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ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम्। विश्वस्य एक परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वा अमृता भवन्ति ॥ 7 ॥            You are the Supreme Brahman, infinite, yet hidden in the hearts of all creatures. You pervade everything. They, who know You, are free from the cycle of birth, death and rebirth. (Svetasvatara 3 : 7)            परमात्मा सब प्रकार से सब काल में मुक्त और शुद्ध है। वह अपरिमित और अनन्त होते हुए भी सभी प्राणियों के हृदय में छिपा हुआ है। परमात्मा को जानने वाले व्यक्ति ही जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।

अज़ छि ज़्येठॖ ॴठम 30.05.2020 ज़्येठॖ (जेष्ठ) ज़ूनॖ पछॖ (शुक्ल पक्ष) ॴठम (अष्टमी) बटॖवार (शनिवार/शनिश्चरवार) श्री सप्तर्षि सम्वत 5096, राश सिंह (चलान) ....Today is Jyesth Maas Shukla Paksh Ashtamiyaam Shanivsasre sanayitaam. Kashmiri Pandit Nirvasan Samvat_31 Sapthrishi Samvat _5096
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भक्त सालबेग Bhakt Saalbegh

1

उड़ीसा-प्रान्त के कटक-शहर में लालबेग नामक एक शक्तिशाली मुगल रहता था। उस समय उड़ीसा में गजपतिवंश का एक राजा शासन करता था, परंतु उसका तेज क्षीण हो चला था। लालबेग ने सुअवसर देखकर अपना बल बढ़ाया और विशाल सैन्य लेकर उस पर धावा बोल दिया। लालबेग विजयी हुआ। उसके नाम से सारा प्रान्त थर्रा उठा। तब से उसका प्रभाव फैल गया। इस लालबेग के कई पुत्रा थे, उनमें से एक का नाम सालबेग था। सालबेग ने बाल्यावस्था से ही युद्ध-कला सीखना प्रारम्भ किया और युवा होते-होते वह उसमें निपुण हो गया। उसे अपनी बहादुरी पर बड़ा गर्व था। वीरत्व के मद में चूर हुआ वह जमीन पर पैर भी नहीं रखना चाहता था।
    एक बार सालबेग अपने पिता के साथ किसी युद्ध में गया और वहाँ उसने ऐसा रणकौशल और पराक्रम दिखलाया कि सभी लोग दंग रह गये। भगवान् किसी का भी मद नहीं रहने देते, मद उतारकर उसे अपनाया करते हैं। सालबेग बड़ी बहादुरी से लड़ रहा था, परंतु दैवगति से अचानक शत्राुपक्ष की तलवार उसके सिर पर आ पड़ी, सिर फट गया और वह अचेत होकर तुरंत जमीन पर गिर पड़ा। सेवक गण उसको रणस्थली से अलग शिविर में ले गये। कई दिनों तक मरहमपट्टी करने पर जब कोई लाभ नहीं दिखायी दिया तब पिता लालबेग ने उसको घर भेजवा दिया। घर पर माता उसकी तन-मन से सेवा करने लगी। सेवा करने लगी। बहुत दिन बीत गये; परंतु जरा भी आराम नहीं मालूम हुआ। कुछ दिनों तक तो लालबेग ने पुत्रा की बीमारी पर बहुत ध्यान रखा, परंतु ज्यों-ज्यों उसके रोग की अवधि बढ़ती गयी, त्यों-ही-त्यों लालबेग का मन भी हटने लगा। अन्त में उसको निकम्मा समझकर लालबेग ने उकताकर उसकी खोज-खबर रखना भी छोड़ दिया। संसार में स्वार्थ का सम्बन्ध ऐसा ही हुआ करता है। जब तक अपना काम निकलता है, स्वार्थ साधन में सहारा मिलता है तब तक मनुष्य ममत्व रखते हैं, जहाँ स्वार्थ नहीं दिखायी देता, वहाँ कोई बात भी नहीं पूछता। सारी ममता मिनटों में हवा हो जाती है। अस्तु, 
    लालबेग की उदासीनता देखकर घर के और लोग भी उसकी ओर से उदासीन हो गये। केवल एक माता बची जो आहार-निद्रा भुलाकर दिन-रात पुत्रा की रोग-शय्या के पास  बैठी रहती और प्राणपण से सेवा-शुश्रूषा करती। एक दिन सालबेग का कष्ट बहुत बढ़ गया, तब उसने निराश-हृदय से बड़े ही क्षीण स्वर से कहा- 
    ‘माँ।’
    ‘क्यों बेटा?’
