आखरी पैगाम
निखिल भान
कुरबान कर चुका हूँ खुद को
घर पहुंचा दो कोई आखरी पैगाम मेरा,
वतन परस्तों की बस्ती में
मा सर्वस्व त्याग कर चुका बेटा तेरा,
फिक्र न कर तू मेरी
मैं लौटके भी आऊगा.
मातृभूमि के लिए खुद को,
न्यौछावर कर जाऊगा,
बस हमवतनों से है गुजारिश,
व्यर्थ न होने देना
मेरे बलिदान को
खुदगर्जी में रहके अपनी,
आहत न करना
देश के सम्मान को
कुछ होगा नहीं
सीमित करके आक्रोश को
शब्दों के दाव पर,
होना एकजुट पड़ेगा तुम्हें
मरहम लगाने अब
मेरे नासूर घाव पर,
कसम तुम्हें,
शहीदों में
तब तक लिखना नाम नहीं.
जब तक मेरी मृत्यु का
मिले न इतकाम सही,
समय सही अभी है
प्रतिक्रिया का2
और कुछ न बात हो,
जवाब दो उन्हें ऐसा,
फिर ऐसे हमारे साथ ना
अपघात हो,
प्रतिशोध की है बारी,
मत अभी आखों में आसू भरो,
क्षति निरतर पहुचाओ उन्हें,
ऐसा पलटवार करो,
उठाओ कठोर कदम,
विश्व चाहे जो कहे,
प्रलय मचा दो ऐसा,
आने वाली पीढ़ियों को दास्तान यही,
अस्तित्व राक्षसों का न रहे,
फिर सुना देना
बदला हमने भूगोल था ऐसे,
जिसमें पाकिस्तान है नहीं।।
जय हिन्द।
अस्वीकरण:
उपरोक्त लेख में व्यक्त विचार अभिजीत चक्रवर्ती के व्यक्तिगत विचार हैं और कश्मीरीभट्टा .इन उपरोक्त लेख में व्यक्तविचारों के लिए जिम्मेदार नहीं है।
साभार:- निखिल भान एंव मार्च 2019, कॉशुर समाचार