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Rig Veda      इममिन्द्र सुतं पिब ज्येष्ठममर्त्यं मदं।     शुक्रस्य त्वाभ्यक्षरन्धारा ऋतस्य सादने।। ऋग्वेद १-८४-४।।               हे इंद्र (जीवात्मा), तुम अमृत्व और भक्ति का रस पान करो। पवित्र और आनंदमय उपासना की सत्य और विधियुक्त धाराओं को अपने हृदयप्रदेश में बल और महिमा प्रदान करने के लिए बहने दो। (ऋग्वेद १-८४-४)            O Indra (soul), you drink the juice of immortal and devotion. Let the purifying and blissful streams of devotion flow for you into the seat (heart) of truth and law to achieve pure and brilliant power and glory. (Rig Veda 1-84-4)

02.06.2020 अज़ छि न्यर्ज़ला काह (निर्जला एकादशी) ज़्येठॖ (ज्येष्ठ) ज़ूनॖ पछॖ (शुक्ल पक्ष) काह (देवादेव) (एकादशी) बॊम्वार (मंगलवार) श्री सप्तर्षि सम्वत 5096, Jyesth Maas Shukla Paksh Nerzala Ekadashmiyaam Partamiyaam Duadashmiyaam Mangalvaasra sanayitaam. Kashmiri Pandit Nirvasan Samvat_ 31 Sapthrishi Samvat _ 5096
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हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए दी गई शहीदी की महान गाथा

हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए दी गई शहीदी की महान गाथा
गुरू तेग बहादुर
प्रस्तावना

सिख पंथ की स्थापना लगभग 540 वर्ष पूर्व, गुरू नानक देव जी द्वारा की गई । उस समय इंसान पूर्ण रूप से कुरीतियों, वहमों व अंधविश्वास से ग्रसित था। गुरू नानक ने इन बातों का विरोध किया व तीन नियमों को जीवन में ढालने पर जोर दिया 1. नाम जपना - ईश्वर का सिमरन करना 2. किरत करनी - जीवन का निर्वाह मेहनत व ईमानदारी से करना 3. वंड छकना - मिल बांट कर खाना । गुरू नानक , हिन्दू व मुस्लिम दोनों के इतने प्रिय थे कि उनके देहान्त के पश्चात , हिन्दुओं ने उनकी याद में समाधी व मुस्लमानों ने मजार बनाई जो आज भी कतारपुर (पाकिस्तान) में एक ही परिसर में बनी हुई है । इस स्थान पर आज भी नमाज पढ़ी जाती है और गुर्बानी कीर्तन होता है।

उस समय हिन्दुस्तान पर मुगलों का राज था। वक्त के साथ मुगल शासक इतने क्रुर हो गए कि उन्होंने हिन्दूओं पर जुल्म करने शुरू कर दिए । औरंगजेब के शासन में हिन्दूओं के धार्मिक चिन्हों (जनेऊ चोटी , इत्यादि) को काटकर अपमानित किया जाने लगा । उसका हुक्म था कि हिन्दूओं को जबरदस्ती मुस्लमान बना दिया जाए । सब तरफ त्राहि-त्राहि मची हुई थी और लोगों का मनोबल समाप्त हो गया था इस जुल्म से मुक्ति देने तथा हिन्दूओं का खोया हुआ सम्मान वापिस दिलाने के लिए सिक्खों के नौवें गुरू ’तेजबहादुर जी ’ ने चाँदनी चैक (दिल्ली) में अपनी शहीदी दी। बाद में दसवें गुरू ’गोबिन्द सिंघ जी ने भक्ति व शक्ति का मेल करते हुए सन् 1699 में ’खालसा’ की सृजना की और सहमे , हताश तथा मुर्दा हो चुके समाज में नई उमंग भर दी । उन्हौंने खालसा को पुरे केश तथा पगड़ी के साथ एक अलग पहचान दी ताकि कोई भी व्यक्ति सहायता के लिए , खालसा को दूर से पहचान कर उससे मदद मांग सके और फरमान किया -

चिड़ियों से मैं बाज लड़ाऊँ, गिदड़ों को मैं शेर बनाऊँ।
सवा लाख से एक लड़ाऊँ, तबै गोबिन्द सिघं नाम कहाऊँ।

शासकों के अत्याचार से डरे भारत के लोगों में जान फूंकने के लिए गुरू गोबिन्द सिंघ ने सन् 1699 में बैसाखी के दिन ,आनन्दपुर साहिब में एक सभा का अयोजन किया । उन्हौने नंगी तलवार हाथ में लिए हजारों की सभा में ललकारते हुए कहा-’ कौन मुझे अपना शीश देगा ’ कौन मुझे अपना शीश देगा’। यह सुन चारों ओर सन्नाटा छा गया । कोई भी ऐसी परीक्षा के लिए तैयार था। तभी हौसला कर लाहौर के दयाराम आगे आये । गुरू जी उसे एक तम्बूं में ले गए। थोड़ी देर पश्चात् खून से भरी तलवार लिए गुरू जी बाहर आए व एक और शीश मांगा । ऐसा गुरू जी ने 5 बार किया हर बार परीक्षा अधिक कठिन होती जा रही थी । बिना घबराए,हस्तिनापुर के धरमदास जगन्नाथ पुरी के किम्मतराय ,गुजरात के मोहकम चंद व कर्णाटक के साहिबचंद एक-एक कर आगे आए । यह नजारा देख लोग हैरान थे । तभी गुरू जी ने तम्बू का पर्दा उठाया तो पांचो जीवित खड़े थे । कुर्बानी की जजबे के निराले ढंग से लोग चकित थे । गुरू जी ने पांचो को अमृतपान कराया व ऐलान किया -’ तैयार हो गया है अब खालसा (अर्थात खालिस /शुद्ध ) जो न जुल्म करेगा न सहेगा , देश व धर्म की रक्षा के लिए सदा तत्पर रहेगा और जरूरत पड़ने पर अपनी जान न्यौछावर कर देगा । गुरू जी ने इन्हें दया सिहं ,धरम सिहं ,हिम्मत सिहं , मोहकम सिंह व साहिब सिंह का नाम दिया और ’पंज प्यारे ’ कहकर सम्बोधित किया । पंज प्यारों से जो गुरू जी ने खालसा पंथ की सृजना की थी वह गिनती आज करोड़ो में पहुंच गई है। इतिहास गवाह है कि ’ खालसा ’ ने कमजोर व असहाय की मदद के लिए कभी अपनी जान की प्रवाह भी नही की । सन् 1737 से 1767 के बीच भारत पर सीमा पार से लुटेरों द्वारा कई हमले हुए जिनमें अहमदशाह अब्दाली एवं परशिया के नादिर शाह इत्यादि प्रमुख हैं। ये लुटेरे न सिर्फ सोना , चाँदी , जवाहरात लूटते बल्कि भारत के कोने -कोने से हिन्दू स्त्रिायों को बंदी बनाते व उन्हें काबुल , गजनी ,पर्शिया के बाजारों में बेचते जहां उनका अनेक प्रकार से शोषण किया जाता । लूट पाट के बाद वापिस जाते हुए लुटेरों को अंत में पंजाब से गुजरना पड़ता । जब भारत में इन स्त्रिायों की दुख भरी चीखे सुनने वाला कोई न था। और हर तरफ लोग अन लुटेरो से अपनी जान व माल के बचाव की सोच रहे थे पंजाब में शिखो ने मज्लूम औरतों को बचाने की ठान ली । उन्हौने छोटे दल बनाकर अर्धरात्रि के 12 बजे लुटेरों पर हमले की व्यूह रचना बनाई । अपने दल को हमले के लिए चैकन्ना व तैयार करने के लिए एक सांकेतिक वाक्य बनाया - ’’बारह बज गए ’’। इस तरह अर्धरात्रि में हमला कर वे ज्यादा से ज्यादा स्त्रिायों को छुड़ाकर उनके घर पहुंचा देते । यह वाक्य उस समय हिन्दूओं के लिए वरदान व आश्वासन का प्रतीक था अब उनकी बहू बेटियों को सिख बचा लेगें ।दुर्भाग्यवश इस वाक्य के महत्व का सही ज्ञान लोगों को नही है कि किस तरह सिखो ने हिन्दूओं की बहू बेटि की इज्जत बचाई जब हर तरफ दुर्बलता व लाचारी थी। आज अज्ञानता में कुछ लोग इस वाक्य से सिखो पर व्यंग करते है पर वे यह नही जानते कि ऐसा कर वे वास्तव में अपनी कायरता की कहानी ही सामने ला रहै है । सिखों के लिए यह वाक्य तो आज भी विरता व गर्व का प्रतीक है व इतिहास में इसका अपना योगदान है ।

