कौन थी वह
जो रहती थी मेरे घर की
दीवार पर लटकते हुए आईना में
मैं रोज देखती उसे
कुछ जानी पहचानी सी
कुछ अनजानी सी
उसके अंदर का खाली अंश भी
मेरे भीतर था
टूटने के लिए खाली
शब्दों की क्या आवश्यकता है?
देखती थी मैं
आईने के उस पार
आस्था जितनी
अविश्वास भी उतना
फिर भी जो बोलना था
वह तो रह गया
आईने में वह ऐसी थी
जैसे डाक में न भेजें जाने वाली
कुवारी चिट्ठी
बिन पढ़े और बिन जाने
उसके अंदर का आर्तनाद
मेरे अनुभव की परिधी में
मन्थन कर रहा था
क्या कभी एक प्रतिबिंब
रोमांचित होता है?
फिर वह मेरे दुःख को
कैसे अनुभव करती है
मेरे शब्दों को कैसे छू लेती है।
ढूंढती रहती अपनी कविता में
मेरे भीतर की नीरवता को
कल जब मेरे पर्दे के पीछे से
एक नया सवेरा आएगा।
बहुत कुछ समझने के बीज को लेकर
उसके साथ मैं भी भोगूँगी
कुछ नये संपर्क के प्यास को
घुल जाएंगे कुछ दुःख
नमक की तरह
गाल में पड़े पानी के बिन्दु में
और मैं देखती रह गई
मेरे घर के दीवार पर
लटकते आईने में कौन थी वह,
क्या मैं थी
प्रख्यात ओडिया हिन्दी कवयित्री भुवनेश्वर उडिसा से।
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साभार: पारमिता षाडगी एवं जून 2021 कॉशुर समाचार