    ‘माँ! अब मैं नहीं बचूँगा।’
    ‘न बचे तेरी बीमारी बेटा! यांे क्यों बोल रहा है?’
    ‘नहीं माँ! मैं सच कहता हूँ, अब मैं नहीं बचूँगा। मेरी बचने की इच्छा भी नहीं है। दिन-रात यों दुःख-भोग करने की अपेक्षा एक बार मरने का कष्ट कहीं कम है।’
    ‘यों पागलपन क्यों करता है? मरे तेरा शत्राु, बेटा! उसकी उम्र पाकर तू सौ वर्ष जी!’
    ‘नहीं; अब मुझे बचने की बिलकुल आशा नहीं है। मौत नहीं आवेगी तो मुझे आत्महत्या करनी पड़ेगी। अब मुझसे यह दुःख नहीं सहा जाता। माँ! माँ! तू मेरे अपराधों को क्षमा कर और इस अपने कृतघ्न सन्तान को भूल जा।’
    पुत्रा की बातें सुनते ही माता ने एक लम्बी साँस ली। उसके पीड़ा की मा£मक उद्गारों ने माता का हृदय विदीर्ण कर दिया। उसकी आँखों में आँसू भर आये। बड़ी कठिनता से आँसुओं को रोककर स्नेहपूर्वक पुत्रा को छाती से लगाकर उसने कहा- ‘बेटा! तेरे चले जाने पर मैं किसका मुँह देखकर जीऊँगी! यदि मेरे बलिदान से तेरी रक्षा होती हो तो मैं तैयार हूँ; परन्तु ऐसा क्यों होने लगा? मुझे तो अपने कर्म का फल भोगना ही पड़ेगा। हाँ, निरुपाय के लिये एक उपाय अवश्य है, वह मैं तुझसे कहती हूँ परन्तु क्या तू उसे कर सकेगा?’
    माता की बात सुनकर सालबेग ने कहाµ ‘क्यों नहीं, माँ! मैं तेरा कहा न मानँूगा तो और किसका मानँूगा? बोल, बोल, तुझे जो कहना है खुशी से कह, मैं जरूर तेरे कहे मुताबिक करूँगा।’ 
    माता ने कहा- ‘बेटा! तुझसे वह नहीं होगा, कभी नहीं होगा। बचपन से ही तुझमें जो संस्कार पड़ गये हैं- तुझे जैसी शिक्षा मिली है, उसके विपरीत आचरण तू कैसे कर सकेगा।’ माता के इस वचन से सालबेग को सन्देह हुआ। उसने व्याकुल होकर पूछा- ‘माँ! तू क्या कह रही है, कुछ भी समझ नहीं आता। मेरी शिक्षा-दीक्षा से प्रतिकूल तू क्या कहना चाहती है?’
    इसके उत्तर में माता ने कहाµ ‘वत्स! मैं सदा से ही तेरी उस शिक्षा-दीक्षा के बिलकुल रिुद्ध हूँ, क्या इस बात को तू नहीं जानता? बेटा! मैं एक हिन्दू ब्राह्मण लड़की हूँ।’ माता के इस वचन को सुनते ही सालबेग विस्मित होकर कहने लगा- ‘हैं, यह तू क्या कह रही है? तू हिन्दू है तो फिर मेरी माता किस प्रकार हुई?’