सिखों की बहादुरी की मिसाले , फौज की ऐतिहासिक घटनाओं में अनगिनत मिलती है। ’ सारागढी की लड़ाई ऐसी ही एक मिसाल है ’’जिसमेंसिख रेजिमेंट ’’ 21 जवान उत्तर पश्चिमी फ्रंड पर (अब पाकिस्तान मेंहैं ) , 12 सितंबर 1897 को 10 हजार की फौज से दिलेरी से लडे़ व एक कदम भी दुश्मन को आगे बढ़ने नही दिया । आखिर में इसके सिगनलर गुर मुख सिहं जी ने भी बन्दूक उठा ली व उसने हैडक्वार्टर को आखिरी संदेश यह दिया की - ’’इसके बाद मैं और संदेश नही भेज पाउंगा क्योकि अब मैं रायफल से दुश्मन का मुकाबला करने जा रहा हूं ।’’ बहादुरी की यह दास्तान फ्रंास के स्कूली बच्चों की पढाई का हिस्सा है व इसे यूनेस्को द्वारा छापी गईकिताब में ’’ैजवतपमे व िठतंअमतल’’में शामिल किया गया है। आज जरूरत है कि , सिखों व उनके गुरूओं द्वारा , देश की रक्षा व इसे धर्म निरपेक्ष बनाने के लिए दी गई कुर्बानियां ,/कालेज के पाठ्यक्रम का हिस्सा बनें । लोगों में जागरूकता आए जिससे कोई भी व्यक्ति अज्ञानता में भी किसी की धार्मिक भावना को ठेस न पहुंचाए व स्वयं भी पाप का भागी न बनें । क्योंकि यह पाप ही बाद में दुख तकलीफ का कारण बनते हैं। घर के बड़े बुजुर्ग , बच्चों को यह शिक्षा अवश्य दें ।



गुरूद्वारा सीस गंज ,दिल्ली

यह ऐतिहासिक गुरूद्वारा दिल्ली के चाँदनी चैक में स्थित है। इसका निर्माण सिखों के नौवें गुरू, तेजबहादुर जी की पुण्य स्मृति में किया गया हैं। गुरू जी को मुगल बादशाह औरंगजेब के हुक्म से यहां शहीद किया गया था ।

औरगंजेब ने सन् 1658 से 1707 तक हिन्दुस्तान पर राज किया । शासन पर कब्जा पाने के लिए उसने अपने पिता शाहजहाँ को गिरफतार कर लिया और अपने भाईयों को मरवा डाला । वह पुरे हिन्दुस्तान से हिन्दु धर्म को मिटा कर इस्लाम धर्म फैलाना चाहता था । उसने हिन्दुस्तान के कई जगहो पर मन्दिरों को तुड़वाया जैसे मथुरा (केशव देव) गुजरात (सोमनाथ) ,उड़ीसा (जगन्नाथ पुरी) बनारस (काशी विश्वनाथ) तथा बंगाल ,राजस्थान ,महाराष्ट्र,आंध्रप्रदेश इत्यादि के अनेक प्रमुख मन्दिर । हिन्दुओ पर अधिक टैक्स लगाए। उसने अपने अधिकारियों को हुक्म दिया की हिन्दुओं के माथे से तिलक मिटा दिए जाएं और उनके जनेऊ उतार कर जबरदस्ती मुस्लमान बना दिया जाए ।

उसका आदेश था कि हर रोज ’सवा मन ’ जनेऊ (लगभग 46 किलो) हिन्दुओं के गले से उतार कर (अर्थात् उनका धर्म परिवर्तन कर या उन्हेंमारकर) उसके सामने पेश किया जाएं। यह आदेश तेजी से लागू होने लगा । परिणाम स्वरूप अनेक हिन्दुओं ने इस्लाम कुबूल कर लिया । जिन्होंने विरोध किया उन्हें अपनी जान गवानी पड़ी । इस अत्याचार से हिन्दू समाज में बहुत खलबली मची थी । इस जुल्म से मुक्ति पाने के लिए उन्होंने अमरनाथ की गुफा में भगवान शिव की पुजा भी की । कइ्र दिनों की पुजा और विद्वानों की सलाह से वे आखिर इस नतीजे पर पहुंचे कि इस समय सिखों के नवें गुरू ,श्री गुरू तेग बहादुर ही उन्हें इस संकट से निकाल सकते हैं और उनकी रक्षा कर सकते हैं । वे यह भी जानते थे कि सिख गुरूओं ने पहले भी मुगलो के अत्याचार का मुकाबला किया था और जीत हासिल की थी । इसीलीए 500 कश्मीरी पंड़ितों का एक जत्था गुरू जी के दरबार में आनंद पुर (पंजाब गया) और उन्हें औरंगजेब के दर्दनाक अत्याचारों द्वारा हिन्दुओं को मुस्लमान बनाने से अवगत कराया । उनके मुखिया पंडित किरपा राम ने गुरू जी से फरियाद की ’’ दीनबन्धु! हमें बादशाह औरंगजेब के जुल्म से बचाओं , उसने हुक्म दिया है कि हिन्दुओं को मुस्लमान बना दिया जाय ।’’ गुरू जी इस्लाम के विरूद्ध नही थे । बल्कि इतिहास में ऐसे कई संदर्भ है जिनसे सिख गुरूओं का मुस्लमान के प्रति स्नेह झलकता है । जैसे - ’’ मरदाना जो एक मुस्लिम परिवार के थे, सदा गुरू नानक के साथी रहे; पांचवे गुरू ’’अर्जन देव जी ’’ ने हरिमंदर साहिब (स्वर्ण मंदिर -अमृतसर) की नींव एक मुस्लिम पीर ’’ हजरत मिंया मीर ’’ द्वारा रखवाई; गुरूगंथ साहिब में मुसलमान पीरों की वाणी को पुरे आदर के साथ शामिल किया गया है ; इत्यादि । गुरू जी यह बर्दाश्त नहीं कर सकते थे कि किसी को अपना धर्म त्यागने के लिए मजबूर किया जाए । उन्होंने बहुत ध्यान पूर्वक पंडितों की दुखभरी गाथा सुनी।

