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ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम्। विश्वस्य एक परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वा अमृता भवन्ति ॥ 7 ॥            You are the Supreme Brahman, infinite, yet hidden in the hearts of all creatures. You pervade everything. They, who know You, are free from the cycle of birth, death and rebirth. (Svetasvatara 3 : 7)            परमात्मा सब प्रकार से सब काल में मुक्त और शुद्ध है। वह अपरिमित और अनन्त होते हुए भी सभी प्राणियों के हृदय में छिपा हुआ है। परमात्मा को जानने वाले व्यक्ति ही जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।

अज़ छि ज़्येठॖ ॴठम 30.05.2020 ज़्येठॖ (जेष्ठ) ज़ूनॖ पछॖ (शुक्ल पक्ष) ॴठम (अष्टमी) बटॖवार (शनिवार/शनिश्चरवार) श्री सप्तर्षि सम्वत 5096, राश सिंह (चलान) ....Today is Jyesth Maas Shukla Paksh Ashtamiyaam Shanivsasre sanayitaam. Kashmiri Pandit Nirvasan Samvat_31 Sapthrishi Samvat _5096
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भक्त रामनारायण Bhakt Ram Narayan    

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भक्त लाला रामनारायण जी की जन्मभूमि तो पंजाब थी, परंतु वे बहुत समय से आकर बस गये थे मोक्षदायिनी भगवान् शंकर की काशीपुरी में। उनके साथ पंजाब के कई लोग और भी आये थे। रामानारायण जी भगवान् शंकर के अनन्य भक्त थे। प्रतिदिन बहुत तड़के ही गंगा-स्नान करके वे भगवान् विश्वनाथ जी के दर्शन करते और फिर घर लौटकर पा£थव पूजन, शिवसहòनाम का पाठ, महामृत्यु×जय मन्त्रा का भक्ति-श्रद्धापूर्वक जप करते थे। मध्याह्न तक उनका पूजा-पाठ चलता। उनकी पत्नी शारदा और पुत्रा शम्भुशरण भी भगवान् शिवजी के बड़े भक्त थे। कल्याणकारी ‘नमः शिवाय’ का अनवरत जप तो परिवार भर का स्वभाव ही बन गया था। आशुतोष भगवान शंकर की कृपा से रामनारायण जी का व्यापार चमका और वे थोड़े ही दिनों में सुख-समृद्धि से सम्पन्न हो गये।
    धन से अभिमान और स्वार्थ बढ़ा करता है, परंतु श्रीशंकर जी की कृपा से यहाँ सर्वथा विपरीत परिणाम हुआ। श्रीरामनारायण जी के ज्यों-ही-ज्यों सुख-समृद्धि और धन-ऐश्वर्य बढ़ा, त्यों-ही-त्यों उनमें नम्रता, विनय, त्याग की भावना और अन्यान्य दैवी-सम्पत्ति के गुण बढ़ते गये। सत्पुरुषों के पास आये हुए न्यायोपार्जित धन का सुकृत और सेवा में ही सदुपयोग हुआ करता है, इस सिद्धान्त के अनुसार रामनारायण जी का धन सत्कार्यों में लगने लगा। इससे उनकी कीर्ति भी बढ़ी।
    पंजाब से उनके साथ आये हुए लोगों में एक लाला दयालीराम थे। वे रामनारायण जी की उन्नति से मन-ही-मन मला करते। यद्यपि रामनारायण जी हर तरह से स्वाभाविक ही उनके साथ बड़ी उदारता और प्रीति का व्यवहार करते, फिर भी लाला दयालीराम की द्वेषबुद्धि बढ़ती गयी। श्रीरामनारायण जी को इस बात का कुछ भी पता नहीं था। परंतु दबी आग कब तक रह सकती है। ईंधन और हवा का झोंका पाते ही धधक उठती है। इसी प्रकार मौका पाते ही लाला दयालीराम की द्वेषाग्नि भड़क उठी। अब तो वे खुल्लमखुल्ला रामनारायण जी से वैर करने लगे और भाँति-भाँति से उन्हें सताने, परेशान करने और हानि पहुँचाने का प्रयत्न करने लगे। गालियाँ देने, गुंडों से पिटवाने, आग लगा देने और व्यापार में नुकसार पहुँचाने आदि के रूप में वैर-सम्पादन के भाँति-भाँति के प्रयत्न दयालीराम की ओर से चलने लगे!
