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One shrine to the next, the hermit can't stop for breath. Soul, get this! You should have looked in the mirror. Going on a pilgrimage is like falling in love with the greenness of faraway grass.     Lala Ded

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Data Bhe Apse Daan Chahta hai दाता भी आपसे दान चाहता है


कहते हैं, एक बार बर्फ के पहाड़ को जोरों से प्यास लगी। उसने अपना शिखर झुकाकर नीचे के ओर झांका। मैदान में एक निर्मल नदी बहती दिखाई दी। झागदार.... मोतियों जैसे बुलबुलों से सजी हुई.... जलधारा। उसे देखते ही पहाड़ झट नीचे उतर आया और उससे जल के लिए आग्रह किया।
    नदी भावविभोर हो उठी, बोली प्रभु! यह कैसी बात करते हैं? आप ही तो मेरे जल के òोत हैं। आप ही ने मेरे सूखे तल में रस की धारा बहाई है। फिर भला मैं कौन हूँ आपको जल देने वाली? पहाड़ ने अपनी हिमाच्छादित चोटी की ओर इशारा किया, बोला- यह गौर और धवल शिखर देख रही हो? इसका जल जमा हुआ, ठोस और धनीभूत है। यह प्यास नहीं बुझा सकता..... पर सरिते, जब इसे तुम्हारे तप्त तल का स्पर्श मिलता है तो यह लहरा उठता है, आनन्द की धारा बह निकलती है। फिर तो वह अमृत बन जाता है। वही प्रसाद पाने के लिए तो हम अपनी ऊंचाई छोड़ कर तुम्हारे तीर पर आए हैं। 
    भगवान भी प्रेम रस के हिमालय हैं। उन्हीं में प्रेम की गंगोत्राी है। उनसे जो प्रेम निकला है, वही भक्त हृदय में पावन गंगा बनकर बहता है। इसलिए अगर हिमालय न होता, तो गंगा भी नही होती। अगर भगवान न होते, तो भक्ति भी न होती। प्रेम न होता, तो भाव न होते। मगर यह प्रेम का सिर्फ एक पक्ष है, दूसरा पक्ष भक्तों के पास है। अगर भक्त न होता तो भक्ति व्यक्त कैसे होती? अगर भक्त का व्याकुल हृदय तृप्त न होता, तो प्रेम इतना सरल कैसे हो पाता? यह भक्त की आहों की गर्मी ही तो है, जिसकी छुअन से प्रभु का मन भी तरंगायित हो उठता है। इतना कि स्वयं वह प्रेम की भिक्षा पाने कभी गोकुल के तीर आता है तो कभी शबरी के बेरों का अत्यंत रुचि से भोग लगता है। दाता स्वयं भिखारी बन बैठता है।
    कहते हैं कि एक बार नारज जी प्रभु श्रीकृष्ण के धाम पहुँचे। दर्शन के अभिलाषी थे। इसलिए तेजी से प्रभु के कक्ष में प्रवेश करने लगे। पर तभी द्वारपालों ने रास्ता रोक दिया, बोले प्रभु पूजा में रत हैं, किसी को भी व्यवधान डालने की अनुमति नहीं है। नारद बोले-नारायण, नारायण! जो सबके पूज्य हैं वही पूजन कर रहे हैं। रास्ता छोड़ो संतरियों! मैं तुम्हारे इस फुसलावे से नहीं बहलने वाला। पर संतरियों ने उन्हें आगे नहीं जाने दिया। कुछ देर बाद जब प्रभु ने कक्ष के कपाट खोले, तो नारद ने शिकायत की, भगवान्! द्वारपालों ने मुझे यह कहकर भीतर जाने से रेाक दिया कि आप पूजा में रत हैं। प्रभु ने कहा, पर यह सत्य है नारद!
    नादर की उत्सुकता और बढ़ी, आप और....? प्रभु मुस्कराए, क्या देखना चाहोगे कि हम किनकी आराधन में लगे थे? आओ, भीतर आओ। भीतर एक पुष्पमंडित पालने में अनेक छोटी-छोटी प्रतिमाएं झूल रही थीं- कुछ प्रतिमाएं गोकुल की गोप मंडली की, कुछ गोपियों की.... एक अर्जुन की, एक द्रौपदी की। नारद ने उलझन भरी आँखों से प्रभु को निहारा। कृष्ण ने नारद के हृदय की बात समझ ली, फिर समझाने वाले भाव में बोले- मुझे बताओ नारद भक्त मेरी आराधना क्यों करते हैं? क्योंकि वे मुझसे मेरा प्यार चाहते है। ठीक इसी प्रयोजन से हम भी भक्तों की आरधना करते हैं। हम भी भक्त से उसका प्रेम मांगते हैं। प्रेम का यही महादान पाने के लिए हम निराकार से साकार होकर आते हैं। कितनी गहरी बात है। सच ही तो है, आप निराकार की उपासना कर सकते हैं। निराकार पर ध्यान एकाग्र कर सकते हैं, उसमें विलीन हो सकते हैं। पर आप निराकार को प्रेम नहीं कर सकते। आपसे आपका यही हृदय मांगने के लिए निराकार भगवान को अवतार के रूप में साकार होकर आना पड़ता है। वे मधुर मुरली बजाते हैं। वही मुरली उनके प्रेम की पुकार है।