इतने में उनके पुत्रा बालक गोबिन्द राय जी वहां आ पहुंचे। पंडितों को उदास बैठा देख अपने पिता जी के पास आये और पूछने लगे -’’ पिता जी , यह कौन हैं ! आप क्या सोच रहे हैं!

’’ बेटा ! औरंगजेब , हिन्दू धर्म मिटाना चाहता है। उसने हिन्दुओं को मुसलमान बनाने का हुक्म दे दिया है ।’’- गुरू जी ने कहा ।

’यह क्यों पिता जी !’’ बालक गोविन्द ने पूछा ।

गुरू जी -’’ औरंगजेब समझता है कि इस्लाम ही सच्चा मजहब है’’।

बालक गोविन्द -’’पिता जी, फिर हिन्दू धर्म कैसे बचाया जाय ।’’

’’ गुरूजी -किसी महापुरूष के बलिदान से ही हिन्दू धर्म बच सकता है ।

’’पिता जी , आप से बड़़ा महापुरूष और कौन है जो इतनी बड़ी कुर्बानी दे सके ’’- बालक गोविन्द ने सहजता से कहा।

गुरू जी अपने बेटे के इस निडर व साहसिक उत्तर से बहुत प्रभावित हुए। विनाश के कगार पर खड़े संपूर्ण हिन्दू समाज की रक्षा के लिए अपनी कुर्बानी देने का उन्होंने मन बना लिया । उन्होंने सोच विचार कर उदास बैठे पंडितों से कहा ,’’जाओ, अपने इलाके के हाकिम इफतिखार खान से कहो कि वह पहले गुरूतेग बहादुर को इस्लाम कुबूल करने के लिए मनाये , फिर हम सब मुसलमान बन जाएगें ’’। दुखी और उदास पंडितों की जान में जान आई। कश्मीरी पंडितों ने गुरू जी को प्रणाम किया और आशीर्वाद लेकर बड़े हौंसले से उनके दरबार से उठकर चले गए । अपने घर पहुंच कर इफतियार खान को गुरू जी का संदेश दिया । ’’ हम सब मुसलमान बन जाएंगे पहले हमारे गुरू तेग बहादुर जी को मुसलमान बनने के लिए मना लीजिए । ’’गुरू जी का यह संदेश बादशाह औरंगजेब तक भी पहुंच गया । बादशाह ने सोचा की अब उसका काम आसान हो गया , क्योंकि एक व्यक्ति के मुसलमान बनने से पुरा देश इस्लाम कुबूल कर लेगा व उसका हिन्दुस्तान से हिन्दू धर्म को मिटाने का सपना साकार हो जाएगा । बादशाह ने हुक्म जारी कर दिया कि गुरू तेग बहादुर को गिरफ्तार कर फौरन दिल्ली लाया जाए । उसने गुरूजी की गिरफ्तारी पर इनाम भी घोषित कर दिया ।

यह ऐतिहासिक गुरूद्वारा दिल्ली के चाँदनी चैक में स्थित है। इसका निर्माण सिखोयह सुनकर गुरू जी खुद ही अपने परिवार से विदा लेकर दिल्ली के लिए चल पड़े । मालवे से होते हुए गुरू जी पटियाला, धमतान ,जींद,लखनमाजरा , रोहतक तथा आगरा के रास्ते दिल्ली की तरफ आएं । आगरा जाने का उनका मुख्य कारण यह था कि वह हसन अली नाम के एक गरीब श्रद्धालु चरवाहे की मुराद पुरी करना चाहते थे कि ’’ हे गुरू, अगर आप गिरफ्तारी देना चाहें , तो कृपया मेरे माध्यम से दें, ताकि इनाम के पैसे से मेरी गरीबी दूर हो सके ’’। उन्होंने उस चरवाहे को बुलवाया और उसे अपनी अंगूठी व दुशाला दिया और कहा -’’भाई बाजार से मिठाई ले आओ।’’ चरवाहा मिठाई लेने दुकान पर गया । दुकानदार को शक हो गया कि चरवाहे ने अंगूठी व शाल चुराई है। उसे पकड़ कर थाने ले गया । चरवाहे को थानेदार ने बताया: ’’बाग में एक महात्मा ठहरे है उन्होंने मिठाई लाने के लिए अंगूठी और दुशाला दिया है ।’’ थानेदार उसके साथ बाग में गया । वहां जाकर उसे पता लगा कि वह महात्मा तो गुरू तेग बहादुर हैं।

आगरा में जहां गुरू जी ठहरे थे वहां अब गुरूद्वारा ’ गुरू का ताल ’स्थापित है। यह आगरा के मुख्य आकर्षणों में एक है । यहां दिन रात लंगर बंटता है । थानेदार ने गुरू जी के आगरा में होने की खबर दिल्ली भेज दी । बादशाह के फौज के 10000 से अधिक सिपाही आगरा पहुंच गए। फौज के साथ अनेक हथियार बंद सिपाही थे । औरंगजेब को डर था कि गुरू जी की गिरफ्तारी की खबर कहीं आगरा के आस -पास जैसे मथुरा, भरतपुर , डीग हाथरस ,कोसी , धौलपुर ,आवागढ़,भदावर ,पीलीभीत इत्यादि कुल 52 राज्य के हिन्दु राजाओं को लग गई तो वे बगावत कर देंगे क्योंकि ये राजा,सिख गुरूओं का एहसान मानते थे। इन 52 राजाओं के पूर्वजों को गुरू तेग बहादुर के पिता ,’’ गुरू हरिगोविन्द जी ’’ ने सन् 1619 में उस वक्त के मुगल बादशाह ’’जहांगीर ’’ की लम्बी कैद से गवालियर के किले से अपने साथ आजाद करवाया था। गुरू हरगोविन्द जी जब 52 राजाओं को रिहा करा कर अमृतसर पंहुचे तो सिखों ने इस खुशी में पुरे शहर में दीपमाला व रोशनी की । इस दिन हिन्दूओं का धार्मिक पर्व दीवाली भी था जिस कारण हिन्दू व सिखों द्वारा इस पर्व को मनाने में समानता है। गुरू हरगोबिन्द जी द्वारा 52 राजाओं की रिहाई के बाद अमुतसर पहुंचने की खुशी में यह यह दिन दीवाली सिखों द्वारा ’’बन्दीछोड़ दिवस’’ के रूप में मनाया जाता है । इस दिन सिख अपने घरों को सजाते हैं, अपने मित्रों व रिश्तेदारों को मिठाई व अन्य उपहार देते हैं तथा एक दुसरे को ’’ बंदी छोड़ दिवस दी बधाई ’’ कह कर सम्बोधित करते हैं। ग्वालियर किले के बीचो-बीच बना विशाल ’’गुरूद्वारा बंदी छोड़’’ आज भी उस ऐतिहासिक घटना की याद दिलाता है।

