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ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम्। विश्वस्य एक परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वा अमृता भवन्ति ॥ 7 ॥            You are the Supreme Brahman, infinite, yet hidden in the hearts of all creatures. You pervade everything. They, who know You, are free from the cycle of birth, death and rebirth. (Svetasvatara 3 : 7)            परमात्मा सब प्रकार से सब काल में मुक्त और शुद्ध है। वह अपरिमित और अनन्त होते हुए भी सभी प्राणियों के हृदय में छिपा हुआ है। परमात्मा को जानने वाले व्यक्ति ही जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।

ज़्येठॖ (ज्येष्ठ) ज़ूनॖ पछॖ (शुक्ल पक्ष) च़ोरम (चतुर्थी) बॊम्वार (मंगलवार),श्री सप्तर्षि सम्वत 5096, Today isJyesth Maas Shukla Paksh Chaturthiyaam Mangalvaasra sanayitaam. Kashmiri Pandit Nirvasan Samvat_31 Sapthrishi Samvat _5096
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उड़े-उड़े रे मन, मैं रहूं मगन। जवानी की दहलीज पर कदम रखने वाले युवा मन का शायद यही हाल रहता है या रहना भी चाहिए, लेकिन मस्त रहने का मन तभी होगा जब साथ देगा तन। इस तन को सजाने-संवारने और मैंटेन रखने के लिए आज युवतियां जाने-अनजाने ऐसे कदम उठा लेती हैं कि न तो तन ठीक रहता है, न मन। छरहरी काया बनाने का ऐसा जुनून सवार है कि वे प्राॅपर भोजन या जरूरी पौष्टिक तत्व तक समय पर और ठीक से नहीं लेती है। हालत यह है कि खुद को ‘फिट’ रखने की इस कवायद ने उन्हें, ‘अनफिट’ कर दिया है। कई युवतियां एनोरेक्सिया की शिकार हो गईं। तन को फिट रखने की जुनूनी चाहत और अवैज्ञानिक तरीकों के चलते बीएमआई का भी ध्यान नहीं रखा जाता। एनोरेक्सिया क्या है, बीएमआई क्या है, इस पर चर्चा करने से पहले आइये डालें एक नजर एक शोध रिपोर्ट के आंकड़ों पर जो युवतियांे के उस बीमार कराऊ जुनून के बारे में बताते हैं जिसके तहत वे छरहरी काया के लिए प्राॅपर खाना नहीं खातीं, प्रतियोगात्मक युग को दोषी ठहराती हैं या चल रहे टेंªड पर दोष मढ़ती हैं।
    18 से 22 वर्ष की काॅलेज जाने वाली युवतियों के बीच किए गए इस शोध के मुताबिक दिनभर में महज 22 प्रतिशत युवतियां उचित भोजन लेती हैं। 78 प्रतिशत युवतियां सिर्फ भोजन करती हैं। 39 प्रतिशत लड़कियां ऐसी हैं जो रोज दूध भी पीती हैं। इसके उलट 61 प्रतिशत युवतियां ऐसी हैं जो दूध के बजाय काॅफी पीती हैं 29 फीसदी युवतियों का पीरियड नार्मल रहता है। इसके उलट 71 प्रतिशत युवतियां अनियमित पीरियड की शिकार हैं। 37 प्रतिशत युवतियां ऐसी हैं जो हरी सब्जी और दाल नहीं खातीं, 63 फीसदी युवतियां हरी सब्जियों और दालों का सेवन करती हैं। स्लिम बनना क्यों जरूरी है, इसके लिए 15 प्रतिशत युवतियां टेªंड को दोषी मानती हैं, जबकि 75 फीसदी युवतियां प्रतियोगिता को इसके लिए उत्तरदायी मानती हैं। कुछ काॅलेज गल्र्स के बीच किए गए शोध रिपोर्ट के आंकड़ों की यह कहानी है तो बाकी का अंदाजा लगाया जा सकता है।

