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1995 06 आपकी बात , कोशुर समाचार


Date:- 01 Jun 1995


1995 06 आपकी बात , कोशुर समाचार

 

अर्जुननाथ कौल

पत्रिका की बढ़ती आस्था को आघात लगे

डा. शांत तथा अन्य पाठकों से मैं पूरी तरह से सहमत हूँ कि 'कोशुर समाचार' का स्तर काफी बढ़ गया है तथा पाठन सामग्री काफी रुचिकर हो गई है। पर यदि किसी संभ्रात लेखक का लेख विचारों के मतभेद के कारण अथवा कश्मीरी समिति की नीतियों के अनुकूल न होने के कारण छपने से रह जाए तो इस स्थिति में पाठकों की इस प्रिय पत्रिका के प्रति बढ़ती हुई आस्था को अवश्य आघात पहुचेगा।

अर्जुननाथ कौल

(पूर्व निदेशक लोकसभा पुस्तकालय) "साहिब कुटीर" त्रिवेणी शेख सराय , नई दिल्ली

 

 

 

विनीत

 

बेताबी से प्रतीक्षारत लेखक

आपने अपना मूल्यवान समय एवं चिंतन समर्पित करके पत्रिका का स्तर एवं मान बनाए रखने और बढ़ाने में कोई कसर रहने नहीं दी। अब पत्रिका इस स्थिति में है कि इसमें अपनी कृतियों को प्रकाशित रूप में देखने के लिए लेखक बेताबी से प्रतीक्षा करते हैं। यह अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है। स्थान की कमी के कारण अच्छे एवं स्तरीय लेखकों को भी यह जानने की उत्सुकता बनी रहती है कि उनका लेख कब प्रकाशित होगा। संपादक की दिवशता इस संदर्भ में सर्वविदित है। ऐसी दशा में किसी का क्षुब्ध होना निरर्थक है।

विनीत

कश्मीरी अपार्टमेंट्स,

 

 

 

मक्खन लाल हण्डू

अंग्रेजी का मोहपाश

कोशुर समाचार का एक नियमित पाठक होने के नाते यदि लालित्यमय कोशुर समाचार में मुझे कोई चीज | सालती रही है तो वह है हिंदी की अपेक्षा अंग्रेजी का अधिक स्थानापनन।

निःसंदेह, हमारा समाज (बिरादरी) लगभग शतशः शिक्षित है। और भारत के अधिकांश शिक्षितों की भांति हम भी अंग्रेजी में ही अपनी शिक्षा प्राप्त करने में तथा उसका अधिकांश व्यवहार करने में अपना गौरव समझने की मानसिकता से ही ग्रसित हैं। तथ्य है कि अंग्रेजी का ज्ञान आज भारतीय समाज के साथ-साथ हमारे समाज का भी एक पोषक तंतु बना हुआ है। इस की जड़ इसी सीमा तक गहरी पैठी है कि हमारे घरों की पुरानी अपढ माताएं भी देखा देखी में चाहे टूटी-फूटी ही सही, अपनी दैनंदनीय बोलचाल में अंग्रेजी का कोई न कोई शब्द अवश्य प्रयुक्त करती हैं।

यह दुःख का विषय नहीं है कि हिंदी का सुज्ञाता जीविकार्जन के लिए दर दर की ठोकरें खाता है और अपेक्षाकृत अंग्रेजी का साधारण ज्ञाता भी इस त्रासदी से दो-चार नहीं हो पाता है। कारण स्पष्ट है कि संविधान निर्माताओं ने भारतीय राजनीति शास्त्र से अनभिज्ञ होकर अंग्रेजों की तर्ज पर संविधान बनाकर हिंदी को राष्ट्र भाषा का स्तर देकर भी कचरे में फेंकने का सुभीता किया कि हिंदी (राष्ट्रभाषा होकर भी) किसी पर थोपी नहीं जाएगी। और उन्हीं सत्ताधारियों ने ही, जब आज तक भी, राष्ट्र के उच्चतम सदन, संसद को भी अंग्रेजी भाषा से ही गुंजायमान किया और प्रशासन में एक पियुन से लेकर उच्चस्तरीय सफेद कालर भी जब इस माया जाल से नहीं निकलता तो जनसाधारण पर इसी का प्रभाव पड़ना अवश्यंभावी है।

