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One shrine to the next, the hermit can't stop for breath. Soul, get this! You should have looked in the mirror. Going on a pilgrimage is like falling in love with the greenness of faraway grass.     Lala Ded

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जूही वृक्ष

मेरे आंगन में कोलाहल भरा गगन- जूही का एक वृक्ष
    मेरे आंगन में एक लंबा, छरहरा पेड़ था। उसकी आदत ऐसी थी कि वह सीधा ऊपर उठता चला जाता। न इधर देखता, न उधर और उसके तने के ऊपरी हिस्से में हरी-भरी डालियां उगतीं। वे डालियां भी रईस बाप की बेटियों की तरह सिर तानकर ऊपर ही देखती रहतीं, नीचे झुकने का नाम न लेतीं। और इन घमंडी डालियों के ऊपर बहुत नाजुक, लंबे से सफेद फूल उगते। इतने सुवासित कि दस दिशाओं में ऐलान करते कि हम खिल गए हैं। हर फूल मंे चार ही रेशमी पंखुड़ियां और एक लंबी सी, भीतर से बांसुरी जैसी पोली, हल्के पीले रंग की नाजुक डंडी। ये फूल ऊपर ही ऊपर इतराते रहते, हवा में झूलते रहते, नीचे कभी नहीं गिरते। इन्हें तोड़ने का सवाल ही नहीं पैदा होता था। कोई हेलिकाॅप्टर में बैठकर जाए तो शायद उन्हें छू पाए।
    इन फूलों का बारिश से बड़ा इश्क था। जैसे ही जोर की बौछार आती, इनका घमंड तोड़कर उन्हें जमीन पर गिरा देती। वह गिरना भी क्या गिरना था- शानदार। जैसे शाही सवारी आई हो। सफेद खुशबूदार फूलों का कालीन बिछ जाता। कहीं पांव रखने की जगह नहीं होती। यह खिलता भी है तो सिर्फ बारिशों में। महाराष्ट्र में इस वृक्ष को गगन-जूही कहते हैं। बड़ा ही सटीक नाम है- आकाश में खिलने वाली जूही। 
    मेरे आंगन में वही सबसे बड़ा वृक्ष था, सो सांझ के समय छोटे पक्षियों का बसेरा बन गया था। न जाने कहां-कहां से उड़ते हुए आते और दिन भर का लेखा-जोखा एक दूसरे को सुनाते। पता नहीं उनमें क्या चर्चाएं होतीं, पूरा वृक्ष मुखर हो उठता। कभी-कभी उनका शोरगुल असहनीय हो जाता और पढ़ने-लिखने में विघ्न पैदा करता। वह वृक्ष, वे पक्षी, उनका शोरगुल और धूमिल संधि प्रकाश मेरे संध्याकालीन ध्यान का हिस्सा बन गए थे। मैं नई-नई ओशो से मिली थी। और मेरी पूरी चेतना ध्यान में डूबने लगी थी। 
    जब कोई ध्यान मंे उत्सुक होता है तो सबसे पहली बाधा बनते हैं विचार। अचानक विचार घेर लेते हैं, समझ में नहीं आता क्या करें इनका। हम जितना उन्हें हटाने की कोशिश करते हैं, उतना वे ढीठ होकर आक्रमण करते हैं। एक दिन मैंने ओशो की किसी किताब में एक कहानी पढ़ी। एक धनी आदमी तीर्थयात्रा पर गया और अपना घर, जमीन नौकरों के हवाले कर गया। यात्रा लंबी चली। जितना सोचा था, उससे कहीं अधिक समय लगा। उसके पीछे नौकर ही सब कुछ संभाल रहे थे। अब जिस घर में नौकर ही नौकर हों और मालिक न हो, उसकी हालत हम सोच सकते हैं। न सफाई, न देखभाल, घर में जाले लग गए, सामान नदारद होने लगे। एक दिन द्वार पर एक तांगा आकर रूका। थका-मांदा, धूल-धूसरित मालिक था। पूरे घर में भूचाल आ गया। भाग दौड़ मची, नौकर घर की सफाई करने लगे, सामान वापस आ गया। मालिक को कुछ कहने की जरूरत ही न पड़ी, क्योंकि उसका मालिक होना ही न काफी था। कहानी बताकर ओशो ने कहा, मन की भी यही हालत है। नौकरों का राज है और मालिक गायब है। नौकर हैं तुम्हारे विचार। खूब ऊधम मचा रहे हैं। तुम उन्हें हटाने की कोशिश करते हो तो वह भी एक विचार ही है। जैसे एक नौकर, दूसरे नौकर को आज्ञा दे। वह भला क्यांे सुनेगा? मालिक को ले कर आओ। मालिक को जगाओ। 
    और मालिक कौन है? साक्षी, जो दूर खड़ा देखता है, सोचता नहीं, वह विचार में उलझता नहीं, उनसे अछूता रहता है, क्योंकि वह विचारों से बड़ा है। 
    कहानी को पढ़कर मैं उसके आशय में उतरने की कोशिश कर रही थी कि लगा, एक विचित्र सन्नाटा छाया हुआ है। आज गगन जूही के पेड़ पर बेहद खामोशी है। इतने सारे पक्षी अचानक खामोश क्यों हो गए? अभी तो रात भी नहीं हुई। मेरा कौतूहल मुझे बाहर ले आया। बड़ा विचित्रा दृश्य था। सारे पक्षी दम साधकर चुपचाप दुबक कर बैठे थे। न कोई हिल रहा था न डुल रहा था। मैं थोड़ी और आगे आई और नजरें गड़ा कर देखा तो डालियों के बीचोंबीच एक बड़ा सा पक्षी बैठा हुआ था, शायद गगन-जूही का मालिक आ गया था। ओशो की बात मानो मेरे सामने प्रत्यक्ष घटित हो गई।