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ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम्। विश्वस्य एक परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वा अमृता भवन्ति ॥ 7 ॥            You are the Supreme Brahman, infinite, yet hidden in the hearts of all creatures. You pervade everything. They, who know You, are free from the cycle of birth, death and rebirth. (Svetasvatara 3 : 7)            परमात्मा सब प्रकार से सब काल में मुक्त और शुद्ध है। वह अपरिमित और अनन्त होते हुए भी सभी प्राणियों के हृदय में छिपा हुआ है। परमात्मा को जानने वाले व्यक्ति ही जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।

ज़्येठॖ (ज्येष्ठ) ज़ूनॖ पछॖ (शुक्ल पक्ष) च़ोरम (चतुर्थी) बॊम्वार (मंगलवार),श्री सप्तर्षि सम्वत 5096, Today isJyesth Maas Shukla Paksh Chaturthiyaam Mangalvaasra sanayitaam. Kashmiri Pandit Nirvasan Samvat_31 Sapthrishi Samvat _5096
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हेल्दी तन-मन के पंचकर्म
आयुर्वेद में तन-मन को दुरूस्त रखने के लिए कई उपाय बताए गये हैं।
इनमे से पंचकर्म काफी अहम है। पंचकर्म के उपयोग से कैसे तन- मन की परेशानियों को काफी हद तक कम कर सकते हैं। पूरी जानकारी दे रहैं हैं हम आपको ।
1. आयुर्वेद कहता है कि मौसम ,रोगी और रोग के अनुसार मरीज का इलाज करना चाहिए । जब शरीर के दूषित पदार्थ स्नेहन और स्वेदन के द्वारा अमाशय में इकट्ठा हो जाते हैं तो उन्है बाहर निकालने के लिए वमन का साहारा लिया जाता है। वमन यानी उल्टी कराकर मुंह से दोषों को निकालना वमन कहलाता है । वमन को कफ से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए मुफीद बताया जाता है । स्नेहन व स्वेदन क्रिया द्वारा कफ प्रधान रोगो में जो कफ अपने स्थान से हटा दिया जाता है उसे ठीक तरह से शरीर के बाहर निकाल देना भी जरूरी है। अगर ऐसा नहीं किया जाता तो अशंका रहती है कि विरेचन औषधि देने से कफ आंतो में चिपक कर पेट के रोग पैदा कर सकता है। अमूमन वसंत ऋतु में वमन विधि से इलाज किया जाता है।
वमन विधि से उपचार:
खांसी ,दमा ,सीओपीडी,प्रमेह,डायबीटीज ,एनीमीया,पीलीया ,मुंह से जुड़े लोग ,ट्यूमर आदि।
कौन न कराए उपचार:- गर्भवती  स़़्त्री ,  कोमल प्रकृति वाले लोग ,शारीरिक रूप से बेहद कमजोर इंसान या जिन्है वैद्य ने इसके लिए मनाही की है ।
2. विरेचन
गुदामार्ग से दोषो को निकालना विरेचन कहलाता है ।विरेचन से अमाशय, हार्ट और लंग्स से दूषित पर्दाथ बाहर निकल जाता है।और शरीर मे शुद्ध रक्त का संचार होने लगता है। विरेचन को पित्त दोष की प्रधान चिकित्सा कहा जाता है।
किस प्रकार के रोगाो का इलाजः-
सिर र्दद, बवासीर, भंगदर ,गुल्म, रक्त पित्त आदि बीमारीयों में विरेचन पद्धति से इलाज कराना काफी फायदेमंद रहता है।
कौन न कराए इलाजः-
टीबी और एड्स जैसे रोगों से पीड़ीत व्यक्ति को विरेचन नही कराना चाहिए । ऐसे व्यक्ति को भी विरेचन नहीं कराना चाहिए । जो बुखार से पीड़ीत हो या रात भर जगा हो । वैसे किसी भी निर्णय पर पहुंचने से पहले यह जरूरी है कि वैद्य की सलाह ली जाए।
