
फुटपाथ के रंग
फुटपाथ एक ऐसी जगह है जो चलना सिखाती है। एक चाय वाला चाय बेच देता है, गोलगप्पे वाला गप्पे मारकर गोलगप्पे बेच देता है, अखबार वाला तमाम खबरों को बिखेर कर रखता है और कोई न कोई खबर पढ़ ही लेता है। फुटपाथ, भागती दौड़ती दुनिया में शांत, जुदा-सा जैसे किसी की प्रतीक्षा कर रहा हो, जैसे कुछ सोच रहा हो, जैसे खुद में ही जीता हो। ये है फुटपाथ जिसपर बैठने वाला, चलने वाला जैसे कुछ करने चला हो। ऐसे ही कुछ यार चलने निकले तो मिल गया उन्हें भी फुटपाथ अरविंद भरद्वाज, दीपक कुमार शुक्ला, आराधना राय 'अरु" और मैं सुरभि सप्रू । हम मिले तो पहले ही थे पर इस बार कुछ ऐसे मिले कि शायद फिर कभी ऐसे न मिले। हम चार आम लेकर प्रभु का नाम जब अपने अपने घर की ओर प्रस्थान करने लगे तो मित्र दीपक की दृष्टि एक शांत फुटपाथ पर पड़ी जैसे वो फुटपाथ हमारी प्रतीक्षा कर रहा था। तो हो गए खड़े हम तीन भी, हम चार आम अपनी अपनी कलम के नाम से ही एक दूसरे के यार बन गए। अरविन्द ने दीपक की सबसे प्यारी रचना 'वंदे मातरम् सुनाने को कहा। दीपक को पता था अगर वो शुरू हुए तो पूरी रात फुटपाथ पर ही कट जाएगी क्यूकि हम सभी कहीं एक ही जीवन जीते हैं और वो जीवन है कलम का वो जीवन है शब्दों का बहुत बार कहने पर दीपक शुरू हो ही गए और इस जानदार रचना ने सबको अंदर से जगा सा दिया। ऐसा लगा जैसे फुटपाथ भी हमसे गले लग गया हो। फिर क्या था आराधना जी के शेर शुरू हुए तो वाह वाह के गलीचे बिछ गए, उनकी लेखनी का जवाब नहीं। अरविन्द की प्यारी गजल ने जैसे चांदनी रात को समेट लिया हो और मेरी रचनाओं का भी मित्रों ने भरपूर आनंद लिया... और देखते देखते समय बीतता गया और हमारी एक पर एक रचनाएं आती गई। कितना अद्भुत पल था ये जहा कविताए, गजल, शेर-ओ-शायरी के इतने रंग जमे कि आज वो शांत फुटपाथ भी कभी कभी हस देता है, ऐसा लगता है जैसे वो हर शाम हमें पुकारता है, ऐसा लगता है जैसे आज वो सड़क को गुरूर से घूरता है कहता है सड़क से देख मेरे पास भी कोई चला आता है। 19 अक्तूबर की ये सुनहरी मतवाली शाम में कवियों की इस उत्तेजना से भी टोली ने ये तो साबित कर ही दिया किः
न हो अगर मंच तो गम नहीं
हम किसी से कम नहीं
इनाम न हो न हो नाम कहीं
हम जीते हैं फिर भी, शान से यहीं...
कलाकार वही है जो कला को जीता है... जो भीतर को सीता है. मैं अपने सभी कवि मित्रों को साधुवाद देती हूं. आशा है सबकी कमल यूं ही चलती रहे और ऐसे अनेक रंग जमते रहे।
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साभार:- सुरभि सप्रू एंव कोशुर समाचार 2016, फरवरी,