#

#

दमी डीठम नद वहवनी, दमी डयूठुम सुम नत तार। दमी डीठम थर फवलवनी, दमी डीयूठुम गुल नत खार।। Now I saw a river flowing, Now neither a bridge nor a ferry. Now I saw a plant in full bloom, now neither a flower nor a thron to be seen.

भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जय: | अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च || 8|| आप द्रोणाचार्य और पितामह भीष्म तथा कर्ण और संग्राम विजयी कृपाचार्य तथा वैसे ही अश्र्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा।। ८।। There are personalities like yourself, Bheeshma, Karna, Kripa, Ashwatthama, Vikarn, and Bhurishrava, who are ever victorious in battle. (8)  श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय पहला श्लोक.।।८।।

professional logo

Pane ke Echha कुछ पाने की इच्छा है तो कुछ का त्याग करना होगा



कुछ पाने की इच्छा है तो कुछ का त्याग करना होगा
निर्मल जैन
निर्वाण का अर्थ संसार के ऊहापोह भरे सागर से ऊपर किसी पहाड़ी पर जा कर बसना नही है । निर्वाण का मतलब मन पर विजय है ,समय का अतिकर्मण है। जिसने मन पर काबू पा लिया उस पर समय के कालचक्र का नुकीलापन प्रभावी नही होता। इसलिए हम मन से शून्य बने ,उसे माजने के चक्कर में न पडे़।हम अतीत हो जायें मन से भी ,शरीर से भी ताकि स्वयं ही हमारे सामने जीवन की यथार्थता स्पष्ट हो जाये महावीर मन -मंजन के लिए संसार मुक्त नही हुए, अपितु संसार और संयास के जाल बुनने वाले मन से मुक्त होने के लिए वैराग्य मार्ग पर आरूढ़ हुए। महावीर बनना है तो इन्द्रियों को जीत कर मन को अपने वश में करना होगा क्योकि मन पर काबू पाना ही दुनिया का सबसे कठिन काम है।क्रोध ,काम,लोभ,मोह और अंहकार जैसे विकारो पर लगाम कसना हर किसी के बस की बात नहीं। इसके लिए तो चाहिए दृढ़ संकल्प ,  दृढ़ इच्छा -शक्ति ।इसलिए जो यह काम कर दिखाता है ,वही सही मायने में महावीर होता है।  
मन में कामना की कल्पनाएं मक्खियों की तरह इधर -उधर भिनभिनाती रहती है । ये कल्पनाएं  एक लक्ष्य से ही जुड़ी रहती तो भी हम शायद लक्ष्य की गहराई तक पहुंच जाते । लेकिन मन तो थोड़ी खुदाई से ही पानी पा लेना चाहता है और हर दस कदम पर कुआं खोदने लगता है। दस गढडों ही बिखरी मेहनत को एक ही स्थान पर प्रयोग मे लाता तो सौ पाने के चक्कर में निन्यानब्बे को नही खोता रहता ।
भौतिक चकाचोंध एवं आपाधापी के इस युग मे कुछेक व्यक्तियों का भी थोड़ा सा मानसिक असंतुलन बहुत बड़े अनिष्ट का निमित्त बन सकता है। इसलिए महाबीर हमें स्वयं से , अपने मन से लड़ने की प्रेरणा देते है । वह कहते है ,’बाहरी दुश्मन से क्या लड़ना ,स्वयं से लड़ो। एक बार जिसने अपने मन को जीत लिया फिर उसे काहेका भय, काहे की चिंता । उसे न सुख के प्रति आशक्ति रहती है ,न दुखों का डर । वह अपने -पराए से उपर उठकर सोचता है। जिसने इन अवगुणों से निजात पा ली वह जो चाहता है पाता है।
यदि कुछ पाने की इच्छा है तो कुछ का त्याग करो । त्याग से जो प्राप्त होगा वह स्थिर होगा । यदि चाह सब कुछ पाने की है तो सब कुछ त्यागना भी पड़ेगा । महावीर की तरह सब कुछ ऐसा मिलेगा जिसकी कल्पना भी नहीं की होगी ,बशतें त्याग मन से हो । यदि मन के कोने में हल्की सी भी चाह रह गई त