3.वस्ति
इस प्रकार में गुदामार्ग या मुत्रामार्ग  के द्वारा औषधि शरीर में प्रवेश कराया जाता है।
यह दो प्रकार का होती हैः-
आस्थापन ,और अनुवासन
 आस्थापन या निरूह वस्तिः इसमें विभिन्न औषधि द्रव्यों के क्वाथ (काढे़) का प्रयोग किया जाता है । यह वस्ति क्रिया शरीर के दोषो को चलायमान करती है , शोधन करती है।
अनुवासन वस्ति:- इसमें विभिन्न औषधि द्रव्यों सें सिद्ध स्नेह का प्रयोग किया जाता हैं। इसमें प्रयुक्त द्रव्य यदि यदि शरीर के भीतर भी रह जाय तो कोई हानि नही होती । पहली वस्तु से मुत्राशय और प्रजनन अंगो को वेहतर किया जाता है दुसरी बार दी जाने वाली वस्ति से मस्तिष्क विकारो और चर्म रोगों में शांति मिलती है।
किस तरह के रोगों का इलाजः
न्यूरो और जोड़ो के रोग और प्रजनन संबंधी रोग आदि।
कौन न कराए इलाजः भोजन किए बिना अनुवासन वस्ति और भोजन के बाद आस्थापन वस्ति और भोजन के बाद आस्थापन वस्ति नही किया जाता है। अत्यधिक दुबले -पतले और कमजोर लोग को वस्ति नही दी जाती ।
4. नस्य
नाक से औषधि को शरीर में प्रवेश कराने की क्रिया को नस्य कहा जाता है। नस्य को गले और सिर के सभी रोगों के लिए उत्तम चिकित्सा कहा गया है । आयुर्वेद में नस्य चिकित्सा की काफी उपयोगिता बताई गई है। इस पद्धति से कई तरह के रोगों का इलाज किया जाता है।
मात्रा के अनुसार नस्य के दो प्रकार है
1. मर्श नस्यः 6,8 या 10 बूंद नस्य द्रव्य को नाक में डाला जाता है ।
2.1 या 2 बूंद औषधि नाक में डाला जाता है । इसमें नस्य की मात्रा कम होती है इसलिए इसे जरूरत पड़ने पर रोज भी लिया जा सकता है ।
किस तरह के रोगों का इलाज:
जुकाम ,साइनोसाइटिस, गले के रोग ,सिर का भारीपन ,दांतों और कानों के रोग आदि ।
कौन न कराए इलाजः- अत्यन्त कमजोर व्यक्ति ,सुकुमार रोगी, मनोविकार वाले रोगी, अति निद्रा से ग्रस्त लोग इस इलाज को अपनाने से बचें ।
5. रक्त मोक्षण
शल्प चिकित्सा संबंधी शास्त्रों के अनुसार पांचवां कर्म ’रक्त मोक्षण’ माना गया है। रक्त मोक्षण का मतलब है शरीर से दूषित रक्त को बाहर निकालना । आयुर्वेद में खून की सफाई के लिए जलौकावचरण (लीच थेरपी) का विस्तार से वर्णन किया गया है।किस प्रकार के घाव में जलौका यानी जोंक ’लीच’ का उपयोग करना चाहिए , यह कितने तरह की होती है,जलौका किस तरह से लगानी चाहिए और उन्हैं किस तरह रखा जाता है।,जैसी बातों को सुश्रुत संहिता में विस्तार से बताया गया है।
आर्टरीज और वेंस में खून का जमना और पित्त की समस्या से होने वाले बीमारियों मसलन ,फोड़े -फुंसियों और त्वचा से जुड़ी परेशानियों में लीच थेरपी से जल्दी फायदा होता है।
जलौका दो प्रकार के होते हैः
सबिष (विषैली) और निर्विष (विषहीन)। आयुर्वेद में इलाज के लिए निर्विष जलौका जहां हरे रगं की चिकनी त्वचा वाला और विना बालों वाला होती हैं , वहीं सविष जलौका गहरे काले रंग की और खुरदरी त्वचा वाली।

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