
नारी का व्यावहारिक परिवेश
नारी विधाता की सर्वोत्तम सृष्टि है। नारी की सीरत और सूरत की पराकाष्टा और उसकी महानता को मापना दुष्कर ही नहीं अपितु संभव से परे है। सामाजिक, साहित्यिक, राजनैतिक, ऐतिहासिक, धार्मिक जगत में नारी के विविध स्वरूपों का न केवल बाहम्य अपितु अंतर्मन के गूढ़तम भाव एवं सौंदर्यात्मक स्वरूप का भीरहस्यात्मक उद्घाटन हुआ है। नारी प्रकृति एवं ईश्वर द्वारा प्रदत्त अद्भुत पवित्र साध्य है जिसे महसूस करने के लिए पवित्र साधन का होना आवश्यक है। इसकी न तो कोई सरहद है और न ही कोई छोर यह तो एक विराट स्वरूप है जिसके आगे स्वयं विधाता (कृष्ण) भी नारी द्रोपदी के सामने नतमस्तक होते हैं। नारी सोंधी मिट्टी की महक है जो जीवन बगिया को महकाती है न केवल राष्ट्र निर्माण एवं विकास में अपनी महती भूमिका निभाती है। नारी के लिए यदि कहा जाए कि यह विविधता में एकता है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी, क्योंकि महिलाए किसी विविध स्थान की हो, किसी जाति की हो, रंग रूप की हो, लेकिन उनका व्यावहारिक रूप एक जैसा होता है। पश्चिमी देशों की बात कुछ अलग हो सकती है पर सकल भारत भूमि के लिए यह एक यथार्थ है। प्रत्येक नारी में विश्वास, प्रेम, करुणा, त्याग, निष्ठा, बलिदान, शालीनता, समर्पण, दया, कुशलता, मर्यादा, शीतलता धैर्य, संयम एवं सहनशीलता, कर्तव्य परायणता समता, ममता, समता, सृजनशीलता सहिष्णुता इत्यादि सबमें विद्यमान रहती हैं। सबकी मां बाप के प्रति हमदर्दी होती है। वह उनके कंधों पर भारी बोझ का एहसास रखती हैं। घर के कमाने वालों के लिए नारी पुत्री के रूप में बहुत सहगुण होता है। वह पग पग पर घर-गृहस्थी की भट्ठी में झुलसने वाले सदस्यों के हेतु स्नेह का भार रखते हुए उनकी हर परवाह करती है। घर परिवार की समस्या उसको निजी समस्या लगती है। यह जानते हुए भी कि मैंने इस परिवार में सारी उम्र नहीं बितानी है। शादी के पश्चात पराये पुरुष को अपना तन मन धन समर्पित करत है। उसके परिवार की सेवा करना अपना कर्तव्य एव धर्म समझती है। नई धारणाओं को अपना मानकर उन पर अपना समस्त अस्तित्व समर्पित करती हैं। ससुराल की मान मर्यादा का मान रखती हैं पर हर काल में नारी की स्थिति परिवर्तन के पंजों में दुबक कर रह गई पर नारी का व्यवहारिक परिवेश कभी भी मूल से नष्ट नहीं हुआ विशेषकर अपने बच्चों एवं अपने परिवार के प्रति वह मा के रूप में सदा मा बनी रही, पत्नी के रूप में पत्नी बनकर जीती रही।
प्राचीनकाल में महिला को देवी का दर्जा देने के बाद भी उसका दर्जा पुरुष प्रधान समाज में दासी जैसा ही रहा। सैद्धांतिक रूप से भले ही महिला को समाज में ऊंचा स्थान दिया जाता था पर व्यवहारिक दृष्टि से देखा जाए तो यह मात्र औपचारिकता से ज्यादा नहीं था। महिलाओं को पुरुष जैसे काम करने की मनाही थी। उसकी राय किसी भी काम को करने से पहले लेना अनिवार्य नहीं था। पहले लड़की मां बाप के दबाव में रहती थी फिर पति और ससुराल के पदचिन्हों पर उसे चलना होता था पर तब भी नारी का व्यवहार मर्यादाओं के घेरे से बाहर बहुत कम निकला। मुगल