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दमी डीठम नद वहवनी, दमी डयूठुम सुम नत तार। दमी डीठम थर फवलवनी, दमी डीयूठुम गुल नत खार।। Now I saw a river flowing, Now neither a bridge nor a ferry. Now I saw a plant in full bloom, now neither a flower nor a thron to be seen.

भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जय: | अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च || 8|| आप द्रोणाचार्य और पितामह भीष्म तथा कर्ण और संग्राम विजयी कृपाचार्य तथा वैसे ही अश्र्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा।। ८।। There are personalities like yourself, Bheeshma, Karna, Kripa, Ashwatthama, Vikarn, and Bhurishrava, who are ever victorious in battle. (8)  श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय पहला श्लोक.।।८।।

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Dusro ke help दुसरों की सेवा से आंतरिक विचार शक्ति जागती है



दुसरों की सेवा से आंतरिक विचार शक्ति जागती है
विकेश कुमार बडोला
विचारों और मतों की भिन्नता मनुष्यों को अशांत किए हुए है। ऐसी अशांति से मुक्त होकर ही मनुष्य की आत्मा जागेगी । आत्मा का जागरण ही मानवता की भावना का सृजन करता है। इसी से मनुष्य मानवता के मार्ग पर प्रशस्त होता है । जीवन जगत में प्रत्येक घटना के प्रति संवेदना की हलचल मनुष्य में निरन्तर होनी चाहिए। संवेदनामयी हलचल मनुष्य को धैर्यवान बनाती है । जीवन की सभी प्राकृतिक ,सामाजिक , वैज्ञानिक और राजनीतिक घटनाओं पर पर संवेदनशील होकर विचार करने की अंतर्दृष्टि हममें स्वयं जाग्रत होनी चाहिए ।
आज मनुष्य का जीवन संवेदनशील ,अनुदार और दुराचार से भरा है । मानव अहंकार की जकड़ में है। यह दुर्गुण ममता , मोह ,माया ,लोभ और सामान्य मानवीय बुराइयों से भी अधिक पीड़ादायी है। इनसे जीवन की अद्धुत नैसर्गिक शाक्तियां खत्म हो रही है । संवेदना आधारित धीरज की अनुपस्थिति में मनुष्य निरंकुश बन रहा है। इससे ही धरती पर रक्तपात,वैमनस्य ,मतभेद ,क्रूरता और आसुरी विचार बढ़ रहै है। हालांकि ऐसा इस युग में पहली बार नहीं हो रहा है। हालांकि ऐसा इस युग में पहली बार नहीं हो रहा ।
प्रत्येक युग में ऐसी मानवघाती क्रियाएं- प्रतिक्रियाएं होती रहीं है । मानवीय जीवन का सर्वोत्तम ,शांतिप्रद और समृद्धिशाली लक्ष्य प्राप्त करने के लिए हमें यह सब नहीं होने देना चाहिए । चाहे कुछ भी हो जाएं ,कितनी भी प्रतिकूल परिस्थितियां हमें रोकें परतुं हमें सवेंदनशील होकर धैर्यवान बनने का अवसर नहीं गवानां है । घर - परिवार और देश- समाज में जितने भी मनुष्य हैं।उनकी आत्मिक , आंतरिक विचारशाक्ति को जगाने के लिए आज प्रवचन - सत्संग की उतनी आवाश्यकता नहीं जितनी शारिरीक व मानसिक रूग्णता से ग्रस्त मनुष्यों की सेवा - सुश्रूषा करने की है वैचारिक दिशाभ्रम से पीड़ित बच्चों ,नवयुवाओं को समुचित समुचित मार्ग दर्शन देने की जरूरत है ।
निःस्वार्थ मानव सेवा भावना और सेवा व्यवहार की शिक्षा बच्चों ,युवक -युवतियों को कैसे मिले इस पर ध्यान लगानें की आवाश्यकता है । फिलहाल इतना जरूर कहा जाता है । कि यदि समाज के संत महात्मा और आदर्श शिक्षकगण बच्चों को अपने जीवन से लगाव रखना सिखाएंगे तो निश्चित रूप में व्यापक परिवर्तन आयेगा  । सच पूछें तो इस युग को प्रगति के दुर्गुणों और बुराइयों से बचाने का सही एकमात्र उपाय है।अध्यात्म आत्मा -परमात्मा की शिक्षा पथभ्रष्ट लोगों को सीधे नहीं दी जा सकती । एकबार ऐसे लोग मानवीय सवेंदना जाग्रत करते हुए बड़े -बूढ़ों ,अस्वस्थ -निराश्रित और पीड़ित -उपेक्षित लोगों की सेवा करने लग जाएं तो उनमें अध्यात्म का बीजारोपण स्वयं होने लगेगा । उन्हें प्रकृति से असीमित लगाव हो जायगा। वे जीवन को सचमुच अद्धुत शाक्तियांें संवेदनाओं और सदव्यवहार से पोषित करने लगेगें ।
इसलिए हे मानव ! तू अभी से अपने प्राणवान होने की एकांत अनुभूति में रम । प्राणों की सुगंध ले। जीवन में सकारात्मक भाव में स्थिर हो । निराशा और हताशा से मुक्ति पा। प्रकृति के पक्ष को समक्ष । प्राकृतिक घटनाओं पर ध्यान लगा । ऐसा अनुभव ,ऐसा अनुभव ,ऐसा व्यवहार हमें कब बदल देगा यह जानकर हमें आश्चर्य होगा ,पर यह आनन्द दायक भी होगा । इस प्रकार जीवन में संवेदना का वास होने से हम परम धैर्य शाली बन जाएगें। हमारे अहंकर्ता भाव का समूल नाश हो जाएगा । जीवन की परम अदभुत शाक्तियां हमें भीतर- बाहर स्पर्श करने लगेंगी।