    माता ने कहाµ ‘बेटा! तू यदि पूछता है तो आज लाज-शरम छोड़कर सब तुझसे कह डालती हूँ। दाँतमुकुन्दपुर गाँव का नाम तो तूने सुना होगा। वह गाँव किसी दिन बड़ा ही समृद्धिशाली था। उसी गाँव में मेरी ससुराल थी। मेरे पति बचपन में ही मर गये। सास और ससुर भी पुत्रा-वियोग से दुःखी होकर परलोक सिधार गये। उसी समय तेरे पिता के अत्याचार से बहुतेरे परिवार अपने घर-बार तथा धन-दौलत को छोड़कर उस गाँव से भाग गये थे। गाँव उजाड़ हो गया। उस समय मैं एक दिन नदीं में स्नान करने गयी थी। दैवयोग से उसी समय तेरे पिता कहीं से युद्ध करके अपनी सेना के साथ लौट रहे थे। उस समय मैं पूर्ण युवावस्था को प्राप्त हो गयी थी, रूपलावण्य भी भरपूर आ गया था, मुझे देखते ही तेरे पिता को मुझ पर मोह हो गया और मुझ अकेली असहाय को वे बलात् घोड़े पर बैठाकर यहाँ ले आये। बेटा! मैं स्त्राी-जाति अबला थी, मुझे वश में करने में उन्हें अधिक देर न लगी, थोड़े ही दिनों में वस्त्रा, आभूषण और मधुर सम्भाषण से उन्होंने मुझे अपना बना लिया। उसी के फलस्वरूप तू पुत्रा रूप में मुझे प्राप्त हुआ। परंतु मालूम होता है, मुझ हतभागिनी के भाग्य में यह सुख भी नहीं बंदा है।’
    यों कहते-कहते भावावेश से उसका हृदय भर आया और कण्ठ रुक गया। सालबेग को सब समझते देर न लगी। माता की अवस्था पर उसे बड़ी दया आयी और अन्त में धैर्य धारण कर अपनी जन्मदायिनी माता को आश्वासन देते हुए कहा- ‘माँ! तूने मुझे गर्भ में धारण किया है। मेरी यह देह तेरी ही है। बोल, बोल माँ। तुझे जो कहना हो कहा। तुझे जो उपाय बतलाना हो बतला दे। तू जो कुछ कहेगी, मैं उसी के अनुसार करूँगा!’
    माँ बोली- ‘अच्छा तो कहती हूँ, सुन, परंतु पहले तेरे पिता के व्यवहार की बात भी तूझे जना देती हूँ। हाय! वे मेरा और तेरा त्याग करके अपने अन्य अन्य स्त्राी-पुत्रादि के साथ कैसे निश्चिन्त हो गये हैं, इसे तू देखता है न? जिसके लिये तूने यह दुःख सिर पर लिया, जिसके लिये अपनी जिन्दगी को जोखिम में डाला, वह आज इस अवस्था में तेरी खबर भी नहीं लेता! उससे इतना भी नहीं होता कि एक आदमी भेजकर तेरी हालत तो जान ले। बेटा! तू इसका कारण जानता है? दूसरा कोई कारण नहीं है, एकमात्रा यही कारण है कि मेरा यौवन जाता रहा और तू भी बेकाम हो गया। तुझमें उसका काम करने की शक्ति नहीं रही। अब तुझसे या मुझसे उनका कोई स्वार्थ नहीं सधता, इसी से यह अनादर है, यह तिरस्कार है। बेटा! यदि भगवान् तेरी रक्षा करें तो तू ही मेरे जीवन का सुख है और तभी मेरा जीवन किसी काम का है। बेटा! तू दासीपुत्रा है, इसी से तेरे पिता तुझे याद नहीं करते। परंतु तेरे बिना मैं तो एक क्षणभर भी नहीं रह सकती! तू ही मेरे जीवन का कारण- जीवन का धन है। तेरे बिना सारा संसार मेरे लिये सूना है। तू ही मुझ अन्धी की आँख है, तेरे बिना मैं कैसे जीऊँगी? परन्तु यदि तू मेरे कहे अनुसार चलने का मुझे विश्वास दिला दे तो मैं तुझे वह उपाय बतला दूँ। नहीं तो निश्चय जान कि तेरा और मेरा यह पापी शरीर एक ही साथ नष्ट हो जाएगा।’
    सालबेग आँसू भरे नेत्रों से बोला- ‘माँ! माँ!! तुझसे एक बार नहीं, हजार बार प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि मैं तेरे वचन का अवश्य पालन करूँगा; बल्कि एक दूसरी और प्रतिज्ञा करता हूँ कि अच्छा होते ही मैं तेरे आसूँ पोंछ दूँगा, फिर तुझे रोने का कभी अवसर ही न रहेगा। माँ! अब तू रो मत, रो मत! मुझे वह उपाय शीघ्र बतला! मैं वचन देता हूँ कि उसका पालन जरूर करूँगा।’
    पुत्रा के वचन सुनकर माता के तप्त हृदय को कुछ शीतलता मिली। पश्चात् आँसू पोंछकर वह कहने लगी ‘बेटा! अब तू कपट छोड़कर पूर्ण विश्वास और श्रद्धापूर्वक आनन्दकन्द नन्दनन्दन वृन्दावनचन्द्र भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र का भजन कर। अहा! वह अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड के नाथ हैं। सब देवों के राजा हैं। उनकी आज्ञा को सभी अवनत-मस्तक हो सिर पर चढ़ाते हैं। वही निरुपाय के एकमात्रा उपाय हैं; महौषधि हंैं। उनका भजन करने से निश्चय ही तेरे सारे रोग-दोष दूर हो जायँगे। बेटा! यही एक उपाय है, इसलिये अब उन विश्वपिता का ही भजन कर, उन्हीं का स्मरण कर।’
    पुत्रा बोला- ‘माँ! ऐसा ही करूँगा। उन्हीं का भजन करूँगा, परंतु मैं तो उनके विषय में कुछ जानता नहीं। वे क्या हैं? कैसे हैं? कहाँ राज्य करते हैं, उनके माता-पिता कौन हंै तथा उनका भजन किस तरह किया जाता है? यह तो मैं जानता ही नहीं। इसलिये माँ! तू मुझे उनकी पहचान करा दे, जिससे मैं उनका भजन करूँ?’
