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One shrine to the next, the hermit can't stop for breath. Soul, get this! You should have looked in the mirror. Going on a pilgrimage is like falling in love with the greenness of faraway grass.     Lala Ded

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शुद्ध, पवित्र और पोषित करना

जबलपुर भेड़ाघाट में एक श्लोक का जप करते हुए एक युवा आदमी ने एक गहरी साँस ली, अपनी नाक दबाई और नदी में डुबकी लगा दी। कुछ पल में वह पानी के ऊपर आ गया, और नर्मदा के तट पर घाट की सीढ़ियों पर चढ़ने लगा। जिज्ञासा से, मैं उसके पास गया और उससे पूछा कि वह क्या जप कर रहा था।

उसने कहा, यह ऋग्वेद से पानी की स्तुति में एक भजन था: “यप्पो दिव्या उत्वा स्रवंती या स्वयं जा/समुद्रार्थ या सूचयापावकास्त आप देवी इहा ममवन्तु”- जल निकाय जो स्वर्ग से आते हैं और जो खुदाई के बाद प्रवाहित होते हैं, और वह भी जो स्वयंमेव फूटते हैं, उज्जवल शुद्ध जल जो समुद्र की ओर बहा दिया जाता है, कदाचित ये दिव्य जल इस दुनिया में मेरी रक्षा करें।”  उसने व्याख्या के माध्यम से आगे कहा: "मंदिर में जाने से पहले, मैं हमेशा नदी में स्नान करता हूँ। जब मैं भगवान के सामने स्वयं को प्रस्तुत करता हूं, मैं निर्मल, स्वच्छ महसूस करना चाहता हूँ।"

हिंदुओं में जल को एक देवी के रूप में माना गया हैं। जैसे हम हमारे देवी देवताओं की कृपा पर निर्भर हैं, वैसे ही पानी की कृपा पर हैं।

शायद यही कारण है कि अधिकांश हिंदू तीर्थस्थल जल निकायों के करीब स्थित हैं। लेकिन फिर भी, सभी प्रमुख सभ्यताएं प्रबल नदियों के किनारे विकसित हुईं। जबलपुर में दुर्गा मंदिर के रघुनंदन कुमार गोस्वामी कहते हैं, "जल सृजन करता है और जीवित रखता है। जल व्यक्तिगत शुद्धिकरण के लिए प्रयोग किया जाता है।  इसलिए हम परंपरा का पालन करते हुए, अपने हाथ और पैर धोने के बाद ही पूजा कक्ष या मंदिर में प्रवेश करते हैं।"

 

जल के शुद्ध, पवित्र और पोषित करने वाले गुण विभिन्न धर्मों, आस्थाओं और संस्कृतियों में विभिन्न तरीक़ों से प्रकट होते हैं। ज़्यादातर लोगों ने, एक प्रचंड ऐतिहासिक बाढ़ को पृथ्वी की सफ़ाई और पुनःसृजन की स्थितियां बनाने से संबंधित माना है, ताकि वह ज़िंदगी को फिर से शुरू कर सके। अधिकांश रीति-संस्कार, जैसे जन्म, विवाह और मृत्यु में जल एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

जल आंतरिक रूप से दीक्षा से जुड़ा हुआ है; यह ईसाइयों और सिखों के बीच आस्था की सार्वजनिक घोषणा है। ईसाइयों का मानना है कि एक व्यक्ति में वास्तविक परिवर्तन दीक्षा (बैप्टिज़्म) से होता है - मूल पाप के दाग़ व्यक्ति से धो दिए जाते हैं; वह पाप जो हमें भगवान से अलग करता है। फ़ादर जॉन फिलिपोस, कैलिकट स्थित बस्ती के एक पुरोहित कहते हैं "जैसे हमे आध्यात्मिक रूप से जीवित रहने के लिए भगवान की आवश्यकता है, वैसे ही शारीरिक रूप से जीवित रहने के जल की आवश्यकता हैं।

सिख खालसा में अमृत चखना समारोह में पांच खालसा सिखों और गुरु ग्रंथ साहिब की उपस्थिति में एक कटार से मिलाया हुआ अमृत या शक्कर का पानी पीना शामिल है।

इस्लामी विद्वान मौलाना वहीदुद्दीन खान कहते हैं, "इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार, पानी दिव्य ईनाम में से एक है और क़ुरान में इसका संदर्भ 63 बार उल्लेखित है। बारिश के रूप में, पानी दिव्य आध्यात्मिक प्रेरणा का प्रतीक है।" मुसलमान दो प्रकार के प्रक्षालन का पालन करते हैं: जुमा (शुक्रवार) और ईद की नमाज़ से पहले शरीर का ग़ुस्ल या उसकी धुलाई। दफ़न के पहले ग़ुस्ल किया ही जाना चाहिए। वुजु रोज़ाना की प्रत्येक पाँच नमाज़ों के पहले की जाती है। इसमें, चेहरा, हाथ-पाँव, कलाइयाँ और तलवे धोने और पानी से सिर थपथपाना शामिल है।

यहूदी धर्म में, अनुष्ठान-पवित्रता की अवस्था बनाए रखने के लिए धार्मिक स्नान का प्रयोजन होता है। ये प्रक्षालन ‘जीवंत या बहते हुए पानी’ में किए जाने चाहिए। अगर, शिन्तोइज़्म (Shintoism) में, झरनों को पवित्र माना जाता है और उनके नीचे खड़ा होना शुद्ध करने के लिए माना जाता है, तो पारसी भी प्रार्थना, धार्मिक अनुष्ठानों और शादियों से पहले रीतिगत प्रक्षालन करते हैं। बौद्धगण हाथ, पैर, चेहरे और मुंह की रस्मी तौर पर सफ़ाई के लिए पानी का उपयोग करते हैं। वे महासागरों का संदर्भ लेते हुए अंत्येष्टियों में पानी डालते हैं, जो अनंतता का प्रतीक होता है।

प्रकृति का यह बेरंग, निराकार तत्व आसानी से सभी शुद्धि अनुष्ठानों के अनुरूप ढल जाता है।  समधर्मी तालमेल की भावना या जैसा कि हम इसे पुकारते हैं, इन्दुत्व में जल, अनुकूलनशीलता और निस्वार्थता, जीवन का प्रतिज्ञान और सार्वभौमिकता के लिए एक आदर्श रूपक है।

(रंजेनी ए सिंह)