परन्तु गुरू जी तो कुरबानी के लिए पहले ही तैयार होकर आये थे । वे फौज के साथ चलने के लिए राजी हो गए। औरंगजेब दिल्ली से बाहर गया हुआ था । उसके वजीरों व काजियोें ने गुरू जी को बादशाह का हुक्म सुनाया:-’’आपको इस्लाम धर्म कुबूल करना होगा । इसके बदले आप जो चाहें आपको मिलेगा ’’ । जब हर कोशिश के बावजूद गुरू जी नहीं माने तो काजी ने उन पर बहुत अत्याचार किए । गुरू जी अपने वचन पर अटल रहें । काजी को आदेश था कि गुरू जी के शिष्यों को सताकर गुरू जी के सामने मार दिया जाये। उसने सोचा की यह दृश्य देख कर गुरू जी घबराकर अपने आप इस्लाम कुबूल कर लेंगे। उनके एक शिष्य ’भाई मतीदास’ को लड़की के घेरे में बांधकर एक बड़े आरे से चिरवाया गया । खून की धारें निकलती रहीं पर वे आखिरी सांस तक जपुजी साहिब का पाठ करते रहे और अंत में शहीद हो गए। फिर बादशाह के सिपाही गुरू जी दुसरे श्रद्धालु शिष्य ’भाई दयाला जी’ को पकड़ कर लाएं और उन्हें उबलती पानी की देग में डाल दिया । वे जरा भी नहीं घबराये और गुरूवाड़ी का पाठ करते -करते उसी देग में समा गए। फिर ’’सतीदास जी की बारी आई । उनके चारों तरफ रूई लपेट कर आग लगा दी गई । पर उन्हौने उफ तक भी नही की।गुरू जी ने अपने तीन शिष्यों को आखों के सामने शहीद होते देखा । पर शांति के पंुज गुरू जी बिलकुल शांत रहे। औरंगजेब की गुरू जी से कोई जाति दुश्मनी नहीं थी । वह चाहता था कि गुरू जी हिन्दुओं के मसीहा बनकर ,उनकी मदद न करे व उनका साथ छोड़ दें।गुरू जी को यह मंजूर नही था बादशाह के हुक्म से गुरू जी को ऐसे पिंजरे में बंद कर दिया गया जिसमें ठिक से खड़े रहना या बैठना भी मुश्किल था काजी व मौलवियों के जुल्म और बढ़ गये एक बार फिर बादशाह औरंगजेब ने गुरू जी को मनाने के लिए उनके सामने 3 शर्ते रखीं: 1. कोई करामात दिखाइये 2. इस्लाम कुबूल कीजिए या 3. मरने के लिए तैयार हो जायें ।

गुरू जी बोले: ’’कुदरत के नियम अटल है। यह सृष्टि भगवान के हुक्म से ही चलती है करामात कहर का नाम है। मै इस्लाम का आदर व सम्मान करता हूं, लेकिन किसी पर धर्म परिवर्तन के लिए जुल्म करना अधर्म है । चाहे मै खुद तिलक नही लगाता व जनेऊ नही पहनता पर हिन्दुओं के इस अधिकार के लिए कोई भी कुरबानी देने को तैयार हूं।’’ औरंगजेब को यह यकीन हो गया कि गुरू जी वचन पर अटल हैं। जब तक गुरू जी जिंदा है, उसका हिन्दू धर्म को मिटाने का सपना पमरा नही होगा । उसने हुक्म भेज दिया कि चांदनी चैक में लोगों के सामने गुरू जी को कत्ल किया जाय । पुरे शहर में ढिढ़ोरा पिटवा दिया गया। 11 नवम्बर सन 1675 का दिन था । गुरू तेग बहादुर जी ने प्रातःकाल स्नान व जपुजी साहिब का पाठ किया । फिर चांदनी चैक में लाकर उनको एक वृक्ष के उपर बैठा दिया गया। हिन्दुओ व मुसलमानों की भीड़ इक्कठी हो गयी । आसमान पर बादल व काली घटायें छाई हुई थी , हवा धीरे-ध्ीरे हो रही थी । गुरू जी मग्न बैठे पाठ कर रहै थे । थोड़ी देर बाद जल्लाद आया । जल्लाद की तलवार चली और गुरू जी का सर धड़ से अलग हो गया ।

गुरूद्वारा सीस गंज में उस वृक्ष का तना जिसके नीचे गुरू जी को शहीद किया गया था व जिस कुएं पर गुरूजी ने शहीदी देने से पहले स्नान किया था, अभी तक सुरक्षित हैं । गुरूद्वारे के पास वाली इमारत जहां आजकल लंगर स्थान व ’’कार पार्किंग ’’ है , वहीं मुगल राज में कोतवाली ’जेल’ थी , जहां गुरू जी को कई महीनों तक कैद रखा गया था । यह कोतवाली भारत की स्वतंत्राता के बाद तक ’’ दिल्ली पुलिस ’’ के प्रमुख थानों में से एक थी यह जगह 1970 के दशक में भारत सरकार ने गुरूद्वारा सीस गंज के विस्तार के लिए गुरूद्वारा कमेटी को सौंप दी ।

इस गुरूद्वारे में पुरादिन श्रद्धालु का तांता लगा रहता है । उनका विश्वास है ,जो मनुष्य गुरू जी का सच्चे मन से सिमरन करता है , उसे नौं निधियां अर्थात सभी आत्मिक व संसारिक सुख प्राप्त होती है और गुरू जी सभी जगह उसकी सहायता करते है।

’’तेग बहादुर सिमरिये घर नौ निध आवै धाए, सब थांई होय सहाय ’’

