चार क़दम सूरज की ओर

चार क़दम सूरज की ओर


चार क़दम सूरज की ओर

अशोक धर

चार क़दम सूरज की ओर,

कब बढ़ेगा, कम से कम,

निकाले गए, चार नहीं, छ: कदम,

एक क़दम कश्मीर की ओर,

तपती आग की ओर,

हमसे पूछो, हमसे जानो,

हम पर ही चला, सूरज का जोर,

वह बर्फ, वह महल, वह केसर के खेत, छूट गए,

फटे टेंट, ऊंची रेंट, सुलगती रेत, देख लिए,

देश में, परदेसी बन के रह गए,

वह कभी नहीं आया, हमसे कभी नहीं पूछा,

बेहाल, वह हमारे हाल से,

आंखे मूंद ली, पाकिस्तान की चाल से,

कहां है, मां का वह स्वर्ण मुकुट,

जहां जलते हैं दरगाह और मंदिर,

हो रहे हैं नंगे पर्वत,

पर गोद में खेलने वाले,

चल रहे हैं सूरज की ओर

रोज देखते हैं टी.वी. पर,

उनके क़दम हवा में, नहीं पृथ्वी पर,

आंखें हैं पर नज़र नहीं,

नहीं मोतिया बिंद, होता इलाज फ्री,

बना शुतुरमुर्ग, चला सूरज की ओर

काश बढ़ता कम से कम,

एक सही कदम कश्मीर की ओर।

अस्वीकरण:

उपरोक्त लेख में व्यक्त विचार अभिजीत चक्रवर्ती के व्यक्तिगत विचार हैं और कश्मीरीभट्टा.इन उपरोक्त लेख में व्यक्त विचारों के लिए जिम्मेदार नहीं है।

साभार:- अशोक धर एवं मार्च 1996 कोशुर समाचार