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One shrine to the next, the hermit can't stop for breath. Soul, get this! You should have looked in the mirror. Going on a pilgrimage is like falling in love with the greenness of faraway grass.     Lala Ded

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Mai Vastvikta se Kyu Bhagu मैं वास्तविकता से क्यों भागूँ ?

यक्ष ने युधिष्ठिर सर पूछा- " आश्चर्य क्या है।"

युधिष्ठिर ने जबाब दिया- " यहां इस लोक से जीवधारी प्रतिदिन यमलोक को प्रस्थान करते हैं, यानी एक-एक कर सभी की मृत्यु देखी जाती है । फिर भी जो यहां बचे रह जाते हैं वे सदा के लिए यहीं टिके रहने की आशा करते हैं । इससे बड़ा आश्चर्य भला क्या हो सकता है ? "

आखिर क्यों है ऐसा? क्यों भूले रहते हैं हम अपनी मृत्यु को? आखिर क्यों नहीं हमारे ध्यान में रहता कि हम भी एक दिन चले जायेंगे इस दुनिया से? कोई उपाय नहीं है इसका की हम रह सकें सदा के लिए इस दुनिया में। आखिर इस सच्चाई से हमें इतना इनकार क्यों है? क्यों हम झुठलाने की कोशिश करते हैं इस सच्चाई को।

मृत्यु सत्य है, जो क़ुछ भी बना हुआ है उसका ध्वंस निश्चित है। जो क़ुछ भी पैदा हुआ है, उसकी मृत्यु निश्चित है। जो ध्रुव सत्य है, उस ध्रुव सत्य से इतना इनकार क्यों?

हम भूले रहते हैं अपनी मृत्यु को। भूले रहते हैं अंतिम दिन तक, अंतिम क्षण तक, ऐसा क्यों?

ऐसा इसलिए कि हमने इसे भुलाने की कोशिश की है।

बचपन से ट्रेनिंग है हमारी, मृत्यु के बारे में बात नहीं करनी है, मृत्यु का नाम नहीं लेना है, मृत्यु शब्द का उच्चारण नहीं करना है।

जब मृत्यु हो जाती है, चार आदमी कंधे पर उठाते हैं और कहते हैं, राम नाम सत्य है। बड़ी अच्छी बात है, बड़ी सच्ची बात है कि राम नाम सत्य है। अब आप काम कीजिए एक, जहाँ चार लोग बैठे हुए हों, आप अचानक से एक बार बोल दीजिए, राम नाम सत्य है, नतीजा देख लीजिए फिर, सब के सब आप पर गुस्सा हो जाएंगे।अब देखिए आपने कही बिल्कुल सही बात, राम का नाम लिया फिर भी सब के सब गुस्सा। आस्तिक भी गुस्सा, नास्तिक भी गुस्सा, सबके सब गुस्सा क्योंकि कहीं न कहीं आपने उन्हें अपने मृत्यु की याद दिला दी है, मृत्यु जिसे कोई याद भी नहीं करना चाहता।

मृत्यु की घटना वैराग्य उतपन्न करती है। श्मशान में बैठे हुए आदमी के मन में एक क्षण को वैराग्य आता ही है और हमारी समस्या है कि हम विरक्त नहीं होना चाहते है, हम अनुरक्त रहना चाहते हैं। हम वास्तविकता से भागना चाहते हैं।

अगर कोई आदमी अपने साम्राज्य का विस्तार कर रहा है, रोज़ नए राज्य जीत रहा है और उसे अपने राज्य में मिला रहा है, अगर उसे याद आ जाए मृत्यु ध्रुव सत्य है तो उसे फिर यह भी याद आ जाएगा कि यह सारा साम्राज्य यहीं रह जायेगा, ये महल, ये अट्टालिकाएं, ये दास, ये दासियाँ सब यहीं रह जायेंगे तो फिर सब गड़बड़ हो जाएगी न। उनका खेल गड़बड़ हो जायेगा न। हम सभी ये चाहते हैं कि हमारा खेल गड़बड़ न हो अतः हमने कोशिश किया है, मृत्यु को हर सम्भव भुलाने का, मृत्यु के बारे में बात ही नहीं करने का।