राष्ट्रीय सर्वे क्या कहते हैंः-खाने-पीने की अनियमित आदत और टेंªड आदि से संबंधित इन आंकड़ों के बाद करते हैं राष्ट्रीय परिवार एवं स्वास्थ्य सर्वेक्षण के चैंकाने वाले तथ्यों की। यह सर्वे 2004-2005 और 2005-2006 में किए गए। याद रहे यह समय भारतीय अर्थव्यवस्था के हिसाब से स्व£णम काल माना जाता है। इस दौरान सकल घरेलू उत्पाद के साथ-साथ प्रतिव्यक्ति भोजन उपभोग में कमी आई। यह कमी एक ओर जहां कुछ-कुछ इलाकों में गरीबी के कारण थी तो दूसरी तरफ कुछ मामलों में कैलोरी उपभोग में सामाजिक टेंªड के चक्कर में इसमें कमी आई। 1990 में जो भोजन उपभोग 476 ग्राम प्रतिदिन था वह 2001 में घटकर 418 ग्राम प्रतिदिन रह गया था।
    हालांकि इस गिरावट पर कुछ लोगों ने यह तर्क भी दिया कि बेहतर आय होने के बाद खर्चे में भी वैसी ही बढ़ोतरी हुई, जिसके चलते घरेलू खर्चें में भी कमी आई। रिपोर्ट में 1996-97 के सर्वे से तुलना कर यह बात भी स्पष्ट की गई है कि कुछ गरीब राज्यों में कम वजन वाले बच्चों की संख्या बढ़ी है। इन राज्यों में मध्यप्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ शामिल हैं। हालांकि संपन्न राज्य गुजरात में भी अंडरवेट बच्चों की संख्या में इजाफा हुआ। कम कैलोरी व पौष्टिक तत्वों की वजह से ‘अंडर वेट’ बच्चों की संख्या तो बढ़ी ही, कई युवतियों व गर्भवती महिलाओं की अनेमिक होने की समस्या भी काफी बढ़ी है। हालांकि सरकारी सर्वे रिपोर्ट में यह खुलासा भी हुआ कि कम वजन के बच्चों की संख्या में इजाफा हुआ है, इसके अलावा एनेमिक महिलाओं की संख्या भी बढ़ी है।

एनोरेक्सिया: जुनून खुद को बीमार करने का
एनोरेक्सिया के लक्ष्णः-
ऽ    भोजन, कैलोरी और न्यूट्रीशन को लेकर पूर्वाग्रह 
ऽ    भूख न लगने की शिकायत रहना
ऽ    वजन न बढ़ने पर भी मोटापा फील करना
ऽ    जरूरत से ज्यादा डाइटिंग करना
ऽ    बालों का झड़ना
ऽ    सामान्य तापमान पर भी ठंड महसूस करना

बुलिमिया (ज्यादा भोजन करना)
ऽ    अंतराल के बाद बेहिसाब और घबराहट से उल्टी कर देना
ऽ    वजन और बाॅडी शेप की ज्यादा परवाह करना
ऽ    जम कर खाने के बाद जबरदस्त डाइटिंग करना
ऽ    ज्यादा खाने के बाद भावनात्मक तनाव से भरना
ऽ    खाने की बात करते हुए ज्यादा शर्म या ग्लानी महसूस करना
ऽ    डिप्रेशन वाला मूड़, नियंत्राण से बाहर होना
ऽ    वजन तेजी से बढ़ना-घटना
ऽ    बेतरतीब खाने के बाद छुपकर उल्टी करना

बिंग इटिंग डिसआर्डर (अनियंत्रित खानपान)
ऽ    भोजन देख कर नियंत्राण न रख पाना
ऽ    बिना भूख लगे खाना
ऽ    खाना ठूंसने की हद तक खाना
ऽ    ज्यादा खा लेने के बाद आत्मग्लानि से भरना
ऽ    वजन का बढ़ना
ऽ    भोजन करने के बाद उसकी मात्रा के बारे में सोचकर परेशान होना।