    सालबेग के घर में आने के पश्चात् सालबेग की माता को कभी किसी के भी मुख से श्रीकृष्ण-कथा सुनने का संयोग नहीं मिला था। आज पुत्रा के पास अपने प्राणप्रिय प्रभु की चर्चा का अवसर मिलने से उसके आनन्द का पार न रहा। वह मृदु-हास्य करती हुई बोली- ‘भाई! मैं एक-एक करके सब बतलाती हूँ तू ध्यान देकर सुन। उनके पिता का नाम नन्दजी है, माता का नाम यशोदा जी है। उनकी प्रिया का नाम श्रीमति राधिकाजी है। उनका रूप बहुत ही मनोहर है, वह वृन्दावन के राजा हैं। उनके राज्य जें उनकी सारी प्रजा खूब सुख से दिन बिताती है। अहा! उनका कैसा सुन्दर स्वरूप है! उनको देखकर कामदेव का मन भी मोहित हो जाता है। अहा! उनकी श्यामल कान्ति कैसी सुन्दर है! नवीन जलधर अथवा नीलकान्तमणि के साथ भी तुलना नहीं की जा सकती। अहा! उनके मस्तक पर कु×िचत केशकलाप कैसे सुशोभित हो रहे हैं, वह कानों में मकरकुण्डल धारण किये हुए हैं, उनके नयन खिले कमल के समान हैं, भृकुटी कामदेव के बाण के समान कमनीय है, नासिका के अग्रभाग में सुरम्य मोती की लटकन लटक रही है, श्रीहरि के दाँत अनार के दाने से भी बढ़कर सुन्दर हैं, लाल अधरों में सुधा स्रवित करता मन्द-मन्द हास्य दीख पड़ता है। अहा! मेेरे प्रभु के इस सुन्दर श्रीमुख को देख चन्द्र भी लज्जित हो जाता है। प्रभु की गर्दन भी वैसी ही सुन्दर है, उसमें प्रभु ने सुन्दर वनमाला धारण कर रखी है। उनके बाहु बहुत विशाल हैं तथा नाना प्रकार के रत्नालंकारों से विभूषित हैं। प्रभु ने अपनी अँगुलियों में सोने की अँगूठी पहन रखी है। पीताम्बर धारण किया है। चरणों में नूपुर बाज रहे हैं। उनके पदतल में ध्वजा और वज्र आदि के चिन्ह सुशोभित हो रहे हैं। इन सबसे बढ़कर उनकी मधुरी मुरली सबको अत्यन्त ही प्रिय लगती है। इसी मुरली ने व्रजवनिताओं को पगली बना दिया था। भाई! प्रभु का यथार्थ वर्णन कभी हो ही नहीं सकता। शेषनाग अपने सहó मुख से अभी तक उनके सारे गुण गाकर पार नहीं पा सके तो मेरी तो बिसात ही क्या?
