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One shrine to the next, the hermit can't stop for breath. Soul, get this! You should have looked in the mirror. Going on a pilgrimage is like falling in love with the greenness of faraway grass.     Lala Ded

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व्यवहार

बाहर से देखने में सभी मनुष्यों की बौद्धिक और सांस्कृतिक उच्चता नापने की कसौटी उसका व्यवहार ही है। सभ्य -असभ्य शिष्ट-अशिष्ट, सुस्कृत - असुस्कृत व्यक्ति में व्यवहार का ही अंतर होता है। व्यवहारकुशल व्यक्ति आकर्षक का केन्द्र होता है, प्रतिष्ठा का पात्र होता हैं इसके विपरीत असभ्य व्यक्ति, अपने व्यवहार के कारण अनादर पाता है। मुंह के सामने भले ही कोई कुछ न बोले, किन्तु पीठ पीछे सभी उसे अभ्रद, अशिष्टभाषी इत्यादि बोलते ही हैं। सुकरात विश्व के महान विचारक थे । एक दिन सभा में भाषण दे रहे थे बहुत से लोग श्रोता बने उनके उपदेश सुन रहे थे। इतने में एक उज्जड ईष्र्यालु व्यक्ति श्रोताओं में से उठा और सुकरात के पास जा कर उनकी पीठ पर जोर से लात मारी। अजीब ही दृश्य था, जनता क्रोध से उन्मुक्त थी, अभद्र व्यक्ति को जान से मार डालना चाहती थी। विचारक सुकरात ने सबको शांत किया। जब सब लोग बैठ गए तो अपनी बात फिर वहीं से शुरु कर दी जहो से छूट गई थी। लोग बार-बार पुछने लगे इस दुष्ट को सजा क्यों न दी जाए? सुमरात को अब इस विषय पर बोलना ही पड़ा । शांतिपूर्वक उन्होंने जवाब दिया - कोई गधा हमें लात मारता है तो क्या हमारे लिए यह उचित है कि हम भी उसे लात मारें ? यह भी सच है कि कितने ही पशुओं में मनुष्यत्व और देवत्व देखने को मिलता है। दूसरी तरफ, बहुत से मनुष्यों में पशुत्व दानत्व छिपा रहता है। व्यवहार से ही  जाना जाता है कौन भद्र है कौन अभद्र । बाहरी कपड़ों वेश-भूषा, आधुनिक या फैशनेबुल होने से ही कोई तब तक शिष्ट नही हो सकता, जब तक उसका व्यवहार अच्छा न हो।

मधुमन्मे निक्रामणं मधुमन्मे परायणम्।

वाचा वदामि मधुमद् मूयासं मधुसंदृशः ।।

जिनके व्यवहार क्रिया और सम्भाषण में मधुरता होती है उन्हें सभी प्यार  व आदर देते हैं। संसार में शुभ कर्म एवं उपकार वही करते है, जिनका स्वभाव मधुर होता है अतः शिष्टता हमारी प्रथमिक आवश्यकता है। कर्म, वाणी , व्यवहार, पोशाक और सामाजिक जीवन में दूसरों की सुख-सुपिधा का ध्यान हमारी शिष्टता की कसौटी है। शिष्टचार ही सामाजिक जीवन में सफलता की सीढ़ी है। परस्पर प्रेम, सद्भाव, नेह, नाता और उतम सम्बन्धों का मूल सद्व्यवहार ही है।

 मधुमतीरोषधीद्र्याव आपो मधुमन्नो भवत्वन्तरिक्षम।

क्षेत्रास्य पतिर्मधुमान्नों असत्वरिष्यन्तों अन्वेनं चेरम्।।

दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करें जैसा हम  दुसरों से अपेक्षा करते हैं। उतम पदार्थों का पिनियम ही सच्ची नीति है। भक्ति, प्रेममय व्यवहार का ही दूसरा नाम है, ज्ञान , बल, धन-सम्पति की सार्थकता, मानवोचित सभ्य व्यवहार पर निर्भर है। धर्म की श्रेष्ठता भी तभी है, जब वह हमारे दैनिक व्यवहार से प्रगट हो। हम दैनिक व्यवहार को सत्यम् शिवम् और सुन्दरम् बनाएं।

                                                      कीर्ति अवस्थी