किया और पाद्य, आचमन आदि से उनका पूजन किया। (वा॰ रा॰ 3।74।6-7) 
सादर जल लै चरन पखारे। पुनि संुदर आसन बैठारे।।
    भगवान श्रीराम उस धर्मनिरता शबरी से पूछने लगे- ‘तपोधने! तुमने साधन के समस्त विघ्नों पर तो विजय पायी है? तुम्हारा तप तो बढ़ रहा है? तुमने कोप और आहार का संयम तो किया है? चारुभाषिणी! तुम्हारे नियम तो सब बराबर पालन हो रहे हैं? तुम्हारे मन में शान्ति तो है? तुम्हारी गुरुसेवा सफल तो हो गयी? अब तुम क्या चाहती हो?’ (वा॰ रा॰ 3।74।8-9)
    श्री राम के ये वचन सुनकर वह सिद्धपुरुषों में मान्य वृद्धा तापसी बोली- भगवान्! आप मुझे ‘सिद्धा’ सिद्धसम्मता’ ‘तापसी’ आदि कहकर लज्जित न कीजिये। मैंने तो आप आपके दर्शन से ही जनम सफल कर लिया है।
    हे भगवान्! आज आपके दर्शन से मेरे सभी तप सिद्ध हो गये हैं, मेरा जन्म सफल हो गया। आज मेरी गुरुओं की पूजा सफल हो गयी; मेरा तप सफल हो गया। हे पुरुषोत्तम! आप देवताओं में श्रेष्ठ राम की कृपा से अब मुझे अपने स्वर्गापवर्ग में कोई सन्देह नहीं रहा। (वा॰ रा॰ 3।74।11-12)
    शबरी अधिक नहीं बोल सकी। उसका गला प्रेम से रुँध गया। थोड़ी देर चुप रहकर फिर बोली- ‘प्रभो! आपके लिये संग्रह किये हुए कन्द-मूल-फलादि तो अभी रखे ही हैं। भगवन्! मुझ अनाथिनी के फलों को ग्रहणकर मेरा मनोरथ सफल कीजिये।’ यों कहकर शबरी फलों को लाकर भगवान् को देने लगी और भगवान् बड़े पे्रम से पवित्रा प्रेम-रस से पूर्ण उन फलों की बार-बार सराहना करते हुए उन्हें खाने लगे।
    पद्म पुराण में भगवान् व्यास जी ने कहा है-
फलानि च सुपक्वानि मूलानि मधुराणि च।
स्वयमास्वाद्य माधुर्यं परीक्षय परिभक्ष्य च।।
पश्चान्निवेदयामास राघवाभ्यां दृढ़व्रता।
फलान्यास्वाद्य काकुत्स्थस्तस्यै मुक्तिं परां ददौ।।
    शबरी वन के पके हुए मूल और फलों को स्वयं चख-चखकर परीक्षा करके भगवान् को देने लगी। जो अत्यन्त मधुर फल होते वही भगवान् के निवेदन करती और भगवान् मानों कई दिनों के भूखे हों, ऐसे चाव और भाव से उनको पाने लगे।
बेर बेर देवेको सबरी सुबेर बेर, तोऊ रघुबीर बेर बेर ताहि टेर टेर।
बेर जनि लाओ बेर बेर जनि लाओ बेर, बेर जनि लाओ बेर लाओ कहें बेर बेर।।
    यही नहीं, भगवान् श्रीराघवेन्द्र शबरी जी के इन प्रेमसुधा-रसपूर्ण फलों का स्वाद कभी नहीं भूले- घर में, गुरुजी के यहाँ, मित्रों के घर पर, ससुराल में- जहाँ कहीं इनका स्वागत-सत्कार हुआ, भोजन कराया गया, वहीं ये शबरी के फलों की सराहना करना नहीं भूले- 
घर, गुरुगृहँ, प्रियसदन, सासुरें भइ जब जहँ पहुनाई।
तब तहँ कहि सबरी के फलनि को रुचि माधुरी न पाई।।
    अस्तु, इस तरह भक्तवत्सल भगवान् के परम अनुग्रह से शबरी ने अपनी मनोगत अभिलाषा पूर्ण हुई जानकर परम प्रसन्नता लाभ की। तदनन्तर वह हाथ जोड़कर सामने खड़ी हो गयी। प्रभु को देख-देखकर उसकी प्रीति-सरिता में अत्यन्त बाढ़ आ गयी। उसने कहा- 
कोहि बिधि अस्तुति करौं तुम्हारी। अधम जाति मैं जड़मति भारी।।
अधम ते अधम अधम अति नारी। तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी।।
(रामचरितमानस)
    आत्र्तत्राणपरायण पतितपावन भक्तवत्सल श्रीराम ने उत्तर में कहा, ‘भामिनि! तुम मेरी बात सुनो। मैं एकमात्रा भक्ति का नाता मानता हूँ। जो मेरी भक्ति करता है, वह मेरा है और मैं उसका हूँ। जाति-पाँति, कुल, धर्म, बड़ाई, द्रव्य, बल, कुटुम्ब, गुण, चतुराई- सब कुछ हो; पर यदि भक्ति न हो तो वह मनुष्य बिना जल के बादलों के समान शोभाहीन और व्यर्थ है।’
    अध्यात्मरामायण में भगवान् श्रीराम कहते हैं- 
पुंस्त्वे स्त्राीत्वे विशेषो वा जातिनामाश्रमादयः।
न कारणं मद्भजने भक्तिरेव हि कारणम्।।
यज्ञदानतपोभिर्वा वेदाध्ययनकर्मभिः।
नैव द्रष्टमहं शक्यो मद्भक्तिविमुखैः सदा।।
(3।10।20-21)
    ‘पुरुष, स्त्राी या अन्यान्य जाति और आश्रम आदि मेरे भजन में कारण नहीं हैं; केवल भक्ति ही एक कारण है।’ 
    ‘जो मेरी भक्ति से विमुख हैं, यज्ञ, दान, तप और वेदाध्ययन करके भी वे मुझे नहीं देख सकते।’ यही घोषणा भगवान् ने गीता में की है।