    एक दिन रामनारायण जी गंगास्नान करके आ रहे थे। दयालीराम ने अचानक स्वयं आकर उनके दो जूते लगा दिये। रामनारायण जी हँसते हुए चले गये, परंतु उन्हें अपने साथी दयालीराम की इस गिरी हुई हालत पर बड़ी दया आयी। वे उनकी दुःस्थिति के कारण दुःखी हो गये। अपने अपमान और जूतों की मार के कारण नहीं, परंतु दयालीराम की मानसिक दुर्भावना के कारण वे चिन्तातुर हो गये। उन्होंने सोचा, कैसे दयालीराम जी की वृत्ति ठीक हो। उन्होंने मन-ही-मन उनसे विशेष प्रेम करने का संकल्प किया और संकल्पानुसार कार्य भी आरम्भ कर दिया। यह नियम है कि जब हम किसी के सम्बन्ध में अपने मन में द्वेष और वैर के विचार रखते हैं, तब वे हमारे विचार रूपी राक्षस उसकी ओर जाते हैं और उसके मन में भी द्वोष और वैर के विचार उत्पन्न करके उसको फिर अपनी ओर खींचते हैं। स्वार्थ, क्रोध, हिंसा, मद और लोभ आदि के विचारों का भी ऐसा ही असर होता है। इस प्रकार परस्पर में अशुभ विचार बढ़ते रहकर तमाम वातावरण को और तमाम जीवन को अशुभ बना देते हैं। इसके बदले में यदि किसी के प्रति प्रेम के विचारांे का पोषण हो तो वे भी वहाँ तक पहुँचते हैं और उसके मन में उभड़े हुए द्वेष को दबाकर प्रेम के भाव पैदा करते हैं। यों यदि बार-बार प्रेम के विचारों को बढ़ा-बढ़ाकर भेजा जाय तो अन्त में उसका द्वेष मिट जाता है और वह भी प्रेम करने लगता है। प्रेम प्रेम का और द्वेष द्वेष का जनक है। लाला दयालीराम के मन में वैर था, परंतु रामनारायण जी के मन में अत्यन्त सुदृढ़ और महान् प्रेम भरा था। अतएव दयालीराम के द्वेष के विचारों का रामनारायण जी के प्रेम के बढ़े हुए विचारों पर कोई असर नहीं हुआ; बल्कि वे विचार पे्रम के प्रबल विचारों से दबने लगे और उत्तरोत्तर क्षीण शक्ति होकर लौटने लगे। साथ ही रामनारायण जी के बढ़े हुए निर्मल और प्रबल प्रेम के विचार लगातार वहाँ पहुँचने लगे और उनके हृदय के अशुभ भावों को क्रमशः मिटाने लगे। अब लाला दयालीराम को अपने किये पर बीच-बीच में पश्चाताप भी होने लगा।
    इधर लाला रामनारायण को धैर्य नहीं हुआ, वे शीघ्र-से-शीघ्र दयालीराम को शुभ स्वरूप में देखने के लिये आतुर हो गये। अतएव उन्होंने एक दिन रात को एकान्त में आर्त होकर भगवान आशुतोष से करुण प्रार्थना की- 
    ‘मेरे स्वामिन! मुझे अपने साथी लाला दयालीराम जी के इस पतन का बड़ा ही दुःख है। आप अन्तर्यामी हैं; यदि मेरे मन में उनके प्रति जरा भी द्वेष रहा हो या अब भी कहीं हो तो मुझे उसका कड़ा दण्ड दीजिये; परंतु उनके मन में शांन्ति, सौहार्द और प्रेम पैदा कर दीजिये। मेरे नरकाग्नि की पीड़ा भोगने से भी यदि उनका चित्त शुद्ध होता हो तो मेरे भगवन! शीघ्र-से-शीघ्र इसकी व्यवस्था कीजिये। आपके दिये हुए धन-ऐश्वर्य और मान-कीर्ति