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ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम्। विश्वस्य एक परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वा अमृता भवन्ति ॥ 7 ॥            You are the Supreme Brahman, infinite, yet hidden in the hearts of all creatures. You pervade everything. They, who know You, are free from the cycle of birth, death and rebirth. (Svetasvatara 3 : 7)            परमात्मा सब प्रकार से सब काल में मुक्त और शुद्ध है। वह अपरिमित और अनन्त होते हुए भी सभी प्राणियों के हृदय में छिपा हुआ है। परमात्मा को जानने वाले व्यक्ति ही जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।

अज़ छि ज़्येठॖ ॴठम 30.05.2020 ज़्येठॖ (जेष्ठ) ज़ूनॖ पछॖ (शुक्ल पक्ष) ॴठम (अष्टमी) बटॖवार (शनिवार/शनिश्चरवार) श्री सप्तर्षि सम्वत 5096, राश सिंह (चलान) ....Today is Jyesth Maas Shukla Paksh Ashtamiyaam Shanivsasre sanayitaam. Kashmiri Pandit Nirvasan Samvat_31 Sapthrishi Samvat _5096
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गोस्वामी श्रीरूपलालजी Goswami Shree Rooplal

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गोस्वामी श्रीरूपलालजी महाराज
जानहिं संत सुजान हिये जिन के निरदूषन।
ललित भजन रस रीति निर्वहन कुल के भूषन।।
हित कुल उदित उदार प्रेम पद्धति चलि आई।
कृष्ण बल्लभा चरन कमल के भंृग सदाई।।
सोइ बिदित बात संसार मंे मन क्रम सेवत जुगल पद।
गुन गहर सिंधु सम देखिए श्रीरूपलाल सब कौं सुखद।।
- चाचा श्रीवृन्दावन हितरूप
    रसिकाचार्य गोस्वामी श्रीहित हरिवंशचन्द्र महाप्रभुपाद के पवित्रा एवं भक्ति-परायण कुल में गोस्वामी श्रीरूपलालजी महाराज का जन्म विक्रम संवत् 1738 वैशाख कृष्णा सप्तमी को हुआ था। आपके पिता का नाम गोस्वामी श्रीहरिलाला एवं माता का श्रीकृष्णकुँवरि था।
    इनका बचपन महापुरुषोचित अनेकों चमत्कारों से पूर्ण था, जिनका वर्णन यहाँ अप्रासंगिक होगा। ये ज्यों-ज्यों बड़े होते गये, इनके शील, सौजन्य, कोमल स्वभाव, दया, प्रेम आदि गुणों का क्रमशः स्वाभाविक प्रस्फुरण होने लगा।
    उन दिनों भारत मुगल-शासन मंे था। यवनों के अत्याचार वृद्धि की सीमापर थे। उनसे पीड़ित वृन्दावन वासी भक्तगण अपने-अपने इष्टदेव के अर्चा-विग्रहों को यत्रा-तत्रा छिपाये फिरते थे। बादशाह औरंगजेब से सताये जाने पर महाप्रभु श्रीहितहरिवंशचन्द्र के इष्टदेव श्रीराधावल्लभलालजी महाराज, जो वंशपरम्परा से श्रीहरिलाल जी के इष्टदेव थे, उन दिनों कामवन के समीप अजानगढ़ में छिपे विराजते थे। 
    एक बार श्रावण के महीने में यमुना में भारी बाढ़ आयी, जिससे अजानगढ़ डूबने लगा। अजानगढ़ के डूबने की खबर श्रीवन में अभी तक किसी को न थी। एक दिन बालक रूपलाल अकस्मात् विलख-विलखकर रोने लगे। उनके शरीर में एक साथ प्रेम के अनेकों सात्त्विक भाव उदय हो आये। इनके पिताजी और अन्य भक्तों के पूछने पर और कुछ न कहकर इन्हांेने अजानगढ़ (कामवन) चलकर श्रीराधावल्लभजी के दर्शन करने की इच्छा प्रकट की। पुत्रावत्सल पिता श्रीहरिलाल जी इन्हें अजानगढ़ ले गये। बाढ़ की कठिनाइयों को झेलते हुए ये कामवन (अजानगढ़) पहुँचे।