    इसके बाद भगवान् ने शबरी को नवधा भक्ति का स्वरूप बतलाया और कहा-
नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरू मन, माहीं।।
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।।
गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान। चैथि भगति मम गुन गन करड़ कपट तजि गान।।
मन्त्रा जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा।।
छठ दम सील बिरति बहु करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा।।
सातवँ सम मोहिमय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा।।
आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा।।
नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हियँ हरष न दीना।।
नव मुहँ एकउ जिन्ह कें होई। नारि पुरुष सचराचर कोई।।
सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरें। सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें।।
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जोगि बृंद दुरलभ गति जोई। तो कहुँ आजु सुलभ भइ सोई।।
    उसी समय दण्डकारण्यवासी अनेक ऋषि-मुनि शबरी जी के आश्रम में आ गये। मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम और लक्ष्मण ने खड़े होकर मुनियों का स्वागत किया और उनसे कुशल-प्रश्न किया। सबने उत्तर में यही कहा- ‘रघुश्रेष्ठ! आपके दर्शन से हम सब निर्भय हो गये हैं।’ 
त्वद्दर्शनाद् रघुश्रेष्ठ जाताः स्मो निर्भया वयम्।।
    प्रभो! हम बड़े अपराधी हैं। इस परम भक्तिमती शबरी के कारण हमने मतंग- जैसे महानुभाव का तिरस्कार किया। योगिराजों के लिये भी जो परम दुर्लभ हैं- ऐसे आप साक्षात् नारायण जिसके घर पर पधारे हैं, वह भक्तिमती शबरी सर्वथा धन्य है। हमने बड़ी भूल की।’ इस प्रकार सब ऋषि-मुनि पश्चाताप करते हुए भगवान से विनय करने लगे। आज दण्डकारण्यवासी ज्ञानाभिमानियों की आँखें खुलीं!
    ‘हमारे तीन जन्मों को (एक गर्भ से, दूसरे उपनयन से और तीसरे यज्ञदीक्षा से), विद्या को, ब्रह्मचर्यव्रत को बहुत जानने को, उत्तम कुल को, यज्ञादि क्रियाओं में चतुर होने को बार-बार धिक्कार है; क्योंकि हम श्रीहरि के विमुख हैं। निःसन्देह भगवान की माया बड़े-बड़े योगियों को मोहित कर देती है। अहो! हम लोगों के गुरु ब्राह्मण कहलाते हैं, परंतु अपने ही सच्चे स्वार्थ से (हरि की भक्ति में) चूक गये।’ अस्तु।
    ऋषि-मुनियों को पश्चाताप करते देख कर श्रीलक्ष्मणजी ने उनके तप की प्रशंसा करके उन्हें कुछ सान्त्वना दी। तदनन्तर एक ऋषि ने कहा- ‘शरणागतवत्सल! यहाँ के सुन्दर सरोवर के जल में कीड़े पड़ रहे हैं तथा वह रुधिर-सा क्यों हो गया है?’ लक्ष्मण जी ने हँसते हुए कहा- 
    ‘मतंग मुनि के साथ द्वेष करने तथा शबरी-जैसी रामभक्ता साध्वी का अपमान करने के कारण आपके अभिमानरूपी दुर्गुण से ही यह सरोवर इस दशा को प्राप्त हो गया है।’
मतंगमुनिविद्वेषाद् रामभक्तावमानतः।
जलमेतादृशं जातं भवतामभिमानतः।।
    इसके फिर पूर्ववत् होने का एक यही उपाय है कि आज्ञा से शबरी ने जलाशय में प्रवेश किया और तुरंत ही जल पूर्ववत् निर्मल हो गया। यह है भक्तों की महिमा।
    भगवान् ने प्रसन्न होकर फिर शबरी से कहा कि ‘तू कुछ वर माँग।’ शबरी ने कहा- 
यत्त्वां साक्षात्प्रपश्यामि नीचवंशभवाप्यहम्।
तथापि याचे भगवंस्त्वयि भक्तिर्दृढा मम।।
    ‘मैं अत्यन्त नीच कुल में जन्म लेने पर भी आपका साक्षात् दर्शन कर रही हूँ, यह क्या साधारण अनुग्रह का फल है; तथापि मैं यही चाहती हूँ कि आप में मेरी दृढ़ भक्ति सदा बनी रहे।’ भगवान् ने हँसते हुए कहा-‘यही होगा।’
    शबरी ने पा£थव देह परित्याग करने के लिये भगवान् की आज्ञा चाही, भगवान् ने उसे आज्ञा दे दी। शबरी मुनिजनों के सामने ही देह छोड़कर परम धाम को प्रयाण कर गयी और सब ओर जय-जयकार की ध्वनि होने लगी।


 

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