से यदि उनके मन में दुःख होता तो प्रभु! आपकी इन चीजों को आप तुरंत वापस ले लीजिये। मुझे तुरंत राह का भिखारी और सर्वथा दीन-हीन, अपमानित बना दीजिये। ऐसा धन-वैभव और यश-सम्मान किस काम का, जो किसी भी प्राणी के दुःख का कारण हो। फिर भगवन! जहाँ तक, मेरे मन का मुझे पता है, मैंने तो कभी स्वामी से धन-सम्मान के लिये प्रार्थना भी नहीं की थी। मैं तो स्वामी की दी हुई वस्तुआंे को नित्य की ही सम्पत्ति मानकर स्वामी के आज्ञानुसार स्वामी की सेवा मेें ही लगाने का प्रयत्न करता रहा हूँ। परंतु ऐसा कहना भी मेरा अभिमान ही है। मैं क्या प्रयत्न करता हूँ। स्वामी ही तो सब कुछ करा रहे हैं। इस समय भी मैं जो कुछ कह रहा हूँ, इसमें भी तो दयामय स्वामी की ही प्रेरणा है। प्रभो! प्रभो! मैं दम्भ करता हूँ, मेरे मन में अवश्य ही कोई दोषबुद्धि, कोई पापभावना रही होगी। मेरा मन सचमुच ही किसी छिपे अपराध से भरा होगा, तभी तो मेरे कारण मेरे साथी को इतना उद्वेग हो रहा है। मैं ही तो उनके जीवन की अशान्ति और व्यथा का कारण हूँ। मैं यह भी कैसे कह सकता हूँ कि मेरे मन में धन-सम्मान की कामना नहीं थी और मैं इसका केवल स्वामी की सेवा में ही सदुपयोग कर रहा हूँ। प्रभो! अपना पाप मुझे दीख नहीं रहा है। यह मेरा और भी अपराध है। मेरे औढरदानी महादेव! मुझ पर आपकी कितनी कृपा है। मैं क्या कहूँ? स्वामी की कृपा और मेरी नालायकी में मानो होड़ लग गयी है! अब जैसा स्वामी उचित समझें, वैसा ही हो। परंतु मेरा बार-बार इस दुःख से रो रहा है कि कैसे दयालीराम जी की अशान्ति मिटे............।’
    हृदय की सच्ची प्रार्थना निश्चय ही सफल होती है। फिर भगवान शंकर तो आशुतोष ठहरे। प्रार्थना करते-करते ही रामनारायण जी समाधिस्थ हो गये। उन्होंने देखा- भगवान वृषभवाहन सामने उपस्थित हैं। बड़ी ही उज्ज्वल कर्पूरधवल कान्ति है, सिर पर पिंगल जटाजूट है। गले में वासुकि शोभा पा रहे हैं। एक हाथ में त्रिशूल, दूसरे में डमरू, तीसरे में रुद्राक्ष की माला है और चैथे हाथ से अभयदान दे रहे हैं। कटि में रीछ की छाल पहने हैं। विशाल नेत्रों से मानो कृपासुधा की वर्षा हो रही है। होठांे पर मुसकान है। देवदेव श्रींशकर जी के दर्शन पाकर लाला श्रीराम नारायण जी कृतार्थ हो गये। उनके नेत्रों से प्रेमाश्रु बहने लगे, शरीर रोमांचित हो गया, आनन्दातिरेक से वाणी बंद हो गयी। भगवान ने उनके मस्तक पर अभयहस्तारविन्द रखा और कहा- ‘रामनारायण! तेरी श्रद्धा, भक्ति और निष्काम सेवा ने मुझको अपने वश में कर लिया है। यह दयालीराम पूर्वजन्म में पिशाच था, इसके पहले जन्म में वह दक्षिणा पथ में ब्राह्मण था और तू वहीं पर एक व्यापारी था। तेरी बुद्धि उस समय भी श्रेष्ठ थी। वह ब्राह्मण होने पर भी कुसंग में पड़कर