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दमी डीठम नद वहवनी, दमी डयूठुम सुम नत तार। दमी डीठम थर फवलवनी, दमी डीयूठुम गुल नत खार।। Now I saw a river flowing, Now neither a bridge nor a ferry. Now I saw a plant in full bloom, now neither a flower nor a thron to be seen.

भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जय: | अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च || 8|| आप द्रोणाचार्य और पितामह भीष्म तथा कर्ण और संग्राम विजयी कृपाचार्य तथा वैसे ही अश्र्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा।। ८।। There are personalities like yourself, Bheeshma, Karna, Kripa, Ashwatthama, Vikarn, and Bhurishrava, who are ever victorious in battle. (8)  श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय पहला श्लोक.।।८।।

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Anashakti Hai Seresth अनासक्ति है पूजा और नमाज से श्रेष्ठ: हसन अल बसरी



 

प्राचीन मुस्लिम साधकों में हसन अल बसरी सर्वाधिक लोकप्रिय हैं। उन्होंने भारतीय साधुओं की तरह अपने जीवन में संन्यास को ही अधिक महत्व दिया था और दूसरे सूफी संतों की तरह रहस्यवाद को कम।

उनका जन्म मदीने में सन् 643 ई. में हुआ था और स्वर्गवास 11 अक्टूबर सन् 728 ई. को। उनकी मां हजरत मुहम्मद की पत्नी आयशा की परिचारिका थीं। हसन वास्तव में धनी थे और हीरेजवाहरात का व्यवसाय करने वाले जौहरी थे। लेकिन उसे छोड़कर उन्होंने अपने लिए एक कष्टमय जीवन की राह चुनी।

उन्होंने चौथे खलीफा हजरत अली से संन्यास की दीक्षा ली थी। वह अत्यंत त्यागी और भगवत्प्रेमी थे। लेकिन इसके साथ वह बहुत अच्छे कानून दाँ और कवि भी थे। उनकी वाणी का लोगों पर बहुत प्रभाव पड़ता था।

अत्तार ने उनके बारे में लिखा है कि वह बिल्कुल एकांत में रहते थे और किसी से भी उनकी कोई चाह नहीं थी। किसी ने भी उन्हें कभी हंसते हुए नहीं देखा था। उनके शिष्यों में सूफी न भी थे और कट्टर मुसलमान भी। वे । परमात्मा को सर्वातीत मानते थे, फिर भी । उनका कहना था कि आत्मशुद्धि के  द्वारा उसे पाया जा सकता है।

उनका कहना था कि सांसारिक बंधनों के मायाजाल को काटने पर ही मनुष्य परमात्मा को पाने की आशा रख सकता है। जिसने सभी इच्छाओं को त्याग दिया है और इस क्षणभंगुर संसार से मुंह मोड़ लिया है, उसे परमात्मा स्वयं ग्रहण करेंगे। बसरी कहते थे कि पाप

कर्म में रत रहने वाले को परमात्मा दण्ड देता है, इसलिए अपने गुनाहों के लिए पश्चाताप करो।

बचपन में उन्होंने कभी कोई एक गलती की थी। उसे वह भूल न जाएं और फिर उस कर्म को दोबारा न कर बैठें, इस बात को बराबर स्मरण रखने के लिए वह जब भी नया वस्त्र धारण करते थे, तो उस समय उसे उस वस्त्र पर लिखकर रखते और लिखने के समय । ऐसा क्रन्दन करते कि बेहोश हो जाते।

हसन अल बसरी ने बहुत बार कहा है । कि इस संसार के प्रलोभनों में फंसकर

उस दूसरे संसार को न बिगाड़ो। उनके मत से बुद्धिमान वही है जो कोई भी ऐसा काम नहीं करता जिससे उस संसार को पाने में बाधा हो। उनका कहना था कि सच्चा वैराग्य वही है, जो परमात्मा के लिए हो। स्वर्ग पाने की आशा से जो वैराग्य किया जाता है, वह वैराग्य नहीं है। अपने साथ रहने वाले एक फकीर सैयद  जुबैर से उन्होंने एक बार कहा  था कि संसार में तीन चीजों से

हमेशा बचना चाहिए -

1. भूलकर भी सुल्तानों से सम्पर्क न रखें

2. किसी भी स्त्री के साथ एकांत में न रहें

3. किसी की बातों पर कान न दें।

हसन ने बार-बार दुहराया है कि नश्वर जगत की वस्तुओं के मोह को त्यागो, क्योंकि बिना उनसे छुटकारा पाए दूसरे संसार को पाना संभव नहीं हो सकता। वास्तव में उनके बाद के सूफी साधनों में रहस्यवादी प्रवृत्ति की जैसी प्रधानता देखी जाती है, वैसी हसन में नहीं। लेकिन फरीदुद्दीन अत्तार ने हसन बसरी के एक प्रवचन का उद्धरण दिया है जिसमें कहा गया है- जब स्वर्ग में वास करने वाले पहली बार अपनी आंखें खोलते हैं तो सात लाख वर्षों तक भावाविष्टावस्था में रहते हैं, क्योंकि अपनी परम विभूति के साथ परमात्मा अपने को उनके सामने प्रकट करते हैं। इस प्रकार से परमात्मा तक पहुंचने, उससे साक्षात्कार होने की बात भी हसन के प्रवचनों में पाई जाती है। हसन बसरी कहते थे कि अनासक्ति का एक बिंदु सहस्त्रों वर्षों की नमाज और रोजा से श्रेष्ठ है। जिसने ईश्वर को पहचाना है उसने उनके प्रति प्रेम की स्थापना की है और जिसने संसार को पहचाना है उसने ईश्वर से शत्रुता की है। मनुष्य की अपेक्षा बकरी जैसा जीव भी सावधान रहता है जो चरवाहे का शब्द सुनकर चरना छोड़कर मैदान से उसकी ओर दौड़ आती है। लेकिन मनुष्य ईश्वर का आहवान सुनकर भी उनकी ओर नहीं जाता और अपने भोग सुख से विरत नहीं होता।