    श्रीराधावल्लभजी का दर्शन करके ये ऐसे प्रेम-तन्मय हुए कि शरीर की सुधि ही जाती रही। आँखों से आँसुओं की अविरल धारा बह चली। बहुत देर के पश्चात् जब इन्हें चेतना हुई, ये अपलक नेत्रों से अपने प्रियतम की रूप-माधुरी का पान करने लगे।
    इनकी दशा देखकर ऐसा प्रतीत होता था मानो बहुत समय से बिछुड़े दो प्रेमियों का आज प्रथम मिलन है। प्रेम के आवेश में ये अपने-आप को सम्हालने मंे असमर्थ हो गये और शुचि-अशुचि अवस्था का भी ध्यान भूलकर श्रीराधावल्लभलाल को अपने भुज-बन्धन में बाँध लेने के लिये उनकी ओर लपके। ये शीघ्रता से निज-मन्दिर की देहली को पार किया ही चाहते थे, तब तक इनके पिताजी ने इन्हें अपनी गोद में उठा लिया। अपने-आपको बन्धन में देखकर ये उसी भावावेश में जोर-जोर से चिल्लाने लगे- ‘मुझे छोड़ दो! मैं राधावल्लभ से भेंटूँगा, मैं उन्हंे निरखूँगा; अरे, मैं उनके कोमल-कोमल चरणों का स्पर्श करूँगा; मुझे छोड़ दो! मुझे छोड़ दो।’
    इनकी छटपटाहट और पे्रम की उतावली को देखकर पिताजी ने प्यार से पुचकारते हुए सतझाया- ‘बेटा! श्रीजी से ऐसी अपावन दशा में थोड़े ही मिला जाता है। अभी तुमने स्नान नहीं किया है और फिर तुम्हारा संस्कार भी तो नहीं हुआ है। हमारे कुल की परम्परा के अनुसार कोई भी गोस्वामी बालक बिना द्विजाति-संस्कार और वैष्णवी दीक्षा के न तो श्रीजी के मन्दिर में प्रवेश कर सकता है और न उनका स्पर्श ही। और फिर तुम तो अभी केवल नौ वर्ष के छोटे-से बालक हो, फिर यह सब कैसे हो सकता है।’
    पिताजी की बात सुनकर आप शीघ्रता से उनकी गोद से कूद पड़े और उसी आवेश में बोले- ‘अच्छा! लो, स्नान तो मैं अभी किये आता हूँ। रही संस्कारों की बात, उन्हें आप चाहे जब करिये; मैं तो प्रभु का दर्शन-स्पर्श करूँगा ही।’
    यों कहकर आप बड़ी तीव्र गति से यमुनाजी की ओर दौड़े और भीषण बाढ़ में कूद गये। नौ वर्ष के बालक की ऐसी प्रेमासक्ति देखकर पिताजी का हृदय आनन्द से बाँसों उछलने लगा। उन्होंने पुत्रा की प्रेम-पिपासा को शान्त करने के लिये उन्हें स्नान कराया और स्वयं भी किया और शीघ्र ही संक्षिप्त रीति से निज-मन्त्रा का दान कर दिया। ये मन्त्रा-श्रवण करते ही पुनः उसी प्रेमावेश में आ गये तथा उसी प्रेमोन्मादमयी दशा में उन्हें मन्दिर में प्रवेश कराया गया। अपने अनन्तप्राणाधिक प्रियतम श्रीराधावल्लभलाल जी के कोमल चरणों का स्पर्श करते ही इनके शरीर में विद्युत का-सा संचार हुआ तथा इनका शरीर दिव्य द्युति से चमक उठा। ये प्रेम-मुग्ध होकर अपने प्रियतम के चरणों से लिपट गये और लंबी-लंबी सुबकियाँ भरते हुए पावन प्रेमाश्रुओं से उनके चरणों का प्रक्षालन करने लगे। इनकी प्रेम-मुग्ध दशा देखकर पिताजी ने इनसे प्रभु के चरणों को छोड़ने की बात कही, पर ये छोड़ते ही न थे; तब स्वयमेव श्रीहरिलाल जी ने इन्हें पकरड़कर दूर किया। चरणों से दूर कर दिये जाने पर ये दोनों हाथों की अँजुली बाँधकर विरहिणी की भाँति फूट-फूटकर रोने लगे। बालक रूपलाला का रोदन सुनकर वहाँ उपस्थित सहòों नर-नारियों का हृदय भी भर आया। अन्त में इनके बाबा श्रीकमलनयनाचार्य जी ने इन्हें समझाया और आशिष दिया कि ‘बेटा! तुम हमारे कुल के भूषण होओगे।’ बाबा के वाक्य सुनकर ये लजा गये और शान्त होकर एक किनारे पर जा खड़े हुए। पश्चात् प्रसादी चन्दन, फूलमाला, बीड़ी आदि देकर इन्हें डेरेपर भेज दिया गया।