मद्य-मांस का सेवन करता था और डाके डालकर धन कमाया करता था। उसमें बड़ी क्रूरता आ गयी थी। एक दिन उसने तेरे घर में डाका डाला। तैंने उसके साथ उस समय भी बड़ा सद्व्यवहार किया और मनमाँगा धन देने के बाद उसे मेरी भक्ति और ‘नमः शिवाय’ मन्त्रा-जाप करने का उपदेश दिया। तेरे सद्व्यवहार का उस पर बड़ा प्रभाव पड़ा और वह मेरी पूजा करने लगा। एक बार रामेश्वर में जाकर उसने मुझ पर जल और बिल्वपत्रा चढ़ाये थे। अपने पापों के कारण वह दूसरी योनि में पिशाच हुआ, परंतु तेरे संग तथा मेरी पूजा के फलस्वरूप वह योनि दस ही वर्षों में छूट गयी और उसने पुनः क्षत्रिय-कुल में जन्म धारण किया। पिछले मानव शरीर में उसका जीवन द्वेष, हिंसा, क्रोध और वैर की भावनाओं का घर बना हुआ था। निरीहों को सताना और भला करने वालों का भी बुरा करना उसका स्वभाव बन गया था। उन्हीं संस्कारों के कारण उसने इस जन्म में भी तुझसे वैर-विरोध किया। परंतु तेरा हृदय सर्वथा निर्वैर तथा पवित्रा प्रेम से परिपूर्ण होने के कारण उसके वैर ने तुझ पर तो कोई असर किया ही नहीं, प्रत्युत तेरे प्रेम से उसका हृदय क्रमशः पवित्रा हो गया है। आज तो तेरी प्रार्थना से वह सर्वथा पवित्रा हो गया है। तुझे धन्य हैं, जो अपनी सद्भावना से तू असतों को सत् बना रहा है। मैं तुझ पर बहुत ही प्रसन्न हूँ। मैं जानता हूँ तेरी धन-सम्मान में जरा भी आसक्ति नहीं है। इसी से तो उनके द्वारा मेरी आदर्श सेवा हो रही है। आसक्तिमान् पुरुष के धन से मेरी (भगवान की) सेवा नहीं बन सकती। तू सुख-शान्तिपूर्वक यहाँ का कर्तव्य पूरा करके मेरे दिव्यलोक में जायगा। निश्चिन्त रह कर मेरा भजन करता रह।’
    भगवान् श्रीशंकर जी इतना कहकर ज्यों ही अन्तर्धान हुए, त्यांे ही लाला रामनारायण जी की समाधि टूटी। उन्होंने देखा- दयालीराम चरणों में पड़े रो रहे हैं। रामनारायण जी ने उनको भगवान शंकर का कृपापात्रा समझकर उठा लिया। दयालीराम चरण छोड़ना नहीं चाहते थे। बार-बार अपनी करतूतों का वर्णन करते हुए कातर काण्ठ से रो-रोकर क्षमा माँग रहे थे। उनको सच्चा पश्चाताप था। भगवान् शंकर जी की कृपा, रामनारायण जी के सद्भाव और सच्चे पश्चाताप की आग ने उनके समस्त पाप और पाप बीजों को जला दिया। श्रीरामनारायण जी ने उठाकर उन्हें हृदय से लगा लिया और बहुत तरह से सान्त्वना देकर तथा श्रीशंकरजी की भक्ति का उपदेश देकर विदा किया। 
    श्रीदयालीराम के मन में पूर्वजन्म की स्मृति आ गयी। वे ‘नमः शिवाय’ मन्त्रा का जाप तथा भक्तिपूर्वक श्रीशंकर जी की उपासना में लग गये। रामनारायण जी के साथ उनका प्रेम अटूट हो गया। दोनों साथी भगवान् श्रीविश्वनाथ जी की सेवा में जीवन समर्पण करके कृतकृत्य हो गये।


 

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