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One shrine to the next, the hermit can't stop for breath. Soul, get this! You should have looked in the mirror. Going on a pilgrimage is like falling in love with the greenness of faraway grass.     Lala Ded

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अहंकार से पुण्य नष्ट


तीर्थ का पुण्य अहंकार से नष्ट हो जाता है
    हर इंसान समझता है कि जो वह कर रहा है, वह सबसे अच्छा है। प्रभु की खोज में जो लगे हैं, उनके अन्दर भी अक्सर घमंड आ जाता है। इंसान सोचने लगता है कि मैंने तो बहुत दान-पुण्य किया है, बहुत से तीर्थ स्थानों पर गया है, औंरो का बहुत ख्याल करता हूँ। कई बार हम यह भूल जाते हैं कि सदगुणों का जिंदगी में होना बहुत जरूरी है। ऐसी जिंदगी जो अहिंसापूर्ण हो, ऐसी जिंदगी जो सेवाभाव से भरपूर हो, ऐसी जिंदगी जिसमें हम नम्रता से हर, एक से पेश आएँ, ऐसी जिंदगी जिसमें हमारे अन्दर सबके लिए प्रेम हो। इंसान यह भूल जाता है कि जब उसके अन्दर घमंड पैदा होता है, तो फिर उसके कदम उसे प्रभु से दूर ले जाते हंै। 
    एक आदमी का नाम शिवराम था। प्रभु का बड़ा भारी भक्त था। रोजाना अपने धर्मानुसार पाठ पूजा किया करता था। कुछ दिन बाद उसे लगा कि तीर्थ यात्रा पर भी जाना चाहिए। तो वह अपने धर्म के हर तीर्थ पर गया, एक बार नहीं, दो बार नहीं, साठ बार गया। और चूँकि इतनी बार तीर्थ करके आया, तो सोचा कि क्यों नहीं अपने नाम के साथ तीर्थ शब्द जोड़ लूँ। उसने अपना नाम शिवराम की जगह तीर्थराम रख लिया। जब भी कोई उससे मिलता और पूछता कि तुम्हारा नाम क्या है तो वह कहता था कि मैं तीर्थ शिवराम हूँ और साठ बार सभी तीर्थों पर होकर आया हूँ। 
    एक दिन वह सोया हुआ था कि उसे स्वप्न आया कि उसकी मौत हो गई है। जब धर्मराज के सामने पेशी हुई तो उससे पूछा गया कि पहले अपने अच्छे कर्मों का हिसाब करना है या बुरे कर्मों का? उसने कहा, पहले अच्छे कर्मों का ही हिसाब करना चाहूँगा, क्योंकि साठ बार तीर्थ यात्रा करके आया हूँ। तो धर्मराज ने कहा हाँ, तुम्हें इसका फल मिलना चाहिए। लेकिन उन तीर्थ स्थलों पर जाकर तुम्हारे अन्दर घमंड आ गया है। इतना घमंड कि तुमने अपने नाम के आगे भी तीर्थ शब्द लगा लिया है ताकि लोग समझें कि तुम तीर्थ स्थानों पर हो कर आए हो। इसलिए जितना भी फल मिलना था वह शून्य हो गया है। जितना ज्यादा तुमने लोगों को यह बताया है कि तुम इस तीर्थ पर जाते हो उस तीर्थ स्थान पर जाते हो, उससे जो भी पुण्य तुमने कमाया था, वह सब खत्म हो गया। शिवराम को लगा कि यह तो सारा काम खराब हो गया। सबसे अच्छा काम तो जिंदगी में मैंने यही किया था, इसी का पुण्य बेकार हो गया। पसीने से लथपथ एकदम से उसकी नींद खुल गई। उठा तो शुक्र मनाया कि वह सपना ही था, अभी उसकी मौत नहीं हुई। फिर पूरी जिंदगी उसने अपनी तीर्थ यात्रा का अहंकार नहीं किया। महापुरुष बार-बार हमें यही समझाते हैं कि जिंदगी ऐसी जीयें जो नम्रता से भरपूर हो। अगर अहंकार को काबू में न रखा जाए, तो फिर इंसान सच्चाई की जिंदगी नहीं जी पाता। वह बढ़-चढ़ कर बातें शुरू कर देता है, अपनी बात को सही दिखाने के लिए वह सच्चाई को भी बदल देता है। हम में से कई लोग काफी गप मारते हैं। करेंगे इतना सा काम, लेकिन बात करेंगे बहुत सारी। हम सोचते हैं कि अगर हम औरों को बताएंगे कि हमारे पास बहुत कुछ है, तो वे समझेंगे कि हम बहुत बड़े हैं। 
    तो महापुरुष समझाते हैं कि इंसान अहंकार में सच्चाई से बहुत दूर चला जाता है। अहंकार करके वह किसी की मदद करने के बजाय यही चाहता है कि सब कुछ उसी के लिए हो। उसे अन्दर से लगता है कि सब उसकी वाह-वाह करें कि आप बहुत अच्छे हो। किसी की मदद करने के बजाय वह इंसान अपनी बड़ाई में ही लगा रहता है। अहंकार के कारण ही इंसान को गुस्सा भी आता है। अगर एक अहंकारी आदमी आया और सामने वाला भी अहंकारी निकल आया तो पहला अपनी बात करेगा पर दूसरा उसकी बात सुनेगा नहीं। क्योंकि दोनों अहंकार से भरे हुए हैं।