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One shrine to the next, the hermit can't stop for breath. Soul, get this! You should have looked in the mirror. Going on a pilgrimage is like falling in love with the greenness of faraway grass.     Lala Ded

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निष्ठा 

वृद्धावस्था तथा लकवे की बीमारी के कारण श्री राजनारायण बसु राजगृही में रहने लगे। अब उनका बाहर जाना बिलकुल ही बंद हो गया। उनके परमप्रिय शिष्य बाबू अश्विनी कुमार को इस बात का पता चला कि गुरुदेव बीमार हैं तो वे तुरंत उनके दर्शनों के लिए चल पड़े। अश्विनी बाबू कमरे में प्रवेश करते हुए चारपाई पर बैठ गए।
    थोड़ी ही देर में बातचीत का सिलसिला चल पड़ा। राजनारायण बसु ने अपने मा£मक उपदेश शुरू किए। भगवद्गीता तथा उपनिषदों के श्लोक, वड्र्सवर्थ, शेली वायरन तथा हाफिज आदि संतपुरुषों की सम्मतियाँ वे इस प्रकार देने लगे, मानो वे पूर्ण स्वस्थ हों, उन्हें किसी प्रकार का कष्ट न हो। यह देखकर अश्विनी कुमार ने पूछा “भगवान्! आपने तो ईश्वर की बड़ी उपासना की, फिर भी वह आपको कष्ट दे रहा है। मैं देख रहा हूँ कि आप इस पर भी उसी ईश्वर के गुण गाए जा रहे हैं।” राजनारायण बसु बोले- “अश्विनी! तू उन्हें दोष न दे। थोड़े दिन यह शारीरिक कष्ट मिले तो उससे मेरा क्या बिगड़ जाएगा! रोगशय्या पर पड़ा और भी निश्चत भाव से भजन कर सकूँगा, पर क्या तुम यह भूल रहे हा कि मैंने उन्हीं की कृपा से जीवन में कितने ही सुंदर दृश्य देखे और अनेक सुख उठाए।” गुरुदेव की यह अविचल निष्ठा देखकर अश्विनी बाबू आगे कुछ न बोल सके।