    बेटा! श्रीत्रिभुवनपति के विश्वमोहिनी रूप का आँखें मूँदकर ध्यान कर। ब्रह्मादि देवता, मह£ष, देव£ष, साधु और सज्जन सदा उनका ही ध्यान करते हैं। अखिल ऐश्वर्य की अधिष्ठात्राी कमलादेवी भी उनके श्रीचरणों की सेवा करने के लिये सदा तैयार रहती हैं। बेटा! भक्त भी उसी चरण-सेवा की इच्छा करते हैं। ते भी उन्हीं की शरण ले, उन्हीं का ध्यान धर। मेरे भक्त पिता ने मुझको बाल्यावस्था मंे ही इस परममंगल दिव्य स्वरूप का उपदेश देकर कहा था कि ‘बेटी! जब कभी कर्मफल के वश तुझे कोई भी सन्ताप हो, तेरे ऊपर कोई विपत्ति आवे तब तू एक बार आँखें मूँदकर इस श्यामसुन्दर मुरलीधर की मू£त का ध्यान करना। इससे जरूर तेरे ब सन्ताप जाते रहेंगे।’ ‘बेटा! मैं क्या कहँू, मैं इस राक्षस पुरी में अब तक जो सुस्थिर रह सकी हूँ, यह इसी भगवद्ध्यान का ही प्रभाव है। तू भी उसी श्याम सुन्दर के स्वरूप का ध्यान कर, इससे तेरे सब दुःख जाते रहंेगे।’
    इस प्रकार बोलते-बोलते भाव की प्रबलता से जननी का मुखमण्डल एक अपूर्व लावण्य के विकास से जगमगा उठा। सालबेग उसे देखकर स्तब्ध हो गया। उसी समय उसके मन का मैन धूल गया और उसका अन्तःकरण शुद्ध हो गया। थोड़ी देर बाद उसने अपनी माता से आग्रहपूर्वक पूछा- ‘माँ! तुम्हारे वृन्दावनचन्द्र का रूप तो मालूम हुआ, परंतु वे मिलेंगे कहाँ?’ माँ बोली- ‘बेटा! उनकी लीला बहुत ही विचित्रा है, तू जहाँ कभीं भी उनका चिन्तन करेगा, वे वहीं पर वैसे ही प्रकट होंगे- आ विराजेंगे। भाई! अब तू समस्त भय और भ्रान्ति को छोड़कर उनका ही चिन्तन कर, उन्हीं का ध्यान कर।’ 
    सालबेग ने माँ से फिर पूछा- ‘अच्छा माँ! मैं उनका ध्यान तो करूँगा, पर यह तो बता कि मुझे कितने दिनों में उनका दर्शन होग? कितने दिनों में मैं इस दारुण पीड़ा से मुक्त होऊँगा?’ माता ने कहा- ‘बेटा! श्रीकृष्ण-भजन का मूल विश्वास है, तू किसी भी प्रकार के संशय को मन में न आने देकर दृढ़ विश्वास से उनका ध्यान करेगा, तो केवल बाहर दिनों में ही तुझे श्रीप्रभु के दर्शन होंगें परंतु याद रखना कि तू प्रभु के दर्शन होने से मेरा दुःख दूर होगा कि नहीं अथवा इस प्रकार ध्यान करते-करते मुझे दर्शन होगा कि नहीं, इस प्रकार का सन्देह और संकल्प-विकल्प उठावेगा तो बारह दिन तो क्या, बारह वर्षों में भी उनका दर्शन न होगा। इसलिये सब प्रकार के सन्देह और संकल्प-विकल्प का सर्वथा त्यागकर दृढ़ विश्वास और अचल श्रद्धा से उनका ध्यान कर, चिन्तन कर, इससे अवश्य ही बारह दिन में अथवा उसके पहले ही उनकी श्रीमू£त का तुझे दर्शन होगा’
    सालबेग बोला- ‘अच्छा, मैं ऐसा ही करता हूँ। अब इसी क्षण से मैं अपने दोनों पलाकों को बन्द कर श्रीप्रभु के मंगलमय रूप के सिवा दूसरे किसी भी रूप का विचार अपने अन्दर प्रवेश न करने दूँगा। परंतु माँ! तू भी मेरे लिये उनको जना दे कि मेरी बहुत जाँच न करें, दर्शन देने में देर न करें। परम प्रभु हँसते मुख से वंशी बजाते हुए मुझसे अविश्वासी के गले में अपनी विमल प्रेम की माला पहना दें और उनके आकर्षण से मैं उनका भजन कर सकूँ। माँ! अब यदि उन परम प्रभु का दर्शन नहीं हुआ तो यह नेत्रा फिर खुलने वाले नहीं हैं। यह अन्तिम बार इस सृष्टि को देख लेते हैं, यह निश्चय मान। परंतु माँ! मुझे तुझसे एक बात पूछनी है, क्या उस परम प्रभु के स्मरण करने का कोई मन्त्रा-तन्त्रा भी है?’
