#

#

दमी डीठम नद वहवनी, दमी डयूठुम सुम नत तार। दमी डीठम थर फवलवनी, दमी डीयूठुम गुल नत खार।। Now I saw a river flowing, Now neither a bridge nor a ferry. Now I saw a plant in full bloom, now neither a flower nor a thron to be seen.

भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जय: | अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च || 8|| आप द्रोणाचार्य और पितामह भीष्म तथा कर्ण और संग्राम विजयी कृपाचार्य तथा वैसे ही अश्र्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा।। ८।। There are personalities like yourself, Bheeshma, Karna, Kripa, Ashwatthama, Vikarn, and Bhurishrava, who are ever victorious in battle. (8)  श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय पहला श्लोक.।।८।।

professional logo

Avdheshanand Gire अवधेशानन्द गिरी



सत्य के मार्ग से हटकर हम सुखी नहीं रह सकते
अवधेशानन्द गिरी
यह जीवन इधर उधर भटकने के लिए नही है । जीवन दिशा हीन जीने का कोई प्रयोजन नहीं ,क्योंकि जिसकी दिशा और लक्ष्य नहीं ,वह अवश्य ही कठिनाइयों की आंधियां में घिरकर अंततः जीवन से ही हाथ धो बैठता है। 
जीवन जीने का एक लक्ष्य होना चाहिए । एक विचार होना चाहिए सत्य को पाने का सत्य से जीने का । जो सत्य से भटक जाता है वह खो जाता है। यह जीवन परमात्मा की अमानत है। परमात्मा ने इसे जीने की एक दिशा दी है । जो उससे भटका वह सत्य से दूर चला गया । सत्य स्वयं परमात्मा है । मैं और अंहकार ही जीव के दुख के कारण है । 
एक घटना याद आती है । एक विमान चालक आकाश की बुलंदियों में तीव्र गति से जा रहा है। था। अचानक आकाश में तेज हवा चलनें लगी । जिस गति से विमान जा रहा था। ,उसके सामने उतनी ही गति से हवा आ रही थी । विरोधी दिशा से चलने वाले अंधड़ के चलते पायलट को लग रहा था, विमान आगे नही बढ़ रहा । विमान चलता हुआ भी आकाश में स्थिर सा लग रहा था जैसे ही विरोधी दिशा से आ रही हवा धीमी हुई , पायलट को लगा ,विमान कुछ आगे बढ़ रहा है । जब विरोघी दिशा से आने वाली हवा पूरी तरह बन्द हो गई तो उसे लगा विमान अपनी पूरी गति से आगे बढ़ रहा है । क्या जीवन भी ऐसा नही है ! क्या इंसान भी ऐसा ही जीवन नही जी रहा है । मैं और अंहकार के चलते लगता है, वह जीवन जी रहा है लेकिन वस्तुतः जीवन टहरा हुआ है ,निश्चेष्ट है , अंहकार ही तो असल में दुख का कारण है । अंहकार ही रोग है , जो जीव को परमात्मा से दूर रख रहा है। सत्य के मार्ग से हट कर ही जीव दुखी है । सत्य के मार्ग से हटकर ही जीव दुखी है। सत्य के मार्ग पर चलने वाले को न तो अंहकार हो सकता है। न ही वह दुखी होता है क्योकि परमात्मा को पाने के मार्ग में दुख है ही नहीं । 
एक संन्यासी को संन्यस्त हुए काफी समय हो गया । अनेक शिष्य बन गए। जहां जाते ,शिष्यों की भिड़ उमड पड़ती । हजारो की संख्या में लोग प्रवचन सुनने आते । वह दुसरों को त्याग करने का उपदेश देते कहते ,त्याग से ही ज्ञान मिलता है ,त्याग से ही मन प्रसन्न रहता है त्याग से अंहकार नही आता । जब अंहकार नही आयेगा ,जीव ब्रह्म हो जायेगा क्योंकि जीव है ही ब्रह्म। लेकिन बातचीत में वह कह रहै थे कि संयासी होने से पहले उनकी अपार धन संपदा थी ऐश्वर्यशाली जीवन जी रहें थे। सब कुछ छोड़ दिया और संयासी बन गए इतना कहते-कहते उनके चेहरे पर ऐसे भाव पैदा हुए जैसे उन्होने यह सब त्याग कर बहुत बड़ा तीर मारा है आंखों में एक चमक सी पैदा हुई लगा अपने त्याग की करते-करते उनका मन प्रफुल्लित हो उठा । लगा जैसे वह मन से त्याग नही कर पायें ऐसा होता तो कुछ साल पहले की घटना को दोहराने से उनकी आंखों में अहं की चमक पैदा न होती ।
दुसरों को दुनयावी पदार्थो के मोह में न पड़ने का उपदेश देने वाला ही यदि स्वयं इस मोह का त्याग न कर सके तो दुसरों को यह शिक्षा देने का क्या लाभ । जो दुसरों को अपरिग्रह की शिक्षा देता फिरता है और अपने पास धन का अंबार लगाता जा रहा तो दुसरों को धन के लाभ से दूर रहने की शिक्षा का क्या लाभ। यह ज्ञान का अहंकार नही तो क्या है।