.jpg)
लेखक का लिखा अकारथ नहीं जाता कश्मीरी कथाकार बंसी निर्दोष
कश्मीरी कहानी-लेखन का जीवन इतिहास लगभग 80 वर्ष पुराना है। अपनी विकास-यात्रा के दौरान कश्मीरी कहानी ने कई मंजिलें तय कीं। जिन शलाका पुरुषों के हाथों कश्मीरी की यह लोकप्रिय विधा समुन्नत हुई, उनमें स्वर्गीय बंसी निर्दोष का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता है। निर्दोष की कथा-रचनाएं कश्मीरी जीवन और संस्कृति का दस्तावेज हैं। इनमें मध्य्वार्गीय समाज की हसरतों और लाचारियों का परिवेश की प्रमाणिकता को केन्द्र में रखकर, जो सजीव वर्णन मिलता है, वह अन्यतम है। कश्मीरी परिवेश को ताजगी और जीवंतता के साथ रूपायित करने में निर्दोष कीक्षमताएं स्पृहणीय हैं। अपने परिवेश का वर्णन करनेमें निर्दोष की क्षमताएँ स्पृहणीय हैं। इसी से इन्हें'कश्मीरियत का कुशल चितेरा' भी कहा जाता है।बंसी निर्दोष मेरे चहेते कहानीकार रहे हैं। जब कश्मीर में अमन चैन था तो मैं उनसे उनके निवासस्थान पर उनसे अक्सर कई बार मिलता। विस्थापनके बाद वे कुछ दिनों के लिए जम्मू / गुड़गाँव आकर रहने लगे थे। तब वे मेरे पास अलवर भी मुझसे मिलनेआये थे। बोलते थोडा थे, मगर जितना भी बोलते थेउसके आधार पर दिल में समा जाते थे। उनकी बुलंदऔर सुलझी आवाज भूले से नहीं भूलती। अपनी अनवरत साहित्य साधना, लगन और निष्ठा से निर्दोष ने कश्मीरी कहानी को नये आयाम देकर न केवल समुन्नत किया,अपितु अन्य भारतीयभाषाओं में रचित कथा-साहित्य के समक्ष लाकर उसे खड़ा भी किया। 1990 के आसपास कश्मीर घाटी से पंडितों हिन्दुओं के विस्थापन की त्रासद गाथा सर्वविदितहै। लाखों पंडित बेघर हुए और अपने ही देश मेंशरणर्थी बन गए। इन में बच्चे, बूढ़े, अमीर, गरीबआदि सब शामिल थे। सरकारी कर्मचारी भी दुकानदार भी, खेतीहर मजदूर भी और लेखकसंस्कृति कर्मी भी। इन्हीं लेखकों की श्रेण्य परम्परा में कश्मीर के सुविख्यात कथाकार स्वर्गीय बंसी निर्दोष को कौन भूल सकता है? अपनी मातृभूमि से जलावतन तो हुए मगर विषम परिस्थितियों के बावजूद अंत समय तक साहित्यसृजन करते रहे और बाद में वतन की याद को सीने में संजोये 21 अगस्त 2001 को जम्मू में इनका स्वर्गवास हुआ। बहुत दिनों से निर्दोषजी की बहुचर्चित / क्लासिक कहानियों का एक पेपरबैक संस्करण प्रकाशित कराने की इच्छा मन में थी। दिल्ली के राजकमल प्रकाशन का आभारी हूँ कि उन्होंने मेरे इस प्रकाशन-प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार किया। यहाँ पर निर्दोष के रचना- संसार तथा उनकी रचना प्रक्रिया पर प्रकाश डालने वाली उस महत्त्वपूर्ण बातचीत के कुछ अंश, जो दिसम्बर 91 में उनके अलवर आगमन पर इन पंक्तियों के लेखक ने ध्वनिबद्ध किए थे, उधृत करना अनुचित न होगा। 'बातचीत के इन अंशों से निर्दोष के सृजनात्मक व्यक्तित्व की वे सारी खूबियाँ और सम्भावनाएँ विश्वसनीय ढंग से बड़े ही सिलसिलेवार तरीके से उजागर होती हैं, जिन्हें हम कभी-कभी 'रचनाकार के सरोकार' की संज्ञा देते हैं ।
सवाल : निर्दोष साहब! आप कहानीकार ही क्यों बने? कहानी-लेखन की प्रेरणा आपने कहाँ से पाई?
