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One shrine to the next, the hermit can't stop for breath. Soul, get this! You should have looked in the mirror. Going on a pilgrimage is like falling in love with the greenness of faraway grass.     Lala Ded

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आस्था संकट हरन।

भगवान् केदारनाथ संतरे लेकर पधारेःµ घटना 1986 की है। मैं सपत्नी कुम्भ-मेले के अवसर पर हरिद्वार गया था। यात्रियों की सुविधा के लिये बदरीविशाल एवं केदारनाथ के पट कुछ जल्दी ही खोल दिये गये थे, अतः हम पहले केदारनाथ के दर्शन की बात सोचकर गौरीकुण्ड से होकर प्रातःकाल जल्दी ही पैदल रवाना हो गये।
    हम अभी आधी दूरी तय कर पाये थे कि मुझे पेशाब में जलन होने लगी, इसके उपचार हेतु मेरे पास कुछ संतरे थे, सो मैंने उन्हें खा लिया। उससे मुझे लाभ भी मिला। हम लोग आगे बढ़े, परंतु फिर मुझे जलन होने लगी। इस बार इतनी तेज जलन हुई कि पेशाब करने बैठने पर मुझे दस्त भी हो जा रहा था। अब मेरे पास संतरे भी नहीं थे। मेरा कष्ट देखकर मेरी पत्नी भी घबरा गयी। हम दोनों को यह लगा कि अब हम केदारनाथ के दर्शन नहीं कर पायेंगे। मैं कुछ दूर वैसे ही चलता-चलता रुक गया और मन-ही-मन भगवान् से प्रार्थना करने लगा कि हे भगवान्! मैं वापस तो नहीं जाऊँगा, मगर मैं आपके पास आऊँ भी कैसे? मुझसे तो चला ही नहीं जाता। मैंने अपनी पत्नी से कहा कि तुम्हें कहीं संतरा दिखे तो ले आओ; क्योंकि मुझे संतरे खाने से आराम हुआ था। मेरी पत्नी ने आस-पास जाकर बहुत प्रयास किया; परंतु कहीं से संतरे उपलब्ध न हो पाये, अतः हम लोग निराश होकर वहीं बैठे रहे और भगवान् केदारनाथ को याद कर उनकी प्रार्थना करने लगे। फिर मैं किसी प्रकार हिम्मत कर थोड़ा आगे चला ही था कि हमने देखा कि एक 15-16 वर्ष का लड़का हमारी ओर एक बैग लटकाये आ रहा था। उसके दोनों हाथों में संतरे थे। पास आने पर मेरी पत्नी ने उससे मेरी परेशानी बताते हुए एक संतरा माँगा, मगर उसने कई संतरे मुझे दिये और कहाµ ‘बाबा, आप इससे पूर्ण स्वस्थ हो जायँगें।’ इतना कहते हुए वह तेजी से दौड़ता हुआ नीचे की ओर चला गया, संतरे के पैसे हमारे हाथ ही में रह गये। हम दोनों यह देखकर अवाक् रह गये। उस समय हो रही पीड़ा को दूर करने के लिये मैंने संतरे छीलकर जल्दी से उनका सेवन किया और मैं अपने को पूर्ण स्वस्थ-सा महसूस करने लगा। मेरी पीड़ा जो पहले संतरे खाने से धीरे-धीरे दूर होती थी, किंतु उस लड़के के संतरों में न जाने क्या बात थी, संतरा खाते ही पीड़ा एकदम शांत हो गयी। फिर यात्रा आरम्भ की तो दोबारा मुझे ऐसी परेशानी भी नहीं हुई।
    आज मैं जब उस घटना के विषय में सोचता हूँ कि जहाँ कोई फल-फूल नहीं मिल रहा था; क्योंकि इतनी ठण्ड थी कि फल मिलने का सवाल ही नहीं था, वहाँ वह लड़का कौन था और कहाँ से संतरे लिये हुए मेरे पास आ गया! यह सब विचार करने पर स्वतः ही मन कहने लगता है कि वे भगवान् केदारनाथ ही रहे होंगे जो मेरी मदद के लिये बालक के रूप में प्रकट होकर मेरी तकलीफ को दूर कर गये और मैं सकुशल उनके दर्शन कर सका।µ