यह एक ऐसी त्रासदी है कि लगता है देश इसमें से निकलने के बजाए दिन प्रतिदिन इसी में गहराया जा रहा है। तो इस करके हमारा समाज भी इसी ढर्रे पर जहां गौरवान्वित अनुभव करता है वहां मेरे जैसा शिक्षित, अंग्रेजी का ज्ञान रखने वाला सामाजिक जन तो समाजगत विवशता के कारण इससे चिपकने के लिए परवश है। व्यक्तिगत रूप में मैं अंग्रेजी के विरुद्ध नहीं हूं बल्कि मानता हूं कि एक शिक्षित से जितना हो सके विभिन्न भाषाओं का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। पर इतना भी क्या अपनी भावभूमि से रिसकर ही। हिंदी भारतीय प्राण से जुड़ी हुई है तो यदि अंग्रेजी का प्रयोग त्याग न भी दें पर हिंदी को उसकी उपेक्षित वरीयता तो दे ही।

अतः, 'समाचार' में यदि हिंदी का स्थान अंग्रेजी से अधिक करना संभव न हो तो भी उसके समकक्ष इस राष्ट्रभाषा का स्थान होना तो चाहिए ही। अतः, मेरा अनुरोध है कि समाचार का संपादक मंडल राष्ट्रभाषा का हित दृष्टिगत रखकर इस बारे में मंत्रणा करके मेरे सुझाव का औचत्य परखें और किसी निर्णय पर पहुंचकर जैसा उचित समझें करें। इसका तात्पर्य यह नहीं कि मैं अपनी कश्मीरी भाषा से लगाव नहीं रखता हूं। मैं कैसे भूल सकता हूं कि जिह्वा के प्रथम उतार-चढ़ाव में मेरे मुख से इसी भाषा का शब्द प्रस्फुटित हुआ है।

इस भाषा के समर्पण भाव के अंतर्गत मैं अपने समाज (बिरादरी) के विद्वानों तथा भाषा-शास्त्रियों से सविनय अनुरोध तथा आह्वान करता हूं कि वे इस भाषा की सारी अडचनों को दूर कर इसका सुचारु परिष्कार तथा संवरण- कर एक वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान करें। इस सारे क्रियाकलाप में यह गूढ तथ्य भी सन्निहित है कि कश्मीरी भाषा का वह आदि-स्वरूप बहाल किया जाए, जिसमें हमारी पूज्यनीया लल्लेश्वरी ने अपना परमार्थ स्वरूप वर्णन किया। आवश्यकता है कि भाषा में सारे विदेशीय-भाषीय प्रक्षेपन संशोधित करके भाषा के आदि शब्दों की व्युसति का परिज्ञान कोशुर- समाचार के माध्यम से समाज (बिरादरी) को कराया जाए।

कश्मीरी भाषी रचनाकारों से सविनय निवेदन है कि वे मास्टर जिंदा कौल जैसी शैली में ही शुद्ध कश्मीरी भाषा का प्रयोग अपनी रचनाओं में करने की अनुकंपा करें। तभी हम अपनी भाषा का सत्य पीठासनापन करने के सक्षम होंगे। इति।

पुनश्चः संलग्न, मेरी कश्मीरी इतिहासाधार पर कहानी 'सतीसरांचल' को भी अपने 'समाचार' में स्थान देकर कृतार्थ करें।

-मक्खन लाल हण्डू 212,   विकासपुरी,  

 

अस्वीकरण :

उपरोक्त लेख में व्यक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं और kashmiribhatta.in उपरोक्त लेख में व्यक्त विचारों के लिए किसी भी तरह से जिम्मेदार नहीं है।

साभारः जून 1995 कोशुर समाचार