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One shrine to the next, the hermit can't stop for breath. Soul, get this! You should have looked in the mirror. Going on a pilgrimage is like falling in love with the greenness of faraway grass.     Lala Ded

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Veer Chandergupt वीर चन्द्रगुप्त

वीर चन्द्रगुप्त
समुद्रगुप्त भारत के महान् सम्राट थे। उनकी शूरवीरता के कारण शत्राु थर-थर कँापते थे। दुर्भाग्य से उनके पुत्रा इतने शूर वीर नहीं थे। समुद्रगुप्त की मृत्यु के पश्चात् उनके ज्येष्ठ पुत्रा रामगुप्त ने शासन सँभाला। रामगुप्त को शासन उत्तराधिकार में मिला था, अतः वह राज्य की कद्र नहीं जानता था। वह कभी राजप्रासाद नहीं जाता था। हमेशा रास-रंग व रानियों के साथ मौज-मस्ती में डूबा रहता था। रामगुप्त की पटरानी धु्रव देवी अत्यन्त सुंदर थी, उसके सौंदर्य की ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। 
समय के साथ रामगुप्त की अपने शासन पर पकड़ नहीं रही। शत्राुओं को भी यह ज्ञात हो चुका था कि नया राजा आलसी है। शक जाति, गुप्त शासकों की घोर शत्राु थी, किन्तु समुद्रगुप्त की वीरता के कारण उनमें साहस न था। अब रामगुप्त के शासन में वैसी नहीं थी। अतः उन्होंने अपनी सेनाएँ एकत्रा कर के रामगुप्त की राजधानी पाटलीपुत्रा पर हमला कर दिया। कुशल नेतृत्व एवं दूरद£शता के अभाव में उसकी सेनाएँ शकों के सामने टिक न सकीं और शकों ने राजधानी पर अधिकार कर लिया। रामगुप्त को बंदी बना कर शकों के राजा दैत्यदमन के समक्ष लाया गया। जब दैत्यदमन ने उसे मृत्यु-दण्ड का आदेश दिया, तब वह कायरों की भांति जीवन दान माँगने लगा। दैत्यदमन की दृष्टि पहले ही, धु्रव देवी पर थी, अतः उसने जीवन-दान देने के बदले में धु्रव देवी को मांग लिया। यह सुन कर रामगुप्त को क्रोध आ गया, किन्तु वह असहाय था, अतः अनिच्छा से उसे अपनी पत्नी देने को सहमत हो गया।
दैत्यदमन खुशी-खुशी अपने शिविर में लौट आया। उधर जब धु्रव देवी को इस वार्तालाप का ज्ञान हुआ, तो उसने अपने पति को धिक्कारा, किन्तु रामगुप्त कायरों की भांति चुप रहे। यही बात जब छोटे भाई चन्द्रगुप्त को ज्ञात हुई, तो उसने वंश की रक्षा के लिए कमर कस ली। उसने धु्रव देवी को आश्वासन दिया कि आपकी जगह मैं वहाँ जाऊँगा।
अगले दिन उसने महारानी की तरह वस्त्रा पहन कर, अपना चेहरा घूंघट मंे छिपा लिया। चन्द्रगुप्त के चुने हुए वीर सैनिकों ने भी स्त्रिायों के कपड़े पहन लिए। शक राजप्रासाद में महारानी और उसकी दासियों का भव्य स्वागत किया गया। राजप्रासाद में प्रवेश करते ही चन्द्रगुप्त और उनके साथियों ने स्त्रिायों के कपड़े उतार कर, म्यानों से तलवारें निकाल ली। घमासान युद्ध छिड़ गया। अपने शौर्य एवं पराक्रम से उनकी विजय हुई। चन्द्रगुप्त ने दैत्यदमन का सिर धड़ से अलग कर गुप्त वंश के सम्मान की रक्षा की। यही वीर चन्द्रगुप्त, सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय के रूप में विख्यात हुआ तथा इसे ही विक्रमादित्य की उपाधि प्राप्त हुई थी।