गुरू जी के शहीद होते ही हाहाकार मच गई । ’’यह जुल्म है,इतने बड़े संत को कत्ल कर दिया है। यह शासन अब ज्यादा दिन तक चलने वाला नही है ’’प्रकृति ने ऐसा भीषण रूप धारण किया कि आंधी तूफान के कारण मुगल सिपाहीयों को कुछ दिखाई नही दे रहा था मानों सारा ब्रहमांड यह जुल्म देखकर क्रोध में आ गया हो । चारों ओर भगदड़ मच गई । इस भाग दौड़ में गुरू जी का एक श्रद्धालु शिष्य ’’ भाई जैता ’’ आगे बढ़ा । उसने बड़ी फुर्ती से गुरूजी का सीस उठा कर , श्रद्धा से अपने कपड़ों में लपेट लिया । अपने दो साथी -’’भाई नानू’’और ’’भाई ऊद्या ’’-साथ लिऐ । छिपते-छिपाते , पांच दिन की यात्रा के पश्चात् कीरतपुर ’पंजाब ’ जा पहुंचे ।

भाई जैता ने जैता ने बड़े बोझिल मन से ,गुरू तेग बहादुर जी के सीस को उनके सुपुत्रा बालक गोबिन्द राय के आगे रखा। ’’भाई जैता ’’ एक पिछडी जाति ’रंगरेटा’ के थे। बालक गोबिन्द राय ने भाई जैताजी के साहसिक कार्य को सराहा व गले से लगाते हुए कहाः- ’’रंगरेटे ,गुरू के बेटे’’ गुरूतेग बहादुर जी के सीस का बड़े सत्कार के साथ आनंदपुर साहिब में भी अब एक बहुत सुन्दर गुरूद्वारा ’’सीसगंज’’ सुशोभित है । उधर दिल्ली में गुरू जी के एक और श्रद्धालु शिष्य ,’’ लखी शाह बंजारा ’’ व उसका बेटा ’’नगाहिया ’’ रूई और दुसरे सामान की कई बैलगाड़ियां लेकर चांदनी चैक पंहुच गए तथा भीड़ को चारते हुए बैलगाड़ियां को निकाल कर आगे ले गये । उन्हौने बड़ी फुर्ती के साथ गुरू जी के धड़ को उठाया और रूई के ढेर में छिपा दिया तथा बैल गाड़ियों को हांक कर अपनी बस्ती रायसीना ले गए। राष्ट्रपति भवन के निकट ’रायसीना रोड’, उस समय वहां रायसीना बस्ती की मौजूदगी की साक्षी है।

इस दृश्य को उस वक्त के एक गायक ’’केसौ भट्ट’’ ने इस तरह वर्णन किया हैः- चलो चलाई हो रही,गड़-गड़ बरसे मेघ ,लखी नगाहिया ले गए, तू खड़ा तमाशा देख । दुसरी तरफ मुगल सिपाही परेशान थे कि गुरू जी का सीस और धड़ कहा गायब हो गए । क्योंकि चारों तरफ मुगल फौजों का डर था इसलिए ,लखीशाह ,’गुरू जी’ के धड़ को सत्कार से अपने घर ले गया और अंतिम संस्कार के लिए ,अरदास प्राथर्ना के पश्चात् उसने अपने घर को ही आग लगा दी । मुगल फौज व लोगों ने यही समझा कि लखी शाह के घर को आग लग गई है । इस तरह प्रकृति ने भाई जैता और भाई लखी शाह के साहसिक कार्य से ,गुरू जी के शरीर का अपमान होने से बचा लिया।

गुरूद्वारा रकाबगंज दिल्ली जहां लखी शाह ने अपने घर को आग लगाकर गुरू जी के धड़ का अंतिम संस्कार किया था वहां अब गुरूद्वारा रकाब गंज सुशोभित है । यह गुरूद्वारा नई दिल्ली के राष्ट्रपति भवन ,संसद भवन और और केन्द्रीय सचिवालय के समीप स्थित है जिस जिस रास्ते से लखी शाह , गुरू जी का धड़ , चांदनी चैक के शहीदी स्थान से वर्तमान गुरूद्वारा रकाब गंज ले गया था । यह नगर कीर्तन चाँदनी चैक स्थित गुरूद्वारा सीसगंज से शुरू होता है और नई सड़क , चावड़ी बाजार , अजमेरी गेट,पहाड़ गंज , पंचकुईयाँ रोड , कनाट प्लेस से होता हुआ गुरूद्वारा रकाब गंज समाप्त होता है। इस नगर किर्तन में हिस्सा लेना गौरव समझें। अगर हिस्सा न ले पाएं तो तेज तेज रफ्तार जिदंगी में इस नगर किर्तन को रूकावट या बाधा न माने । इसके पीछे भावना को याद करें और इसे एक अवसर मानें ,रूक कर गुरूजी को श्रद्धांजलि का और ईश्वर को धन्यवाद करने का कि भारतवासियों को गुरू तेग बहादुर जी के यप में एक मसीहा मिला जिनकी कृपा से अब वे धार्मिक आजादी के साथ सांस ले पा रहैं हैं। यह अद्वितीय कुरबानी लोगों के दिलों को छू गई अतः गुरू जी को इन शब्दों से याद किया जाने लगाः- गुरू तेग बहादुर हिन्द दी चादर

जिस तरह चादर हमारी रक्षा करती है, सर्दी-गर्मी से बचाती है उसी तरह गुरू तेग बहादुर जी ने हिन्दू धर्म और हिन्दुस्तान की रक्षा की । अपने धर्म व धार्मिक आजादी के लिए हर व्यक्ति लड़ता है परन्तु किसी और धर्म कि रक्षा के लिए दी गई कुर्बानी कि मिसाल दुनिया में दुसरी नही हैं । औरंगजेब का हिन्दू धर्म को मिटाने का सपना ,गुरू जी की शहीदी से टूट गया । अगर गुरू जी ने कुर्बानी नही दी होती तो शायद भारत का नक्शा आज कुछ और होता । इसलिए वास्तव में गुरू जी का शहीदी दिवस मुख्यतः हिन्दुओं द्वारा मनाया जाना चाहिए कि गुरू तेग बहादुर जी की कुरबानी के फलस्वरूप ही आज वह अपना हिन्दु धर्म निभा पा रहें है । लोगों की पुजां ,दान- पुण्य , तीर्थ यात्रा आदि सब अधुरी है यदि यह गुरू जी की शहीदी के प्रति आाभार व्यक्ति किए बिना है। साथ ही भारत सरकार को भी चाहिए की इस महान शक्ति के प्रति श्रद्धांजलि स्वरूप , उनके शहीदी दिवस को राष्ट्रीय अवकाश घोषित करे।

उनकी याद में सरकार द्वारा ,जी.टी. करनाल रोड छभ्.1 सिंघू बोर्डर ,दिल्ली में 11,87 एकड़ पर एक विशाल ’’गुरू तेग बहादुर मैमोरियल ’’ बनाया गया है जिसका उद्घाटन 29.07.2011 को किया गया । हरियाणा सरकार द्वारा भी गुरू जी को श्रद्धांजलि स्वरूप , ’बड़ खालसा मैमोरियल ’, जीटी रोड पर राई - सोनीपत में बनाया गया है।