सम्राज्य में नारी जगत की हालत अधिक ही बिगड़ती गई। परदे की प्रथा आरंभ हुई सती प्रथा ने जोर पकड़ा। ऐतिहासिक पतन विशेषकर नारी का मनोरमृति के बाद हुआ इस्लामी और ईसाई आगमन से नारियों से उनके अधिकार छिनते चले गए। बाल विवाह, सती प्रथा विधवाओं के दूसरे विवाह पर रोक, परदे की जबरदस्ती राजस्थान के राजपूत समाज द्वारा गौहर जैसे रिवाज का अनुगमन हुआ। देवदासियों का रिवाज का प्रचलन हुआ। नारियों का यौन पीडन प्रभावशाली और अमीर व्यक्तियों द्वारा होने लगा जिससे नारी के व्यवहारिक परिवेष को सशक्त धक्का लगा। पर स्वतंत्रता आदोलन से महात्मा गांधी द्वारा नारी जाति को एक ऐसी ललकार मिली कि वह अपनी चिरस्थाई पराधीनता के बंधन को तोड़कर घर की चारदीवारी से बाहर आई। वह काम जिसे वह व्यावहारिक जगत में व्यवहार में लाना असंभव समझती थी वह कार्य महिला करने लगी। इस क्षेत्र में उसे कस्तूरबा कमला नेहरू, विजयलक्ष्मी पंडित, अरुणा आसिफ अली सरोजनी नायडू एनीवेसेट राजकुमारी अमृतकौर आदि नारियों ने प्रेरणा दी। व्यवहारिक जगत में नारियों ने वह काम करना आरंभ किया जो काम करके पुरुष आनंद लेते थे। नारियों ने अपना आत्मविश्वास बटोरा। वह अपने परिवार के कार्य को संभालने के अलावा देश के भविष्य को उज्जवल बनाने का कार्य करने लगीं।
भारत में आधी जनसंख्या का प्रतिनिधित्व नारिया करती हैं। इसका अर्थ है देश की उन्नति का आधा दारोमदार नारियों पर है। आज व्यवहारिक क्षेत्र में महिलाएं एक सफल समाज सुधारक उद्यमी प्रशासनिक सेवक राजनयिक युद्धवीर कर्मवीरों का कार्य कर रही है। आज के इस प्रतिस्पर्धात्मक युग में तारिनी जैसे नारिया अपने अधिकारों के प्रति पहले से अधिक सचेत हैं। अपने व्यवहारिक पक्ष में अधिक जागरूक हैं। वह अपनी दिनचर्या को अपनी व्यावहारिक सोच समझ से योग्यतापूर्वक पूर्ण करती हैं। खर्चों को व्यवस्थित तौर पर चलाती हैं। संस्कारों को जीवत रखती है सामाजिक रिश्तों एवं संबंधों को कायम रखती हैं जिनमें पुरुषों की कोई रुचि नहीं होती। जीवन में रिश्तेदारों, पड़ोसियों, मित्रों और अन्य संबंधों की डोर नारी की समाल में रहती है। यदि ऐसा नहीं तो समस्त रिश्ते नाते ध्वस्त हो जाएंगे। नारी रिश्ते नाते जोड़कर रखने में एक सूत्र का काम करती है। आधुनिक नारी पी टी उषा महादेवी वर्मा सुचेता कृपलानी अमृता प्रीतम राजकुमारी अमृत कौर पदमजा नायडू, कल्पना चावला, मदर टेरेसा सुभद्रकुमारी चौहान प्रतिनिधित्व करती हैं। आज की नारी बेटी, मां पत्नी और सामाजिक, राजनैतिक, साहित्यिक, आर्थिक, शैक्षणिक वैज्ञानिक आदि विभागों में सेवाए दे रही है। व्यवहारिक क्षेत्र में नारियों को जागृति हुई, महिलाओं पर जबरदस्ती, बलात्कार, दहेज के लिए नारियों में भी अब इस बात का एहसास पैदा हो गया है यदि उनको परिवार में अन्याय और अपशब्दों का सामना करना पड़े तो वह उसके प्रति विरोध करने में पीछे नहीं रहती। घरेलू हिंसा, मारपीट, यौन शोषण का शिकार बनना, अब पिछड़ी जाति की नारियों को भी स्वीकार नहीं। वह मेहनत मजदूरी करके सरकार के दिए मदद लेकर अने बच्चों को पढ़ाती