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दमी डीठम नद वहवनी, दमी डयूठुम सुम नत तार। दमी डीठम थर फवलवनी, दमी डीयूठुम गुल नत खार।। Now I saw a river flowing, Now neither a bridge nor a ferry. Now I saw a plant in full bloom, now neither a flower nor a thron to be seen.

भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जय: | अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च || 8|| आप द्रोणाचार्य और पितामह भीष्म तथा कर्ण और संग्राम विजयी कृपाचार्य तथा वैसे ही अश्र्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा।। ८।। There are personalities like yourself, Bheeshma, Karna, Kripa, Ashwatthama, Vikarn, and Bhurishrava, who are ever victorious in battle. (8)  श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय पहला श्लोक.।।८।।

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Bhagvan Chintan निरन्तर भगवन् चिन्तन



एक महात्मा थे। जीवन भर उन्होंने भजन ही किया था।
उनकी कुटिया के सामने एक तालाब था। जब उनका शरीर छूटने का समय आया तो देखा कि एक बगुला मछली मार रहा है।
उन्होंने उस बगुले को उड़ा दिया। इधर उनका शरीर छूटा तो नरक गये।
उनके चेले को स्वप्न में दिखायी पड़ा वे कह रहे थे बेटा  हमने जीवन भर कोई पाप नहीं किया केवल बगुला उड़ा देने मात्र से नरक जाना पड़ा। तुम सावधान रहना।
जब शिष्य का भी शरीर छूटने का समय आया तो वही दृश्य पुनः आया।
बगुला मछली पकड़ रहा था। गुरु का निर्देश मानकर उसने बगुले को नहीं उड़ाया।
मरने पर वह भी नरक जाने लगा तो गुरुभाई को आकाशवाणी मिली कि गुरुजी ने बगुला उड़ाया था इसलिए नरक गये।
हमने नहीं उड़ाया इसलिए नरक में जा रहे हैं। तुम बचना
गुरुभाई का शरीर छूटने का समय आया तो संयोग से पुनः बगुला मछली मारता दिखाई पड़ा।
गुरुभाई ने भगवान् को प्रणाम किया कि
भगवन्ण् आप ही मछली में हो और आप ही बगुले में भी। हमें नहीं मालूम कि क्या झूठ हैण् क्या सच हैण्
कौन पाप है कौन पुण्यण् आप अपनी व्यवस्था देखें। मुझे तो आपके चिन्तन की डोरी से प्रयोजन है।
वह शरीर छूटने पर प्रभु के धाम गया।
नारद जी ने भगवान से पूछा भगवन्  अन्ततः वे नरक क्यों गये  महात्मा जी ने बगुला उड़ाकर कोई पाप तो नहीं किया  
उन्होंने बताया नारद  उस दिन बगुले का भोजन वही था। उन्होंने उसे उड़ा दिया। भूख से छटपटाकर बगुला मर गया अतः पाप हुआ इसलिए नरक गये।

नारद ने पूछा दूसरे ने तो नहीं उड़ाया वह क्यों नरक गया  
बोले उस दिन बगुले का पेट भरा था। वह विनोदवश मछली पकड़ रहा था उसे उड़ा देना चाहिए था। शिष्य से भूल हुई इसी पाप से वह नरक गया।
नारद ने पूछा और तीसरा
भगवान् ने कहा तीसरा अपने भजन में लगा रह गया सारी जिम्मेदारी हमारे ऊपर सौंप दी।
जैसी होनी थी वह हुई किन्तु मुझसे सम्बन्ध जोड़े रह जाने के कारण मेरे ही चिन्तन के प्रभाव से वह मेरे धाम को प्राप्त हुआ।।
अतः पाप.पुण्य की चिन्ता में समय को न गँवाकर जो निरन्तर चिन्तन में लगा रहता है वह पा जाता है।
जितने समय हमारा मन भगवान् के नाम रुप लीला गुण धाम और उनके संतों में रहता है केवल उतने समय ही हम पापमुक्त रहते हैं।
भगवान् कृष्ण कहते हैं