    इस प्रकार कितने ही दिनों तक आप पिताजी के साथ कामवन में रहकर श्रीजी का दर्शन-सुख लेते रहे। पश्चात् कामवन से बरसाना होते हुए श्रीवन आये। मार्ग में बरसाने की साँकरी खोर से होकर जब ये आ रहे थे, एक मतवाला हाथी इनकी पालकी की ओर आता दीखा, जिससे सारे अंगरक्षक और कहार पालकी छोड़कर भाग गये। इससे इनके पिताजी घबरा उठे, पर परिणाम हुआ कुछ और ही। मतवाले गजराज ने पालकी के पास आकर बालक रूपलाल के चरणों का अपनी सूँड़ से स्पर्श किया और वह चुपचाप एक ओर चला गया।
    क्यों न हो। जिन संतों के पुनीत हृदय में राग-द्वेष-रहित समता और स्नेह है, वहाँ ऐसे तमोगुणी स्वभाव वाले जीवों का झुक जाना, अपना स्वभाव छोड़ देना क्या आश्चर्य है। श्रीरसिकमुरारिजी ने तो मतवाले हाथी को शिष्य तक बना डाला था, जो पीछे महंत गोपालदास जी के नाम से प्रख्यात हुआ।
    इस घटना से इनके पिताजी खूब प्रभावित हुए और वे भलीभाँति समझने लगे कि यह बालक साधारण बालक नहीं- अवश्य कोई दिव्य महापुरुष है। 
    बालक रूपलाल के हृदय में श्रीठाकुरजी की सेवा का बड़ा चाव था। उत्तम आचार्य ब्राह्मणकुल तथा धन-धान्यसम्पन्न प्रतिष्ठित घर में उत्पन्न होकर भी आप स्वयं अपने हाथों श्रीप्रियाजी के रास-मण्डल की सोहनी (बुहारी) लगाया करते थे। यदि कोई इनके इस कार्य को छोटा बताकर इससे निवारण करने की बात कहता तो आप झट कह देते- तो क्या गोस्वामी श्रीहितहरिवंशचन्द्र ने ‘भवनांगणमार्जनी स्याम्’ अर्थात् ‘हे राधे! मंै आपके भवन के आँगन की मार्जनी हो सकूँ?’ यह असत्य ही कह दिया है? और स्वामी श्रीहरिदास जी ने भी तो कहा है- ‘कुंजनि दीजै सोहनी।’ क्या यह भी व्यर्थ है?
    इनके इन शब्दों से प्रस्फुटित होने वाली श्रद्धा, भक्ति और सेवा-निष्ठा लोगों को निरन्तर ही नहीं करती वरं सेवा-परायण बना देती थी। सेवा की इस लगन ने इनमें केवल ग्यारह वर्ष की ही अवस्था में एक विलक्षणता उत्पन्न कर दी। ये सेवा करते, चलते-फिरते-हर समय अपने सामने युगलसरकार का दर्शन किया करते।
    विद्याध्ययन और विवाह-संस्कार के पश्चात् लगभग बीस-इक्कीस वर्ष की अवस्था के उपरान्त आपने अपना सम्पूर्ण जीवन भक्ति-प्रचार और भ्रमण में व्यतीत किया। प्रथम बार गुजरात-प्रान्त की यात्रा में आपने श्रीरामकृष्ण मेहता के घर, जो परम वैष्णव थे, प्रीतिवश लगातार आठ मास तक विश्राम किया। इनके सत्संग से मेहताजी कृतकृत्य हो गये। उन्हें गोस्वामी जी की कृपा से युगलकिशोर श्रीराधा-श्यामसुन्दर के दर्शन भी हुए। 
    आपने व्रज-मण्डल की भी अनेकों यात्राएँ कीं, जिनमें एक बार गोविन्द-कुण्ड (गोवर्द्धन गिरिराज)- मंे निवास करते हुए आपने एक गिरिाज-शिला का लगातार छः मास तक आराधन किया, जिससे उस शिला से युगल-किशोर का प्राकट्य हुआ, जो अभी भी राधा-कुण्ड में विराजमान है। वहाँ श्रीरूपलाल जी की बैठक भी है।