हम अनुरक्त रहना चाहते हैं, हम भोगों में लिप्त रहना चाहते हैं, जीवन के अंतिम क्षण तक भोगों में लिप्त रहना चाहते हैं।जब हम शारिरीक रूप से भोग में असमर्थ हो जाते हैं तो हम मानसिक रूप से भोग में लिप्त रहना चाहते हैं। हम मिठाई खाना चाहते हैं, डायबिटीज हो गई अब,मिठाई खा नहीं सकते तो अब मिठाई के बारे में सोचते हैं, मिठाई देखकर राल टपकाते रहते हैं, मानसिक रुप से मिठाई खाते रहते हैं। हकीकत यह है कि जब आदमी शारिरीक रूप से मिठाई खाने में समर्थ था तो वह क़ुछ कम मिठाई खाता था, जब शारिरीक कारणों से उसने मिठाई खाना छोड़ दिया तो अब वह मानसिक रूप से और भी ज्यादा मिठाई खा रहा है, मिठाई में वह पहले से भी ज्यादा क़ुछ उलझ चुका है, लिप्त हो चुका है।

हम लिप्त रहना चाहते हैं, अनुरक्त रहना चाहते हैं अतः मृत्यु से हमारा विरोध है, मृत्यु को हम याद नहीं रखना चाहते, मृत्यु को हम भूले से भी अपने मस्तिष्क में नहीं लाना चाहते।

सत्य से भागना समाधान नहीं है। शांति तो सत्य को स्वीकार करके ही, सत्य मार्ग पर चलकर ही प्राप्त किया जा सकता है।

जीवन में अशांति है?क्यों? क्या परमात्मा ने हमें अशान्त बनाया है? परमात्मा ने पेड़ों पर चहचहाते हुए पक्षियों को अशांत नहीं बनाया, नाली में रेंगते हुए कीड़ों को अशांत नहीं बनाया फिर हमें ही क्यों अशांत बना देगा। यह सारी अशांति जो हमारे जीवन में है, कहीं न कहीं हमारी खुद की सृजित है। आपाधापी जो जीवन में इतनी है, कहीं न कहीं यह खुद की सृजित की हुई है। पेड़ों पर बैठे हुए पक्षियों के जीवन में आपाधापी नहीं है, नाली में रेंगते हुए कीड़ों के जीवन में आपाधापी नहीं है, फिर हमारे ही जीवन में इतनी आपाधापी क्यों?

यह आपाधापी, यह अशांति, यह सारा क़ुछ जीवन में इसलिए है कि हमारा मृत्यु से विरोध है। हम मृत्यु को अपने मस्तिष्क में लाना ही नहीं चाहते। हम मृत्यु को अपने अंतिम क्षण तक भी स्वीकार नहीं करना चाहते।

आज अगर हमने मृत्यु को स्वीकार कर लिया, मृत्यु की वास्तविकता को स्वीकार कर लिया तो फिर सारी अशांति तत्क्षण खत्म, सारी आपाधापी तत्क्षण खत्म, सारा अवसाद तत्क्षण खत्म।

अगर हमने अपने स्वस्थ मस्तिष्क से मृत्यु को स्वीकार कर लिया, मृत्यु एक वास्तविकता है-इसको स्वीकार कर लिया तो फिर आपाधापी ख़तम, शान्ति फलित होती है। अवसाद खतम, सुख फलित होता है। आपाधापी खत्म, निष्काम कर्म फलित होता है। हम एकदम शांत चित्त, अवसाद रहित होकर अपने जीवन के सारे कर्म सम्पादित करते हुए परमात्म तत्व की प्राप्ति के तरफ अग्रसर होते हैं।

अगर हमने मृत्यु को अपने स्वस्थ मस्तिष्क से स्वस्थ भावना के साथ स्वीकार कर लिया तो फिर घृणा खतम, प्रेम फलित होता है। प्रेम जो परमात्मा तक पहुंचने का मार्ग है, वह उज्वल- उन्नत प्रेम, फलित होता है और परमात्मा की प्राप्ति के दरवाजे उस मनुष्य के लिए खुल जाते हैं।