बीएमआई क्या हैः-बीएमआई का मतलब है बाॅडी मास इंडेक्स। यह फिगर मेजरमेंट के लिए बनाया गया मापक है। इसके तहत किसी माॅडल के शरीर में विभिन्न मानकों को तय किया है। बाॅडी मास इंडेक्स में शामिल है वजन, ऊंचाई और जरूरी पोषक तत्व। आजकल दुनियाभर में होने वाले कई फैशन शोज में अब ऐसे माॅडल्स को नहीं लिया जाता जो इस माप में फिट नहीं बैठती। ऐसे फैशन शो के आयोजकों का कहना है कि उन्हें अपने कार्यक्रम के लिए स्लिम माॅडल चाहिए होती है, दुबली या कमजोर माॅडल नहीं। 

क्या है एनोरेक्सियाः- छरहरी काया की तमन्ना में गलत खान-पान के चलते उपजने वाली यह समस्या बहुत खतरनाक है। इसमें भूखे रहकर या अधिक एक्सरसाइज से अपने शरीर को जरूरी मात्रा में पोषक तत्वों से दूर कर दिया जाता है। यह जटिल मनोवैज्ञानिक, न्यूरो बाॅयोलाॅजिकल स्थिति है। इससे शरीर के कई हिस्सों, धमनियों आदि में खतरनाक सीमा तक दबाव बढ़ जाता है। इसकी भयावहता के कारण कई बार मौत तक हो जाती है। अनेमिक, पीरियड्स की अनियमितता आदि इसके लक्षणों में शामिल है।

बच्चों के लिए एनोरेक्सिया से बचने के टिप्सः-
1ण्    जब भूख लगे तभी खाएं। पेट भरने के लिए खाना ठूंसने से बचें। 
2ण्    स्वस्थ्य भोजन के लिए सभी प्रकार का भोजन करें। भोजन में वैरायटी लाएं। कोई भोजन अच्छा या गंदा नहीं होता। फल-सब्जियों का सेवन करें।
3ण्    जब स्नैक्स लें, उसमें भी टेस्ट के साथ वैरायटी बदलने पर ध्यान दें।
4ण्    जब  उदास, बेचैन या खाली हों और भूख भी न लगी हो तो खाने से बेहतर है दोस्तों या पेरेंट्स से बातचीत में समय व्यतीत करें।
5ण्    एक्सरसाइज करने का नियम बनाएं। जैसी भी एक्सरसाइज आप करना चाहें, कर सकते हैं। मकसद एक्टिव रहना है।
6ण्    पसंद से कोई भी खेल चुनें और उसमें अपनी रुचि बढ़ाएं। डासिंग या कराटे जो भी आप करना चाहें।
7ण्    अच्छी सेहत से उभरते हैं अच्छे विचार। कोई हाॅबी डेवलप करें। ड्राइंग, रीडिंग या म्यूजिक में मन लगाएं।
8ण्    अपनी सेहत देख खुद को कोसना छोड़ें। शरीर को बनाना और बिगाड़ना ज्यादातर अपने हाथ में होता है।
9ण्    सेहत से जुड़ी अवधारणाओं पर दिमाग से विचार करें। मोटे बुरे होते हैं और पतले अच्छे, यह विचार गलत हैं।
10ण्    लोगों को पतले-मोटे होने पर चिढ़ाना गलत बात है। इससे सामने वाले का आत्मविश्वास डगमगाता है।