निर्दोष: मेरे घर का माहौल अदबी था। मेरी दादी माँ को कश्मीरी लोक कथाएँ खूब याद थीं और वह बचपन में मुझे हर रोज एक नई कहानी सुनाया करती थीं। इससे कहानी सुनने और कहानी कहने के प्रति मेरी रुचि जागी । यों मेरे पिताजी 'तीरथ काश्मीरी भी कश्मीरी के अच्छे लेखक थे। हिन्दी, उर्दू और कश्मीरी में वे समान रूप से लिखते थे। लाहौर में उन दिनों प्रकाशित होने वाले मस्ताना जोगी, बहारे-कश्मीर, गुरु घंटाल, तेज आदि समाचार-पत्रों में उनकी रचनाएँ छपती रहती थीं। इन रचनाओं को देख पढ़कर बचपन से ही मेरा कहानियों की तरफ रुझान हो गया। सुप्रसिद्ध कश्मीरी शायर दीनानाथ नादिम और कहानीकार प्रेमनाथ परदेसी मेरे पिताजी के मित्र थे। इनके अलावा मरकज निसारी, सोमनाथ जुत्शी, महेन्द्र रैना, फिराक कश्मीरी आदि साहित्यकार भी हमारे घर आते-जाते रहते थे। पिताजी के साथ साहित्यिक चर्चाओं के दौरान मुझे इन सभी साहित्यकारों को करीब से देखने सुनने का भी अवसर मिल जाता था
सवाल : क्या लेखन-कर्म के लिए आप बाह्यप्रेरणा को ही पर्याप्त मानते हैं?
निर्दोष: जहाँ तक लेखन कर्म का सम्बन्ध है, इसके लिए खुद आदमी के अन्दर पढ़ने -लिखने की रुचि और अन्तःस्फूर्त प्रेरणा शक्ति विद्यमान होनी चाहिए। मैं समझता हूँ कि यह भगवान की एक नियामत है। बाहरी चीजें तो सिर्फ उसका हौसला बढ़ाती हैं, उसकी चेतना का विकास करती हैं। यह उसके अंदर का माद्दा है, जो उसे रचना कर्म करने की सामर्थ्य देता है।
सवाल : अन्दर के माहे से आपका क्या आशय है?
निर्दोष: हम अच्छा डॉक्टर, इन्जीनियर, उस्ताद आदि बना सकते हैं, पर हम अच्छा शायर नहीं बना सकते। यह एक ऐसी खुदाई नियामत है, जो यूनिवर्सिटी की बड़ी से बड़ी डिग्रियाँ पाकर भी प्राप्त नहीं हो सकतीं। मैं 1947 के पूर्ववर्ती कश्मीरी शायरों की रचनाएँ पढ़कर हैरान रह जाता हूँ कि उन तक ये बातें कैसे आ गई थीं, हालांकि वे अनपढ़ थे, किसी मदरसे में नहीं गए थे। देखिए, कबीर भी कोई पढ़े-लिखे नहीं थे, मगर शायरी की दुनिया में उनका नाम है। दरअसल, जिन्दगी उनके लिए एक मदरसा थी जहाँ उन्होंने जिन्दगी की हकीकतों को सीख लिया था। हाँ, शेर कहने का तरीका या गुर उनका अपना था।
सवाल: यह गुर क्या परिवेश से नहीं सीखा जा सकता?
निर्दोष: हमारे यहाँ डॉक्टर्स की कमी नहीं है। पर ऐसे डॉक्टर कम हैं जो ह्यूमन साइकोलॉजी को भी अपनी डॉक्टरी में इस्तेमाल करते हैं तथा किताबी ज्ञान से अलग हटकर जो मरीज का स्टेटस और उसको जिन्दगी के वातावरण को ध्यान में रखकर बीमारी का उपचार करते हैं। इस विधि से डॉक्टर मरीज के अन्दर झाँककर उसके मर्ज को समझ पाने में कामयाब हो जाता है। किसी भी रचनाकार की मौलिकता या गुर का सवाल भी ऐसा ही है।
सवाल : तो क्या यह मान लें कि हर साहित्यकार सायकोलॉजी का डॉक्टर होता है?