गुरू जी की शहादत ने मुगल साम्राज्य की नींव हिला दी जो बाद में उसके पतन का प्रमुख कारण बनी । सन् 1783 में तीस हजार सिख सिपाहियों की फौज ने , सरदार बघेल सिहं , सरदार जस्सा सिंह आहलूवालिया व सरदार जस्सा सिंह रामगढ़िया के नेत्तृत्व में मुगल फौज को हरा कर दिल्ली के लाल किले पर खालसा ध्वज फहराया।

इस विजय की खुशी मनाते हुए सरदार बघेल सिंह ने कई दिनों तक गरीबों में मिठाई बांटी । पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के नजदीक वह जगह जहां से मिठाई बांटी ,आज भी ’’पुल मिठाई ’’ के नाम से जानी जाती है । इससे पहले सिखोें ने कश्मीरी गेट के निकट अपना पड़ाव डाला । तीस हजार सिख फौज की उपस्थिति के कारण उस जगह का नाम बाद में ’’तीस हजारी’’ पड़ा । चंूकि सिख फौज का दिल्ली पर शासन करने का कोई इरादा नहीं था , उन्हौने कुछ शर्तों पर वापस जाना मंजूर किया , जैसे - हिन्दूओं के मंदिरों की सुरक्षा तथा दिल्ली में उन स्थानों पर गुरूद्वारों का निर्माण जो सिख गुरूओं के इतिहास से सम्बंधित थी जैसे गुरूद्वारा सीसगंज ,रकाब गंज एवं बगंला साहिब इत्यादि । शासन द्वारा यह बातें मानी गई व दिल्ली की ’कर वसूली ’ का 37.5ः भाग इस कार्य के लिए मंजूर किया । सरदार जस्सा सिंह रामगढ़िया ने फौज के साथ दिल्ली से वापिस जाने से पहले , लाल किले में स्थित मुगल सल्तनत् के सिहांसन का संगमरमर का तख्त् (जहाँ मुगल बादशहों की ताज पोशी की जाती थी), उखाड़ लिया व एक मुजरिम की भंाति जंजीरों से बांधकर अमृतसर ले गये । यह वह तख्त था जहां से औरंगजेब ने हिन्दुओं को मुसलमान बनाने व गुरू तेग बहादुर को कत्ल करने का फरमान जारी किया था। वह तख्त आज भी स्वर्ण मंदिर के समीप रामगढ़िया बुंगा (अमृतसर)में मौजूद है।

गुरू जी का प्रारम्भिक जीवन
1. 26 साल तक तपस्या - गुरू जी का जन्म सन् 1621 में अमृतसर में हुआ । यहाँ अब गुरूद्वारा ’’गुरू के महल’’ स्थित है। वह संत स्वरूप व त्यागी स्वाभाव के साथ -साथ तेग (तलवार) के ऐसे धनी थे कि सन् 1634 मेंकरतारपुर के युद्ध में उन्होंने अब अपनी तेग के जौहर दिखाई , रख दिया । इसके पश्चात उन्होंने गाँव बकाला में 26 साल से अधिक तपस्या की । यहां अब गुरूद्वारा ’’बाबा बकाला ’’ स्थापित है।
2. आठवें गुरूद्वारा ,निधन से पूर्व नौवें गुरू का ऐलान - सिखों के आठवें गुरू ,’’ श्री गुरू हरकिृशन जी’’ ,राजा जय सिहं के बुलाने पर दिल्ली आए। उस समय दिल्ली में रोचक , ’महामारी ’ के रूप में फैली हुई थी । गुरू हरकिृशन जी ने यहां अमुतकुण्ड की स्थापना की जिसका जल पी कर लोग ठीक होने लगे । राजा जय सिंह के जिस बंगले में गुरू हरकिृशन जी ठहरे थे इस जगह अब गुरूद्वारा ’’बंगला साहिब’’ है। इसके परिसर में बने अमृतकुण्ड का जल , आज भी लोग श्रद्धा से पीते हैं।

गुरूद्वारा बंगला साहिब ,जय सिहं रोड दिल्ली
सन् 1664 में गुरू हरकिृशन जी दिल्ली में ही ज्योति-जोत समा गये(उनकी मृत्यु हो गई )। उस समय जब सिखों ने उनसे अगले उत्तराधिकारी के बारे में पूछा ,तो उन्होंने बस यही कहाः-’’बाबा बकाले’’। इसका अर्थ था कि सिखों के अगले व नौवें गुरू बकाला ,(पंजाब) नामक स्थान में हैं। परन्तु किसी को यह पता नही था कि अगले गुरू कौन हैं?इसका फायदा उठाकर 22 ढ़ोगी ,बकाला में गुरू बन कर बैठ गए।
3. गुरू तेग बहादुर जी का दुनिया के आगे प्रकट होना -उन दिनों ’मक्खन शाह लुबाना ’ एक बहोत बड़ा व्यापारी था । एक बार वह जहाज में हजारों का माल भर कर विदेश से वापिस लौट रहा था कि समुद्र में तूफान आ गया । बचने की कोई उम्मीद नहीं दे रही थी । मक्खन शाह सिख गुरूओं का बहुत श्रद्धालु था। उसने आंखे बन्द की और प्रार्थना करने लगा:- ’’हे अंतर्यामी गुरू, मेरे डूबते जहाज को बचाओ । मै 500 सोने की मोहरें (सिक्के) आपको भेंट करूंगा । मक्खन शाह की सच्चे दिल से की हुई प्राथर्ना सुनी गई । मक्खन शाह का जहाज बच गया और सारा सामान सुरक्षित पहुँच गया। सामान गोदामों में सम्भाल कर वचन निभाने के लिए मक्खन शाह ’ बकाला ’ पहुँचा। वहाँ पहुँचकर उसने देखा कि कई ढा़ेंगी ,गुरू बनकर बैठे हैं। वह समझ न सका कि असली गुरू कौन है ? वह एक-एक करके उन सबके पास गया , सीस झुकाता और दो-दो सोनें की मोहरें भेंट करता गया । सब उसे आर्शीवाद देते पर किसी ने भी उससे 500 सोने की मोहरों वाली बात नहीं की । जिस कारण वह संतुष्ट नहीं हुआ। उसे विश्वास था कि अंतर्यामी गुरू जिन्हौने डूबते जहाज को बचाया है , उसके दिल की बात जान लेगें । किसी ने बताया कि एक महापुरूष ’’बाबा तेगा जी ’’ भी अंधेरी कोठरी में बैठते हैं व तपस्या में ही लीन रहते है मक्खन शाह उनके भी पास पहुंच गया । दो मोहरें रख कर सीस झुकाया । गुरू जी स्वयं दीन दुनिया के मालिक , व मोह माया से दूर थे। परन्तु लोगों के मन में चल रही असली गुरू की शंका को दुर करने के लिए उन्हौने नेत्रा खोले और बोलेः-’’आओ मक्खन शाह जी ! वायदा किया 500 मोहरों का और भेंट सिर्फ 2’’। यह सुनकर मक्खन शाह की आंखे भर आई और वह गदगद हो गया । छत पर चढ़ कर खुशी से जोर-जोर से पुकारने लगाः- ’’गुरू लाधो रे, गुरू लाधा रे।’’ असली और नकली गुरू की पहचान हो गई थी । बाकी के झूठे गुरू अपना बोरी - विस्तर उठाकर भाग गए। गुरू तेग बहादुर जी को नौवें गुरू का सम्मान सौंपा गया । इश्के पश्चात् उन्होंने मालवा ,बिहार , यू0 पी0 , बंगाल ,असम आदि का भ्रमण किया व गुरू नानक देव जी के उपदेशों को लोगों तक पहुंचाया । गुरू तेग बहादुर जी की शहीदी के पश्चात् उनके पुत्रा बालक गोबिन्द राय को दसवां गुरू बनाया गया । दसवें गुरू ने अपने जीवन काल में अनेक युद्ध लड़े । दुनिया के इतिहास में हुई हर जंग का जहां मुख्य कारण है -जन (औरत),जर (पैसे) या जमीन रहे है ,गुरू गोबिन्द जी की हर लड़ाई जुल्म व अन्याय के विरूद्ध और असहाय की मदद के लिए थी।

हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार को रोकने तथा भविष्य में किसी भी धर्म के असहाय व कमजोर की मदद के लिए गुरू गोबिन्द ने सन् 1699 में बैसाखी के दिन ’’खालसा पंथ ’’ की स्थापना की जिसके बाद वह स्वयं ’’गोबिन्द राय ’’ से ’’गोबिन्द सिहं’’ कहलाए। उन्होंने ’’सिखों’’ को पूरे केश व पगड़ी के साथ एक अलग पहचान दी ,ताकि किसी भी व्यक्ति को अगर सहायता की जरूरत हो,तो वह सिखों को पूरे केश व पगड़ी से पहचान कर उनसे मदद मांग सके ।

यह ऐतिहासिक गुरूद्वारा दिल्ली के चाँदनी चैक में स्थित है। इसका निर्माण सिखों के नौवें गुरू, तेजबहादुर जी की पुण्य स्मृति में किया गया हैं। गुरू जी को मुगल बादशाह औरंगजेब के हुक्म से यहां शहीद किया गया था ।

सिखों के लिए पगड़ी आज भी आन बान व सान की प्रतीक है । यह पगड़ी जहां एक तरफ गौरवमई पहचान कायम करती है ,वहीं यह अहसास भी दिलाती है एक उँची परम्परा तथा विशाल विरसे के वारिस होने की । साथ ही यह एक जिम्मेवारी भी देती है, जरूरतमंद की सहायता करने की और गुरू जी के हुक्म अनुसार एक सच्चा और उँचा जीवन जीने की जिस पर हर कोई नाज कर सकता है । ’’सिखों’’ को समाज की सेवा एवं दूसरों की सुरक्षा का प्रतीक मानते हुई कि हर हिन्दू परिवार का बड़ा बेटा सिख बने। यह परम्परा सालों तक भारत में निभाई गई लेकिन दुर्भाग्यवश आज लोग इसे भूलते जा रहे हैं । ’’खालसा पंथ’’ की स्थापना , त्याग और बलिदान पर आधारित है। इसकी मिसाल इस बात से मिलती है कि गुरू गोबिन्द सिेह जी के चारों बेटों ने देश व धर्म की खातिर अपनी जान न्योछावर कर दी। दो बड़े बेटे , ’’साहिबजादा अजीत सिंह व जुझार सिंह ’’ चमकौर की लड़ाई में शहीद हुए । दो छोटे बेटे , ’’साहिबजादा अजीत सिहं व जुझार सिंह’’ चमकौर की लड़ाई में शहीद हुए। दो छोटे बेटे ,’’साहिबजादा जोरावर सिंह व फतेह सिंह ’’ अपनी दादी ’’माता गुजरी जी ’’ के साथ ’’सरहिन्द ’’ में 24,25,26 दिसम्बर की कड़कती ठंड में ’’ठंडे बुर्ज’’ में कैद किए गए । जब छोटेसाहिबजादों को नवाब वजीर खान के सामने पेश किया गया तो उन्हें इस्लाम कुबूल करने के लिए अनेक लालच दिए गए । जब उन्होंने किसी कीमत पर अपना धर्म छोड़ना स्वीकार नहीं किया तो नवाब ने उन्हें जिंदा दीवार में चिनवाने का फतवा जारी कर दिया इसके बावजूद साहिबजादों के चेहरे पर किसी भी प्रकार का कोई भय नही था जबकि यह उनकी जिंदगी और मौत का सवाल था।

उसी अदालत में मलेर कोटला के नवाब ’शेर मोहम्मद खान’ भी मौजूद थे। उन्हौने वजीर खान के इस निर्दयी कार्य का भरपूर विरोध किया और कहा कि इस्लाम मासूम बच्चों पर जुल्म की इजाजत नहीं देता । पर वजीर खान ने एक न सुनी और 27 दिसंबर,1705 को इन्हें दीवार में जिदां चिनवा दिया गया । इस खबर को सुनकर दादी ’’माता गुजरी ’’ ने भी प्राण त्याग दिए।

यह बात मन को दहला देती है कि किस तरह 6 और 9 वर्ष के छोटे साहिबजादों ने राजसी ठाठ-बाठ भरी जिन्दगी को ठुकराकर शहादत को गले लगाया परन्तु अपना धर्म नही छोड़ा । अगर ये बच्चे , अपने दादा गुरू तेग बहादुर के सिद्धांतो का पालन न कर पाते तो देश में हिन्दू धर्म की जो स्थिति होती उसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है ।अफसोस है कि आज हिन्दुस्तान के लोग ,25 दिसम्बर को क्रिसमस के लिए तो याद करते है । परन्तु उन्हीं दिनों में इन साहिबजादों पर हुए अत्याचार और शहीदी उन्हें याद नहीं रहती । जब इन साहिबजादों के अतिंम संस्कार का समय आया तो हकूमत ने हूकम जारी कर दिया कि संस्कार के लिए जो जगह चाहिए उतने स्थान पर सोने के सिक्के ’खड़े’ रख कर मोल देना होगा । उस समय गुरू जी के असीम श्रद्धालु ’दीवान टोडरमल’ ने यह मोल देकर वह जगह खरीदी । सरहंद ’पंजाब’ में जहां दोनों साहिबजादों को दीवार में जिंदा चिनवाया गया था, वहां अब गुरूद्वारा फतेहगढ़ साहिब , यादगार के रूप में स्थापित है। दुनिया के इतिहास में आज तक इतनी मंहगी कीमत में जमीन बिकने की ,दुसरी मिसाल नही है ।