    पुत्रा के वचन सुन हर्ष भरे गद्गद कण्ठ से माँ बोली- ‘हाँ, है बेटा! मन्त्रा है। उनका मनोहर नाम ही उनको प्राप्त करने का मन्त्रा है। उसी श्रीकृष्ण-नाम का जप कर, उन्हंे इसी नाम से पुकार, इसके आकर्षण से ही वे अपने-आप तेरे पास चले आवेंगे।’ 
    ‘अच्छा माँ! ऐसा ही करता हूँ, ऐसा ही करता हूँ।’ इतना कहकर सालबेग उच्च कण्ठ से ‘कृष्ण-कृष्ण’ कहने लगा। श्रीकृष्ण-नाम की ऐसी अपार महिमा है कि उसकी एक बार रटन करने से बारम्बार रटन करने का मन होता है। श्रीकृष्ण-नाम की रटन करने से रसना नाच उठती है और इतने ही से वह तृप्त नहीं होती, उसके मन में पुनः ऐसा विचार उठता है कि ‘अरे! मैं अकेली उनके नाम का कितना कीर्तन कर सकूँगी? अहा! इस समय मेरे-जैसी हजारों जिह्नाएँ होतीं तो अपने प्राणाराम के नाम की अविराम घोषणा की जा सकती।’ सालबेग की जिह्ना भी केवल एक बार कृष्ण-कृष्ण कहकर चुप नहीं हो गयी, वह उच्च स्वर से श्रीकृष्ण-नाम का कीर्तन करने लगी। भगवन्नाम की अतुल शक्ति से सालबेग का बाह्य ज्ञान जाता रहा। नामरटन में वह लीन हो गया और उसके मन के साथ-साथ उसकी सारी इन्द्रियाँ भी उस परम प्रभु के पवित्रा नाम का रटन करने लगीं।
    उसी समय उसके अन्तःकरण में मदनमोहन, मुरलीधर के रूप की प्रभा प्रकटित हुई। उसे देखते ही सालबेग परम आनन्द में नाच उठा और जैसे-जैसे उसे भावग्राही भगवान् की हृदयग्राही मू£त का दर्शन होता गया, वैसे-वैसे वह मन-ही-मन फूलता गया। धीरे-धीरे उसको श्रीमू£त के सम्पूर्ण रूप का दर्शन हुआ। सालबेग ने प्रभु का, उनके वóाभूषण इत्यादि का सूक्ष्मदृष्टि से दर्शन कर लिया। श्रीकृष्ण -स्मरण के अप्रतिहत प्रभाव से वह श्रीकृष्णभगवान् की मानसिक पूजा करने लगा। इसके बाद उसके भीतर से एक विचित्रा वन्दना स्वयमेव निकल पड़ी और उसके प्रभाव से वह मन-ही-मन कहने लगा- ‘हे वृन्दावनचन्द्र! तुम्हारी जय हो। हे संसारतरु के मूलकन्द मुकुन्द! तुम्हारी जय हो, जय हो। हे यमलार्जुन-भ×जनकारी, तृणावर्त और शकटासुर के गर्व×जनकारी श्रीहरि! तुम्हारी जय हो, जय हो! हे वृषरूपी अरिष्टासुर के नाश करने वाले, श्रीगोकुल की शोभा बढ़ानेवाले प्रभु! तुम्हारी जय हो, जय हो। हे बकासुर के विदारक! है अघासुर और प्रलम्बासुर के प्राणनाशक! तुम्हारी जय हो, प्रभु की जय हो। हे प्रभु! तुमने वृन्दावन में वन-वन गौएँ चरायी हैं, अनेकों अनल-राम दैत्यकुलों का नाश किया है। हे प्रभु! तुम दर्जानों का दमन और सज्जनों का पालन करते हो। हे प्रभु! तुम पर दयालु हो! हे प्रभु! तुमने कालिन्दी के विषमय जल में कूद कालियनाग को नाथ सब गोप-गोपिका और गौओं की रक्षा की है। हे प्रभु! तुमने कदम्ब पर चढ़कर मधुरी वंशी बजा सब व्रज-गोपिकाओं को पागल कर दिया है। हे दीनदयालो! प्रणतप्रतिपाल! तुम्हारे मस्तक पर गु×जा की माला सुशोभित हो रही है। प्रभु! प्रभु! नाथ! तुम्हारी जय हो।’ प्रभु अन्तर्धान हो गये।