थियेटर के जरिये जागरूकता
‘मैं वहां एक रात भी नहीं सो सकती जहां मैं हर उस चीज में उपलब्ध कैलोरी को न गिन पाऊं जो मैं खाती हूं। इस पर मेरा मजाक बनता है, लेकिन मैं अब भी ऐसा ही करती हूं।’
    ‘वह जो भी खाती-पीती है, उससे पहले उस पदार्थ में कैलोरी की मात्रा पर बात करने लगती है। क्योंकि वह जो भी कुछ मंगाती है, इंटरनेट पर पहले उमें उपलब्ध कैलोरी के बारे में जानकारी हासिल कर लेती है।’
    ये डायलाॅग उस नाटक के हैं जिसमें छरहरी काया के लिए अनियमित खान-पान और गलत तरीकों से एनोरेक्सिया के शिकार लोगों के लिए संदेश किया गया है।
    आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका में 3 प्रतिशत लोग अनियमित खान-पान के शिकार हैं। खुद को पतली बनाने या दुबली-पतली बने रहने के गलत तरीकों से एनोरेक्सिया को आमंत्रित करने वालों को आगाह करने वाले इस नाटक में डल्लास चिन्ड्रन थियेटर के जरिये नाटक की अभिनेत्राी लीजा फेयरचाइल्ड के बारे में एक इंटरव्यू में लेखिका लिंडा डोहटीं कहती हैं- ‘लीजा बहुत मस्त महिला हैं, न केवल स्टेज पर बल्कि वास्तविक जीवन में भी वह जो भी खाती-पीती हैं उसमें कैलोरी की मात्रा पूछने लगती हैं।’
    लोगों में जागरूकता लाने वाले इस नाटक को लिखने और इसमें स्वयं भूमिका निभाने वाले लीजा कहती हैं ‘किसी भी किशोरी की ऐसी हालत देखती हूं तो मैं बहुत भावुक हो जाती हूं। समझ में नहीं आता कि ऐसी क्या डाइट हो कि जिससे मामला नियंत्रित हो सके। मेरा नाटकीय अभिनय एक व्यक्ति की भी मदद कर सके तो मैं इसे सफल मानूंगी।’ फेयरचाइल्ड मानती हैं कि जागरूकता की कमी के कारण ही भोजन संबंधी ये अनियमितताएं हैं। वह अपने बारे में कहती हैं- ‘मेरे मामले में खान-पान की अनियमितता के मामले में शुरुआत बहुत निरीह है। मेरा पहला ब्वाय फ्रेंड था। यह उस समय की बात है जब मैं भूखी नहीं थी और मेरे साथ हमेशा एक समस्या रहती थी कि लोग मुझे खाते हुए देख रहे हैं। मैं चीजों को छांटकर खाने वालों में से थी। मेरे फ्रेंड ने वेलेंटाइन डे के दिन मुझे कैंडी दी। मैं इसे खा नहीं सकती थी। कैंड़ी मेरे कमरे में महीनेभर पड़ी रही। मेरे दोस्त ने कहा तुम्हें आश्चर्य होगा कि तुमने कितना वजन घटा लिया, क्यांेकि दुबला होने के लिए मैं काफी करतब कर चुकी थी, बहुत से लोग कहते थे- तुमने यह कैसे किया, यह मेरी ख्याति का जरिया बन गया था।’
    वह कहती हैं- असल में डाइटिंग एक दूसरा जरिया है। बाद मंे स्लिम बनने पर उसके परिवार के लोग ध्यान देने लगे। लेकिन अंततः जब वह गुस्सा हुई तो उसने भोजन ही छोड़ दिया। इसका बहुत प्रतिकूल असर पड़ा उसके पीरियड रुक गए। इस प्रक्रिया में उसके 14 दर्दनाक वर्ष गुजरे। माता-पिता बहुत परेशान हुए।
    जांच में पता चला कि वह एनोरेक्सियाग्रस्त हैं। इसमें बताया जाता है कि जब उसकी शादी हुई, वह 32 वर्ष की थी। अब वह बेहतर है और एक बच्चा जनना चाहती है। लेकिन अपने शरीर के परिवर्तन के लिए वह अब भी संघर्ष कर रही है। उसका दर्द इस तरह बयां होता है- ‘मैं शीशे के सामने खड़ी नहीं हो पाती हूं, कुछ भी खाती हूं तो पेट में दर्द होता है।’ असल में यह सब अनियमित खानापान का नतीजा है। इस थियेटर प्ले में यही समझाने की कोशिश की गई है कि कैसे दुबला होने के जुनून में अनियमित खान-पान के कारण कई दिक्कतें शुरू हो जाती हैं।

 

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