कुछ समय बाद गुरू गोविन्द सिंह जी नांदेड़ ’ महाराष्ट्र’ गए जहां उन्होंने ’’माधोदास बैरागी’’ को अमृत पिला कर ’’बन्दासिंह बहादुर ’’ नाम का सिख बनाया जिसने मुगल राज्य की ईट से ईट बजा दी । अपने अंत समय में गुरू गोबिन्द सिंह जी ने ऐलान किया कि उनके पश्चात् ’’गुरू ग्रंथ साहिब ’’ ही सिखों के गुरू होगें।

गुरू ग्रंथ साहिब में सिख गुरूओं के अतिरिक्त अनेक हिन्दू व मुसलमान भक्तों व पीरों की वाणी भी सम्मिलित है। इसमें ईश्वर को कई अलग-अलग नामों से ,जैसे ’’हरि’’ 8344 बार ’’राम’’ 2533 बार व ’’अल्लाह’’ 46 बार, सम्बोधित किया गया है। इसमें एक सच्चे मुसलमान की पहचान भी दी है कि वह एक नरम दिल इंसान होता है-’’मुसलमान मोम दिल होवे’’। गुरू ग्रंथ साहिब सिर्फ सिख धर्म का ही नही, बल्कि सम्पूर्ण मानवता (सांझीवालता) का प्रतीक है। इस बात की पुष्टि देश विदेश के अनेक धार्मिक विद्वानों ने की है।

पर्ल एस बक (नोबल पुरस्कार विजेता)कहती है-मैनें दुनियां के अनेको धर्मिक ग्रंथों का अध्ययन किया है। परन्तु दिल और दिमाग को जो सुकून ’’गुरू ग्रंथ साहिब ’’ से मिलता है,वह और कहीं प्राप्त नही हुआ ।
रिवरैण्ड एच एल बै्रडशा (अमेरिकन क्रिश्चियन इतिहासकार) - सिख धर्म एक विश्व व्यापी आस्था है। यह अधुनिक युग में मनुष्य के दुखोंके निवारण का एक उपाय है।
र्बटैण्ड रूसल्ल (ब्रिटिश तकशास्त्राी)-अगर तीसरे विश्व युद्ध (जो कि एटम व हाइड्रोजन बाॅम्ब युद्ध होगा) के पश्चात् कोई बचता है , तो सिख धर्म ही सबका मार्ग दर्शन करेगा।
आर्चर ,इंगलिश लेखक अपनी किताब में कहते हैं- ’’गुरू ग्रंथ साहिब’’ एक सर्व -व्यापी सत्य व्यवहारिक धर्म है। विश्व को इसके प्यार और शांति के उपदेश की आवश्यकता है ।
अपने गुरूओं से प्रेरणा पा कर ,आज के युग में भी सिख ,उनके दिखाएं त्याग ,शहीदी और निस्वार्थ के मार्ग पर चलना ,अपना धर्म समझतें हैं ।भारत में सिखों की गिनती लगभग 2ः है परन्तु ,चाहे भारत की आजादी की लड़ाई थी या आजादी के बाद देश की सीमाओं की रक्षा, रीड़ की हड्डी बनकर ,सिखों ने देश के लिए हर जंग लड़ी है।

1. 121 भारतीय , जिन्हें अंग्रेजो द्वारा फांसी पर चढ़ाया गया था ,उनमें 93 (76ः) सिख थे ।
2. 2646 भारतीय ,जिन्हें उम्र कैद की सजा दी गई थी, उनमें 2147 (81ः) सिख थे।
इनमें जलियावाला बाग , नामधारी आन्दोलन ,गदर आन्दोलन व अन्य कई स्थानों पर शहीद हुए सिखों के आंकड़े शामिल नहीं है।
इसके अतिरिक्त गुरूओं द्वारा जो मुफ्त लंगर की प्रथा शुरू की गई थी , वह आज भी जारी है। हर रोज लाखों लोंग ,देश -विदेश के विभिन्न गुरूद्वारों में बिना किसी जाति और धर्म के भेदभाव के , मुफ्त भोजन का आनन्द उठाते है। गुरू ग्रंथ साहिब जी का भी यही उपदेश है कि इस जगत में एक ही परमात्मा है व सभी उस परमात्मा के बन्दे है (व्यक्ति) हैं। इसीलिए हर रोज सिख ’’ सरबत के भले ’’ अर्थात सभी के कल्याण के लिए गुरू ग्रंथ साहिब केहिन्दू धर्म की रक्षा के लिए दी गई शहीदी की महान गाथा
गुरू तेग बहादुर
प्रस्तावना

सिख पंथ की स्थापना लगभग 540 वर्ष पूर्व, गुरू नानक देव जी द्वारा की गई । उस समय इंसान पूर्ण रूप से कुरीतियों, वहमों व अंधविश्वास से ग्रसित था। गुरू नानक ने इन बातों का विरोध किया व तीन नियमों को जीवन में ढालने पर जोर दिया 1. नाम जपना - ईश्वर का सिमरन करना 2. किरत करनी - जीवन का निर्वाह मेहनत व ईमानदारी से करना 3. वंड छकना - मिल बांट कर खाना । गुरू नानक , हिन्दू व मुस्लिम दोनों के इतने प्रिय थे कि उनके देहान्त के पश्चात , हिन्दुओं ने उनकी याद में समाधी व मुस्लमानों ने मजार बनाई जो आज भी कतारपुर (पाकिस्तान) में एक ही परिसर में बनी हुई है । इस स्थान पर आज भी नमाज पढ़ी जाती है और गुर्बानी कीर्तन होता है।

उस समय हिन्दुस्तान पर मुगलों का राज था। वक्त के साथ मुगल शासक इतने क्रुर हो गए कि उन्होंने हिन्दूओं पर जुल्म करने शुरू कर दिए । औरंगजेब के शासन में हिन्दूओं के धार्मिक चिन्हों (जनेऊ चोटी , इत्यादि) को काटकर अपमानित किया जाने लगा । उसका हुक्म था कि हिन्दूओं को जबरदस्ती मुस्लमान बना दिया जाए । सब तरफ त्राहि-त्राहि मची हुई थी और लोगों का मनोबल समाप्त हो गया था इस जुल्म से मुक्ति देने तथा हिन्दूओं का खोया हुआ सम्मान वापिस दिलाने के लिए सिक्खों के नौवें गुरू ’तेजबहादुर जी ’ ने चाँदनी चैक (दिल्ली) में अपनी शहीदी दी। बाद में दसवें गुरू ’गोबिन्द सिंघ जी ने भक्ति व शक्ति का मेल करते हुए सन् 1699 में ’खालसा’ की सृजना की और सहमे , हताश तथा मुर्दा हो चुके समाज में नई उमंग भर दी । उन्हौंने खालसा को पुरे केश तथा पगड़ी के साथ एक अलग पहचान दी ताकि कोई भी व्यक्ति सहायता के लिए , खालसा को दूर से पहचान कर उससे मदद मांग सके और फरमान किया -

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