Sadan Kasai Bhakt भक्त सदन कसाई 

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महाभारत में धर्मब्याध की कथा आती है। पैतृक व्यवसाय के रूप में उन्हें कसाई का कर्म मिला था, परन्तु थे वे पूर्णतः ईश्वर-परायण। इसी प्रकार इस युग में भी बहुत समय पहले भक्त सदन प्रसिद्ध हुए हैं। वे भी जन्म से कसाई थे। किन्तु उन्होंने स्वयं किसी जीव का वध नहीं किया। वे दूसरे कसाइयों से माँस लेकर तराजू-बाँटों से तोल कर बेच देते। इस कार्य-व्यापार को वे यंत्रावत् ही करते, रुचि के साथ नहीं, पारिवारिक व्यवसाय के रूप में केवल जीविकोपार्जन के लिए। सारा व्यवहार करते हुए भी वे पूर्व जन्म के संस्कारवश हरि के चरणों में ही रमे रहते। उनके श्वास-श्वास से हरि-हरि का अविकल जप होता रहता। भगवान् की प्रतिज्ञा है, जहाँ उनका नाम-कीर्तन होता है, वहाँ वे सदा ही प्रसन्नभाव से विराजमान रहते हैं। सदन के पास भी शालग्राम विराजमान थे, पर उन सरल-हृदय भक्त को भगवान् की उपस्थिति का रहस्य पता ही नहीं था। वह तो शालग्राम को ‘बाट’ बनाकर उससे माँस तोलते थे। एक बार एक साधु उधर से अकस्मात आए और उनकी दृष्टि ने शालग्राम के स्वरूप को पहचाना। ‘माँस-विक्रेता के तराजू का बाट? यह शालग्राम का पवित्रा स्वरूप? छीः छीः।’ घृणा से उनका मुख बिचक गया। उन्होंने सदन से शालग्राम माँग लिए। सदन ने सोचा, “एक पत्थर के टुकड़े से साधु प्रसन्न होता है, तो मेरा अहोभाग्य है! मैं दूसरा पत्थर तराजू में रख लूँगा।” और सदन ने साधु को शालग्राम दे दिए। 
पर भगवान् को भक्त से पार्थक्य सहन नहीं हुआ। साधु ने शालग्राम की पूजा की, भोग लगाया, पूरे विधि-विधान का पालन किया। पूजा करने और कसाई के यहाँ से शालग्राम के ‘उद्धार’ करने की भावना के अहंकार से वह अपने को ‘महान’ समझ बैठा। पर भगवान को विधि-विधान नहीं चाहिए, अहंकारी उपासक से उन्हें प्रसन्नता नहीं होती, वह तो सरल-हृदय भक्त के प्रेम पर आठ-आठ आँसू रोकर उसके ही आगे-पीछे फिरते हैं। उसी रात साधु महाराज को स्वप्न हुआ। भगवान् शालग्राम ने उससे कहाµ “मुझे सदन के यहाँ ही पहुँचा दो। उसके कीर्तन को सुन-सुन मेरा रोम-रोम पुलकित होता है। उसका स्पर्श मुझे सुखद-शीतल जान पड़ता है। मेरा मन यहाँ बिल्कुल नहीं रम रहा। मुझे मेरे भक्त के पास ही वापस ले चलो।” साधु भय और ग्लानि से अपने को धिक्कारने लगा। उसने शालग्राम वापस सदन को भेंट कर दिए। प्रभु की इस कृपा का वृत्तान्त सुनकर सदन भी उनके प्रेम में निमग्न हो गया। करुणाकर और उसकी भक्ति की महिमा का चिन्तन करते हुए सदन ने अपने घृणित व्यवसाय को तिलांजलि दी और पुरुषोत्तम क्षेत्रा पुरी की यात्रा पर चल पड़े। 
