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One shrine to the next, the hermit can't stop for breath. Soul, get this! You should have looked in the mirror. Going on a pilgrimage is like falling in love with the greenness of faraway grass.     Lala Ded

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अच्छे का श्रेय खुद को और बुरे का दोष भगवान को

इस शरीर की अपनी कोई ताकत नहीं है, ताकत इसके भीतर बैठे हुए भगवान की है, जिसे हम जीवात्मा या रूह कहते हैं। यह जीवात्मा परमात्मा की चेतन शक्ति है और उससे जुदा नहीं है। भगवान  हम सभी के अंदर है, उसके इस शरीर से निकलते ही यह शरीर मिट्टी की ढेरी हो जाता है और दुनिया के सारे रिश्ते खत्म हो जाते हैं।

         आइये आज हम भगवान से मिलने की कोशिश करें। वह कौन सी चीज है जिसके नहीं रहने पर यह शरीर जलती चिता से भाग नहीं खड़ा होता? वह कौन सी ताकत है जो जीभ को खट्टे, मीठे, कड़वे का भान कराती है। कान को सुनने की, नाक को सूंघने की, त्वचा को छूने की, हाथ को पकड़ने-छोड़ने की और मुंह को बोलने की ताकत देती है- असल में यह ताकत किसकी है?

         जो किसी को भी दिखाई नहीं देता, जिसका कोई नाम भी नहीं है। जो सब में है, जिसके बिना कुछ भी नहीं है, वह ताकत आत्मा है। वह न हिंदू है, न मुसलमान, न जैनी, न बौद्ध। ये सारी दीवारें तो इंसान की खड़ी की हुई हैं। सभी पंथ एक ही तत्व (सत, चित, आनन्द) को अपने-अपने ढंग से बताते हैं। हम नासमझी में एक-दूसरे से नफरत करते हैं और अपने ही कलेजे को जलाते हैं।

         वह सबके लिए समान है, सब जगह है। हम ऐसे भगवान को भी धोखा देना चाहते हैं। इसलिए अच्छे काम का श्रेय खुद को देते हैं तथा बुरे कर्मों का दोष भगवान पर डाल देते हैं। भगवान फिर भी जीव को सुधरने का मौका देता है। सोचता है कि शायद दुख में इसको मेरी याद आ जाए। दुख में अपने पराए हो जाते हैं और सुख में पराए अपने हो जाते हैं। इस संसार में सारे रिश्ते लेने-देने पर टिके हैं। जबकि भगवान का रिश्ता केवल देने का है। भगवान किसी को भी दुख नहीं देता।

         आइए विचार करें कि हमारे जीवन में दुख/चिंता कहां से आते हैं? क्यों आते और हम दुख में भी सुखी कैसे रहें?

         पढ़ी-पढ़ाई, सुनी-सुनाई बातों को ताक पर रख कर अपनी जिंदगी के तजुर्बों पर गौर करें। हमें अच्छी तरह पता है कि बचपन से अब तक हमारी जिंदगी में न जाने कितने लोग मिले और बिछुड़े, कितनी चीजें मिलीं और बिछुड़ीं। कभी जिनके बारे में सोचा करते थे कि हाय ये लोग, ये चीजें, इन जगहों के बिना हम कैसे रहेंगे? उन सबके बारे में हमारी पसंद-नापसंद वक्त के साथ बदलती रहीं।

         बचपन में माँ और खिलौनों से प्यार था, फिर दोस्तों से प्यार हुआ, फिर पत्नी, बच्चों व मकान से हुआ। जो जब तक हमारे काम आया वो हमें अच्छा लगा, वही जब हमारे काम नहीं आया तो उसे हम बुरा मानने लगे। सारे रिश्ते लेने-देने, मिलने-बिछुड़ने, पाने-खोने तक सिकुड़े रहे। जिन लोगों को कभी अपना माना था, उनके दुनिया से विदा होने पर फिर से जिंदगी पुराने ढर्रे पर वापस आ ही गई। रिश्तों, चीजों, जगहों के पाने-खोने में हमारी पसंद/नापसंद काम नहीं आई।

         ऐसे तजुर्बों के बाद भी हम लोगों, चीजों, घटनाओं आदि से झूठी उम्मीदें लगाकर खुद को दुखी बना लेते हैं।

         संसार और शरीर की एक बिरादरी है। संसार को शरीर चाहिए और शरीर को संसार चाहिए। लेकिन भगवान को मन चाहिए। घर-परिवार और व्यापार छोड़ने को भगवान ने कभी नहीं कहा। इनमें मै-पना/मेरापना रखना ही हमें मौज में नहीं रहने देता।

         आत्मा के बिना इस शरीर की अपनी खुद की कोई हस्ती नहीं है। हस्ती सभी के दिलों में बैठे भगवान/खुदा/वाहेगुरु की है। अफसोस हमारे पास सारी नाशवान चीजों के लिए फुल टाइम है। लेकिन हमारी अपनी सांसों की धौंकनी चलाने वाले, नींद में सब जीवों के भीतर जागकर चैकीदारी करने वाले के लिए टाइम नहीं है, उसे ही भुला दिया है। इसलिए जीवन यात्रा की असली मंजिल भगवान/खुदा/ वाहेगुरु को अपने दिल में ही ढूंढने की कोशिश करें।