    सालबेग ने भाव के आवेग में इस प्रकार कितनी ही देर स्तुति कर अपने को भगवान् का दास समझ दृढ़ विश्वास करके उनके श्री चरणों में आत्मसमर्पण कर दिया। उस समय उसके शरीर में आनन्द-ही-आनन्द व्याप रहा था, नेत्रों से अनिमेष प्रेम-अश्रु-धारा बह रह रही थी। परंतु उसी समय वह चमक उठा और उसकी आत्मा ने बाह्यजगत् में प्रवेश किया। उसको अबतक अपने शरीर का बिलकुल भी भान न था, परंतु अब शरीर का ज्ञान हो गया। इससे उसके मन में यह विचार आया- ‘अहा! इतना भजन करने पर भी देह का दुःख तो दूर हुआ ही नहीं।’ ऐसा विचार कर वह अपनी माता से कहने लगा- ‘माँ! तेरे श्रीकृष्ण की उपासना की तो भी मेरी पीड़ा तो नहीं गयी। जान पड़ता है, यह तो उलटी बढ़ती ही जाती है।’ सालबेग के वचन सुनकर माँ ने कहा- ‘भाई! घबरा मत। उन नरहरि की लीला बहुत ही विचित्रा है। जब बड़े-बड़े कष्ट सहे जाते हैं तभी उन्हें दया आती है। अहा! तेरा कष्ट बढ़ाकर वे देख रहे हैं कि तू कष्ट में भी उनका मंगलमय नाम भूलता है या नहीं। इसलिये उन्होंने तेरी पीड़ा बढ़ा दी है, परंतु तू उन्हें भूल मत। उन्हंे नहीं भूलने में कल्याण है। बेटा! अब किसी भी प्रकार का सन्देह मन में न लाकर दृढ़ विश्वास से उन मुरलीधर का भजन कर।’
    माता कहती है कि ‘संशय न कर, संशय न कर’ परंतु संशय का त्याग करना क्या खेल है? देखते-ही-देखते ग्यारह दिन बीत गये तथापि पीड़ा ज्यों-की-त्यों रही। सालबेग कितना धीरज धरे? अब उससे सहन न हुआ, वह बहुत उकताकर माता से बोला- ‘माँ! प्रभु को भी यही अच्छा लगता होगा कि मेरी मृत्यु हो जाय, इसी से उन्होंने मेरे ऊपर दया नहीं दिखलायी! इसी से शायद उन्होंने मुझे इस दारुणा दुःख से नहीं छुड़ाया।’
    पुत्रा को इस प्रकार कलपते देखकर सालबेग की माता ने उसे कोई दूसरा उपदेश न दिया। उससे दूसरा उपचार नहीं बतलाया। वह अपने पुत्रा के मन में दृढ़ विश्वास उत्पन्न करने के लिये यही सलाह देने लगी कि ‘बेटा! धीरज धर। मन के सब सन्देह निकाल दे। सारे संशयों को छोड़ केवल श्रीहरि का ही स्मरण कर।’ 
    रात के समय सालबेग श्रीकृष्णभगवान् का चिन्तन करते-करते निद्रादेवी के अधीन हुआ। यदि श्रीकृष्णभगवान् ने कृपा करके रात को रोगमुक्त न किया तो प्रातःकाल होते ही आत्मघात का निश्चय करके वह सोते समय रात को कहने लगा कि- ‘हे प्रभु! यह मेरा अन्तिम निश्चय है, मेरी माता के अनुसार कल सवेरे बारह दिन पूरे होते हैं। बस, आज की रात बीच में है। इसमें यदि तुम्हारी कृपा न हुई तो अवश्य मैं आत्महत्या करके अपने देह का त्याग करूँगा। ऐसा होने से पीछे मेरी माता की मृत्यु होगी। इस प्रकार कल सबेरा होते ही हम दोनों इस लोक से विदा हो जायँगे।’