लिखाती है और अपने व्यवहार से लड़की के जन्म पर किसी पारिवारिक सदस्य को मौखिक रूप से मानसिक सोट लगाने का मौका नहीं देती। महिलाएं अब व्यवहारिक पक्ष में इन सब बातों के प्रति जागझक हो गई हैं। निर्भया केस में और अन्य हिंसा के मामले में अब नारियां ही नहीं पुरुष भी सड़क पर आते हैं। यह इस बात की पुष्टि करता है कि नारी व्यवहारिक क्षेत्र में काफी हद तक जागरूक हो चुकी है। मुसलमान औरतों की तीन तलाक के अन्याय से छूट भी नारी की व्यवहारिक जागरूकता का एक प्रबल प्रमाण हैं। नारी की व्यवहारिक पक्ष के बिना घर परिवार एवं समाज की दशा बिना इंजन वाली गाड़ी जैसी होती हैं। नारी शक्ति की अगुवाई न निर्देशन में ब्रह्मा विष्णु महेश की उत्पत्ति हुई है। नारी शक्ति की देखरेख में ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की। नारी व्यवहार को सृष्टि का मूल कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं घनी की व्यवहारिकता के बिना घर भूत का डेरा लगता है। घर अस्त-व्यस्त हो तो घर में आने वाला पहली बात पूछता है, क्या बात है मम्मी घर पर नहीं हैं और जिस घर में नारी शक्ति का सम्मान होता है उसमें लक्ष्मी का वास होता है। नारी की व्यावहारिक सूझबूझ पर घर परिवार की नींव, शान और शोभा निर्भर होती है। यदि सच जानने का प्रत्यक्ष प्रमाण चाहिए तो यह है कि स्वतंत्रता आंदोलन के साी ही व्यावहारिक पक्ष में नारी पूर्ण रूप से जागृत हुई। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने नारियों का आह्वान किया कि वह स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लें। सरोजनी नायडू विजय लक्ष्मी पंडित अरुणा आसफ अली डा. एनिबेसट इंदिरा गांधी, कमला नेहरू, महादेवी वर्मा, सुजाता कृपलानी, अमृता प्रीतम, पदमजा नायडू राज कुमारी अमृत कौर, मदर टेरेसा जैसी असंख्य नारियों से प्रेरित होकर भारत की प्रत्येक नारी को मन ही मन एक बदलाव आया. उसकी मानसिक दास्ता बंधनों को तोड़ कर स्वतंत्रता संग्राम प्रत्येक में भागीदार बनी और वह प्रति एक पक्ष में अपने बंद पंखों को खोल बैठी। समय वह भी आ गया कि नारी लोकतंत्र और मतदान संबंधी कार्यों को चलाने लगी। प्रशासनिक व्यवस्था की माति वह व्यवहारिक परिवेश में स्वतंत्र रूप से कार्यरत हुई। उसने अपनी दुर्बलताओं पर विजय पाई। वह सशक्त होकर जीवनयापन एवं देश निर्माण में भागीदार बनी। हम यह भी नहीं कह सकते कि वह पूर्ण रूप से पुरुष प्रधान समाज के शोषण से मुक्त हुई पर स्वतंत्रता के पहले जैसे अन्याय से काफी हद तक मुक्त हुई। संक्षेप में-
मरते को जीवन देती अपने व्यवहार से नारी महाकाल को मात देती अपने व्यवहार से नारी फटे हुए परिवार को जोड़ती अपने व्यवहार से नारी,
टूटे रिश्तों को बांध देती अपने व्यवहार से नारी, घर को स्वर्ग बनाती है अपने व्यवहार से नारी हाय को न्याय में बदलती अपने व्यवहार से नारी,
सबको सब कुछ दिलवाती अपने व्यवहार से नारी।
अस्वीकरण :
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साभार:- राजदुलारी कौल, पठानकोट एंव कॉशुर समाचार 2018, नवम्बर