निर्दोष: नहीं, यह बात नहीं है। यूं तो फूल, पत्ते, डालियाँ, नदी, झील, किनारे आदि सब लोग देखते हैं, लेकिन हरेक उनसे मुतासिर नहीं होता। (अपनी बात की पुष्टि के लिए मिसाल देते हैं) जिस रेलगाड़ी से मैं अलवर आया हूँ, उसमें एक बंजारा दम्पति व उनका बच्चा भी सफर कर रहे थे। हालांकि सीटें खाली थीं, पर संकोचवश वे सीटों के बीच वाली खाली जगह पर बैठे हुए थे। किसी भी यात्री ने उनसे नहीं कहा कि वे आएँ और खाली पड़ी सीटों पर बैठ जाएं। तब मुझे अजीब किस्म की तड़प महसूस हुई कि क्यों वो लोग इस तरह बैठे हैं? अन्य यात्रियों की तरह उनमें अधिकारपूर्वक इन सीटों पर बैठने की तमन्ना क्यों खत्म हो गई है? वे संभवतः इन्फेरिओरिटी कॉम्पलैक्स के ऐसे शिकार थे कि मेरे कहने पर भी सीटों पर आकर नहीं बैठे। बेचारे मैले कुचले से कपड़े पहने वे बंजारा-बंजारिन मेरे कई बार कहने के बाद ही सहमते-झिझकते से सीटों पर आकर बैठे। अब मुझे बताइए कि गाड़ी में बैठे अन्य यात्री भी तो मेरी ही तरह इन्सान थे, पर मैं ही क्यों द्रवीभूत हुआ? मैं तब तक बेचैनी से तड़पता रहा, जब तक वे बेचारे मेरे पास वाली सीट पर आकर बैठ नहीं गए।
सवाल : क्या साहित्यकार का सम्बन्ध इस तड़प से होता ह
निर्दोष: बिल्कुल ! बिल्कुल !! क्रौंच वध का दृश्य देखकर आदि कवि वाल्मीकि का मन भी तो इसी तरह तड़प उठा था, करुणा से द्रवित हो गया था। तभी रामायण जैसे महाकाव्य की रचना करना उनके लिए सम्भव हो सका।
सवाल : कश्मीर में जो इस वक्त लिखा जा रहा है, उसका कंटेन्ट क्या है?
निर्दोष: एक शायर, अदीब या साहित्यकार अपने समाज में जैसा कुछ घटित होते देखता है, वह वैसा ही लिख देता है। सद्यः प्रकाशित कुछ कश्मीरी रचनाएँ मैंने पढ़ी व सुनी हैं, जिन्हें सुनकर आदमी तड़प उठता है। अपनी जाति, समाज और संस्कृति के संकट को लेखक ने जिस शिद्दत के साथ अभिव्यक्त किया है, उससे पाठक का दिल दहल जाता है। पर उसके अपने छोटे-छोटे डर हैं, जिनकी वजह से वह अपने आपको प्रकट नहीं कर रहा है। वह समझ गया है कि हुकूमत या माहौल के बारे में लब कुशाई (मुँह खोलना) खतरे से खाली नहीं है।
सवाल : यदि कश्मीर में फिर से अमन चैन कायम हो जाए, तो बाद में वहाँ शान्ति, सद्भाव व सौहार्दपूर्ण माहौल तैयार करने में एक साहित्यकार क्या सार्थक भूमिका अदा कर सकता है?
निर्दोष: कश्मीर में फिलहाल जो हालात हैं, उनमें साहित्यकार अभी कोई अपनी उल्लेखनीय भूमिका अदा नहीं कर सकता। पर शान्ति-सद्भाव का माहौल बनाने की दिशा में उसके योगदान की खूब जरूरत है। साहित्यकार का काम ही यही है कि जहाँ पर अत्याचार, अन्याय और आतंक है, जहाँ आदमी तड़प रहा है कुदरती तौर पर वहाँ उसकी संवेदना उसके साथ जुड़ जाती है। उसका लिखा अकारथ नहीं जाता।
डिस्क्लेमर:
ऊपर दिए गए आर्टिकल में बताए गए विचार लेखक के अपने विचार हैं और kashmiribhatta.in किसी भी तरह से ऊपर दिए गए आर्टिकल में बताए गए विचारों के लिए ज़िम्मेदार नहीं है। आर्टिकल उसके मालिक या मालिकों का है और यह साइट इस पर कोई अधिकार नहीं रखती है। कॉपीराइट एक्ट 1976 के सेक्शन 107 के तहत कॉपीराइट डिस्क्लेमर, आलोचना, कमेंट, न्यूज़ रिपोर्टिंग, टीचिंग, स्कॉलरशिप, एजुकेशन और रिसर्च जैसे मकसदों के लिए "फेयर यूज़" की इजाज़त देता है। फेयर यूज़ कॉपीराइट कानून द्वारा इजाज़त दिया गया ऐसा इस्तेमाल है जो वरना उल्लंघन कर सकता है।
साभारः डॉ. शिबन कृष्ण रैणा "कोशुर समाचार" - 2025, मई