    माता भी सालबेग के पास ही सोयी है। वह भी विचार में ही हैं, परंतु उसका विचार जुदा है। वह भी श्रीकृष्णभगवान् का चिन्तन करती है। पर उसके चिन्तन मंे सन्देह या शंक की गन्ध भी नहीं। वह तो केवल शुद्धभाव से निःशंक हो श्रीहरि का स्वाभाविक स्तवन करती है। वह कालक्षेप कर रही है, उसे विश्वास है कि पुत्रा पर श्री हरि की कृपा होगी ही। हुआ भी वैसा ही, रात के दो पहर व्यतीत हो गये हैं। माता-पुत्रा दोनों गाढ़ी निद्रा में पड़े हैं। उसी वक्त श्रीहरि आ पहुँचे। सालबेग को एक बालमुकुन्द-वेष में विराजमान हैं और हँसते-हँसते कहते हंै- ‘सालबेग! अब फिक्र मत कर, उठ बैठ और मेरे हाथ से यह विभूति लेकर अपने घाव पर लगा दे, इससे तेरा घाव सूख जायगा और तू स्वस्थ हो जायगा। इसके बाद तेरा जीवन सुख मेें व्यतीत होगा, परंतु देख, पीछे मुझे भूल न जाना। अरे! निश्चय जान तेरा भवरोग भी दूर हो गया। जो किसी भी उद्देश्य से सरल विश्वास और श्रद्धा के साथ मुझे सच्चे मन से भजता है, उसको इस लोक और परलोक के सम्पूर्ण दुःखों से छुड़ाकर मैं अपना निज जन बना लेता हूँ।’ यह सुनकर सालबेग उठ बैठा और प्रभु के हाथ से विभूति लेकर अपने सब अंगों में लगाने लगा। थोड़ी-सी विभूति सिर पर धारण कर वह एकटक से मधुसूदन की मधुमय मू£त का दर्शनकरने लगा। देखते-ही-देखते वह दिव्य मू£त हँसती हुई वहाँ से अदृश्य हो गयी। सालबेग भी निद्रावश हो गया। सबेरा होते ही वह जाग उठा। उसके मन में आनन्द की तरंगें उछलने लगीं। उठकर देखता है कि माँ अभीतक सोयी है। अपने शरीर की ओर देखता है तो अत्यन्त विस्मित हो जाता है। उसके मस्तक का घाव सर्वथा मिट गया है और उसका केवल चिन्हमात्रा रह गया है। अब उसके शरीर में किसी प्रकार की व्यथा नहीं, क्लेश नहीं, शोक नहीं। उसे ग्लानि भी नहीं। वह उठकर अपनी माता को पुकारने लगा- ‘माँ! माँ!! देख, देख, तेरे करुणामय श्रीकृष्णभगवान् ने मुझ पर करुणा की है। उठ-उठ देख, मेरा घाव सूख गया है और मैं कृतार्थ हो गया।’
    माता तो श्रीकृष्ण का ध्यान करती-करती कृष्णमय बनी सोयी थी। पुत्रा के आनन्द-आवाहन को सुनते ही वह सारी बात समझ गयी। वह तुरंत उठ बैठी और स्नेहपूर्वक पुत्रा को देखने लगी। अहा! पुत्रा को देख उसके आनन्द की सीमा न रही। पुत्रा रोग से मुक्त हुआ है, इसी का आनन्द नहीं, बल्कि वह श्रीकृष्णभक्त- श्रीकृष्ण-विश्वासी बन गया है, इसी का उसे महान् आनन्द हुआ।
    माता को जगा देखकर सालबेग ह£षत हो बोला- ‘माँ! माँ!! देख मेरे शरीर में वह घाव नहीं और वह व्यथा भी नहीं है। मेरा समस्त शरीर दिव्य आनन्द से परिपूर्ण हो गया।’ माता ने कहा- ‘बेटा! श्रीकृष्णभगवान् की महिमा ऐसी ही है। उनके समान दुःखियों के दुःख को दूर करने वाला दूसरा कोई नहीं है। अब दृढ़ चित्त से तू उनका भजन कर।’
    सालबेग बोला- ‘हाँ, माँ! सत्य है उनके समान दुःख का नाश करने वाला देवता दूसरा नहीं। माँ! माँ!! तेरी कृपा से, तेरी शिक्षा से मेरा जीवन सफल हो गया। माँ! मुझे अब तू प्रसन्नचित्त से आज्ञा दे अब मैं यहाँ नहीं रहूँगा। मैं संन्यासी होकर देश-देश घूमकर इस अनन्त दयासागर भगवान् की महिमा का प्रचार कर जन्म को सफल करूँगा।’
    सालबेग की माता भी सामान्य माता न थी। उसकी साधनावस्था सालबेग से भी कहीं उन्नत थी। मन भी वशीभूत थ

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