जगन्नाथ की नगरी अभी दूर थी। मार्ग में दैव योग के सदन एक गृहस्थ के यहाँ रात्रि व्यतीत करने की दृष्टि से ठहर गए। हृदय में केवल हरिनाम था, और भगवान का दर्शन पाने की उत्कृष्ट इच्छा। उस परिवार में पति-पत्नी दो ही प्राणी थे। सदन का स्वस्थ और सुन्दर रूप-यौवन देखकर वह कुलटा स्त्राी इन पर आसक्त हो गई। रात्रि के अन्धकार में इनके कक्ष में आई और अपनी वासना शान्त करने की चेष्टा की। सच्चा भगवदीय इस प्रपंच में कैसे फँस सकता है। उन्होंने दीनता से कहाµ “माता जी, मैं आपका पुत्रा हूँµ मुझे क्षमा कीजिए। मैं अभी अपनी यात्रा पर जाता हूँ।” उस कुलटा ने इन्हें आश्वस्त किया और बाहर आकर स्वयं अपने पति का सिर काटकर भय-मुक्त हो गई। पुनः सदन के पास आकर वह कुचेष्टा करते हुए याचना करने लगीµ “देखो, यात्राी! अब इस घर में मेरे और तुम्हारे अतिरिक्त कोई अन्य पुरुष नहीं है। मैंने अपने पति को यमलोक भेज दिया हैµ” वह इनकी ओर बढ़ने लगी। पर सदन पर उसका क्या प्रभाव होता है। हताश होकर वह पिशाचिनी इस पर बैठकर रोने लगीµ“हाय! इस यात्राी ने मेरे पति की हत्या कर दी और मुझे पाप में धकेलना चाहता है।” ग्रामवासी इकट्ठे हो गए। सदन के मुख पर न पश्चाताप है, न शोक। भगवान और उनकी लीला का स्मरण करते हुए वे मौन रहे। अन्त में न्यायाधीर के सम्मुख भी उन्हें उपस्थित होना पड़ा। वहाँ भी वे हरि स्मरण में ही अनुरक्त रहे। वाणी संसार की ओर से मौन हो गई थी। दण्ड मिला। दोनों हाथ काटकर उन्हें नगरी से निकाल दिया गया। 
प्रभु की लीला का गुणगान करते हुए वह पुरी की ओर चल पड़े। प्रभु का अनुग्रह करने का ढंग भी अनेक बार खड़ा रहस्यमय होता है। उन्होंने जगन्नाथ जी के पुजारी जी को स्वप्न में आदेश दिया कि ‘मेरा अमुक-अमुक भक्त आ रहा है। उसके हाथ कटे हुए हैं। उसे सम्मानपूर्वक ले आना।’ सदन की समझ में भी कुछ न आया। एक ओर तो हाथ कट गए, दूसरी ओर पालकी आ रही है। ‘जिन भक्तवत्सल को मेरा इतना ध्यान है, उन्हें क्या हाथ कटने का पता न होगा?’ सोच-सोचकर वह प्रभु के ध्यान में बेसुध हो गए। पालकी पुरी की ओर बढ़ती जा रही थी। जगन्नाथपुरी में पहुँच कर जब सदन ने भगवान को दण्डवत् किया और उनका किर्तन करने के लिए उन्मत्त हो भुजाएँ ऊपर उर्ठाईं, तो उनके हाथ पूर्ववत् हो गए और वे ‘हरि हरि बोल, बोल हरि बोल’ के मधुर स्वर के साथ नृत्य करने लगे। नाम स्मरण करते ही उन्हंे कब निद्रा आ गई, इसका पता ही नहीं चला। मन में एक ऊहापोह मच गया। अन्तर्यामी करुणावतार प्रभु से तो हमारी कोई वृत्ति छुपी नहीं है। निद्रामग्न सदन को स्वप्न हुआµ “तुम पूर्व जन्म में काशी में सदाचारी ब्राह्मण थे। एक कसाई गाय के पीछे भाग रहा था। तुमने दोनों भुजाएँ गाय के कण्ठ में डालकर उसे रोक दिया। वह कसाई उस स्त्राी का पति था। गाय ही स्त्राी रूप से जन्मी और पूर्व जन्म का बदला लेने के लिए उसने उसका गला काटा। तुमने भुजाओं से गाय रोकी थी, इस अपराध से तुम्हारे हाथ काटे.....“ प्रभु ने स्वप्न में दर्शन दिया। भक्त का समाधान हुआ और भक्ति अविचल हो गई, अनपायनी। सदन भगवत्कृपा से हर समय मानो भगवान की रूप माधुरी का ही दिव्य दर्शन करने लगे। कालान्तर में उन्होंने भगवान जगन्नाथ जी के चरणें में ही यह नश्वर शरीर त्याग कर परमधाम की यात्रा की। भगवान ने अनुग्रह कर उन्हें इस जीवन में ही अपना दर्शन दिया, उनके संग-संग रहे, उनकी वाणी और स्पर्श के लिए व्याकुल बने रहे और सिद्ध कर दिया कि वह करुणकर भक्त को अपेक्षाकृत दूना ही प्यार करते हैं..... तुम्ह ते प्रेम राम के दूना।’

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