    आपकी दूसरी यात्रा पूर्वीय भारत की हुई। इस समय जब आप जीवों को भगवन्मार्ग में लगाते हुए श्रीप्रयागराज पहुँचे, तब वहाँ एक महात्मा ने इन्हें सिद्धिप्रद नारिकेल-फल देते हुए कहा कि इसे खा लो, इससे आप में अनेकों सिद्धियों को प्रकाश हो जायगा।
    गोस्वामी जी ने उस नारियल को लेकर गंगा-संगम में फंेक दिया और कहा- ‘महाराज! जिसे भगवान् श्रीकृष्ण की चरण-कृपा और प्रीति की वा×छा है, उसके लिये इन सिद्धियों का प्रलोभन व्यर्थ ही नहीं, बल्कि अहितकर भी है। मुझे कहीं नाटक-चेटक थोड़े ही दिखाना है, जो मैं आपका नारियल रखँू।’ इनके इस उत्तर से वे सिद्ध महात्मा लज्जित-से हो गये। इस बहाने मानो आपने अपने भक्तों को सिद्धियों में न फँसकर अनन्य रूप से श्रीकृष्ण-भक्ति ही करने का उपदेश दिया।
    पश्चात् आप काशी होते हुए पटना आये। पटना में रामदास वैष्णव का प्रेममय आग्रह और अपने प्रभु की आज्ञा मानकर आपने उनके घर में विराजमान युगल किशोर के श्रीविग्रह को लेना स्वीकार किया।
    जगन्नाथपुरी जाकर नीलाचलनाथ के दर्शन करके आप अत्यन्त आनन्दित हुए और प्रभु के महाप्रसाद की प्रत्यक्ष महिमा देखकर आपका हृदय प्रसन्नता से फूल उठा।
    पूर्वीय प्रान्तों की यात्रा चार वर्षों में पूर्ण करके जब आप श्रीवृन्दावन आ रहे थे, मार्ग में कुछ दिनों के लिये आगरा ठहरे। वहाँ अपने अपने शिष्य वैष्णव दयालदास की पुत्राी विष्णीबाई की बीमारी दूर की। यही विष्णी गुरु-कृपा से आगे चलकर परम भक्ता हुई।
    अस्तु, श्रीहितरूपलाल जी गोस्वामी की इष्ट-निष्ठा वृन्दावनेश्वरी श्रीराधा के चरणों में थीं; अतः वे एक बार उनका दर्शन करने बरसाने गये। वहाँ गोस्वामी जी के अनुराग और भाव से प्रसन्न होकर स्वामिनी वृषभानु-दुलारी श्रीराधा ने आपको प्रत्यक्ष दर्शन दिये। श्रीस्वामिनीजी का दर्शन करके आप मुदित मन से गा उठे-
बरसानौं बर सिंधु भाव लहरिनु सरसैं।
लीला चरित सुबारि भरîौ भावुक दृग दरसैं।।
ललित रतन जा मध्य बास परिकर जु भानु कौ।
रसिक जौहरी लखत, तहाँ गम नहीं आन कौ।।
ससि तें प्रकास कोटिक जु सब राधा ससि जहँ उदित है।
मंडल अखंड चित एकरस मोहन चकोर लखि मुदित है।।
    गोस्वामी श्रीहितरूपलालजी महाराज श्रीराधावल्लभीय सम्प्रदाय के केवल आचार्य ही नहीं वरं एक सच्चे रसिक संत थे। इनका चरित्रा ही इनकी इष्ट-निष्ठा, प्रीति, भक्ति, सेवा, लगन, निःस्पृह भाव, दयालुता, लोकसेवा, निर्वैरता आदि का साक्षी है। इन्होंने अपने धर्म-पालन के लिये श्रीवृन्दावन और अपने इष्टाराध्य श्रीविग्रह श्रीराधावल्लभ-लालजी का परित्याग करने मंे कोई हिचक नहीं की। 
    गोस्वामी जी भक्त तो पूरे थे ही; साथ-साथ विद्वान् भी अच्छे थे। आपने अपने जीवन-काल में अनेकों भक्ति-ग्रन्थों की रचना की है, जिनमें से अबतक कोई बीस ग्रन्थ उपलब्ध हुए हैं। उनमें से कुछ के नाम दिये जाते हैं-
(1) अष्टयाम-सेवाप्रबन्ध, (2) मानसी सेवाप्रबन्ध, (3) आचार्य-गुरु-सिद्धान्त, (4) नित्य-विहार, (5) गूढ़-ध्यान (गोप्य-केलि), (6) पद-सिद्धान्त, (7) राधास्तोत्रा (गौतम-तन्त्रा के आधार पर), (8) व्रज-भक्ति और (9) वाणी-विलास इत्यादि।
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