Karmeeti Bhai भक्त करमैती बाई 

       
भगवत्कृपा से अनेक संतों के जीवन में अलौकिक घटनाएँ घटी हैं। पर प्रभु की वास्तविक कृपा हो तो उनके चरणों में ही सच्चा अनुराग हो जाता है। “पाँउ देइ एहि मारग सोई। जा पर कृपा राम की होई।” ऐसी ही भगवद् कृपा की पात्रा थी, राजस्थान की भक्त करमैती बाई। जैसे भक्ति जन्म-जन्मान्तरों के पुण्यों का फल है, वैसे ही भगवत्कृपा भी प्रभु की विशेष स्नेहपूर्ण दृष्टि का ही फल है। करमैती जयपुर राज्यान्तर्गत खण्डेला के सेखावत सरदारों के कुल पुरोहित पण्डित परशुराम जी की गुणवती कन्या थी। पूर्वजन्म के संचित पुण्यों से बालकपन में ही उसके हृदय में भक्तिभाव का स्फुरण हुआ। माता-पिता के संस्कार भी भक्तिमय थे। इसलिए पुत्राी का कृष्ण में सच्चा अनुराग देखकर वह अपने भाग्य को सराहने लगे। करमैती प्रायः सारा समय एकान्त स्थल में कृष्ण नाम जपने में व्यतीत करती। प्रतिदिन उसकी प्यारे श्यामसुन्दर में प्रीति गाढ़ी होती गई। हर समय कृष्ण-कृष्ण रट लगाते-लगाते वह अनेक अवसरों पर मू£छत-प्राय हो जाती। अर्धचेतन अवस्था में उसके होंठ केवल एक ही शब्द बुदबुदातेµ “हा नाथ! हा नाथ!..... हे कृष्ण!“ उम्र बढ़ने के साथ-साथ ही करमैती की भक्ति भी प्रगाढ़ होती गई, अथवा यों कहें कि उस पर श्रीकृष्ण की कृपा का अमृत विशेष रूप से बरसने लगा। हिन्दू परिवारों में जैसा होता है, माता-पिता ने करमैती के भी छोटी उम्र में हाथ पीले कर दिए। उन्हें भय था कि कन्या के कन्हैया-प्रेम को सजातीय बंधु उन्माद मान कर कहीं विवाह का प्रस्ताव ही स्वीकार न करें, और कन्या कुंवारी रह जाए। पर मीराबाई की तरह ही करमैती ने भी साँवले सलोने श्यामसुन्दर को ही मानो वर लिया हो। 
कुछ वर्षों बाद जब गौने का अवसर आया और संसार की अधिक समझ आ गई तो करमैती को ज्ञात हुआ कि पति-गृह में तो भगवान् का नाम लेना भी अपराध माना जाता है। वहाँ अपने ‘नाथ’ का ..............., भजन, गायन कैसे कर पायेगी। मन-ही-मन वह बहुत दुःखी हुई। अपने ‘नाथ’ से उसने प्रार्थना की.....“ हे कृपालु! अब संसार चक्र से उबारने वाले तुम्हीं हो। मुझे अपनी शरण में लो प्रभु.....“ 
करमैती के माता-पिता बेटी को ससुराल भेजने की तैयारी में लगे रहे। पर, प्रभु की जिस पर असीम कृपा हो,वह तो उनका ही हो जाता है, संसार से उसका क्या नाता? करमैती को कुछ न सूझा। प्रभु-प्रेरणा से वह राजपूत कन्या जो कभी घर से बाहर भी नहीं निकली थी, निर्जन वन-प्रान्त में रात्रि के गहन अन्धकार को चीरनी हुई दौड़ने लगी। दौड़ती रही-दौड़ती रही। उधर प्रातः काल ही घर में कन्या को न देखकर पिता परशुराम घबड़ा गए। माता विलाप करने लगी। इधर-उधर ढूँढ़ मच गई। दो घुड़सवार उत्तर दिशा में भी दौड़े। करमैती ने वही राह तो पकड़ी थीµ अपने श्यामसुन्दर की दिव्य भूमि की राह। सहसा घोड़ों की टाप का कर्णभेदी स्वर सुनकर करमैती भय से काँप गई। अब इस निर्जन वन में क्या करे। छुपने का भी कोई स्थान नहीं। तभी वह क्या देखती है कि रेतीली भूमि पर एक मरा हुआ ऊँट पड़ा है। उसके पेट में गीदड़ों ने माँस खा कर पोल बना दी थी। करमैती ने संसार की दुर्गन्धमयी वासनाओं की अपेक्षा ऊँट का वह दुर्गन्ध-युक्त कंकाल श्रेष्ठ समझा। वह उसी में छुप गई। उसे इस अवस्था में श्रीकृष्ण का ही ध्यान था, उनका ही स्मरण था। दुर्गन्ध से घृणा नहीं थी, पकड़े जाकर श्रीकृष्ण-भक्ति के पक्ष से विचलित होने का भय था। घुड़सवार आगे निकल गए। फिर भी, कहते हैं, करमैती तीन दिन तक उसी अवस्था में पड़ी श्रीकृष्ण का सुमिरन करती रही। 
समय बीता और कृष्ण की मतवाली करमैती हरिद्वार में पुण्यतोया भागीरथी में स्नान करने के पश्चात श्रीकृष्ण की लीलाभूमि वृन्दावन में पहुँच गई। पिता परशुराम की भूख-प्यास तो करमैती के साथ ही चली गई थी। आखिर एक दिन पुत्राी को ढँूढ़ते-ढूँढ़ते वह वृन्दावन के पावन वनों में पहुँच गए। बहुत खोज करने पर एक दिन उन्होंने एक वृक्ष पर चढ़कर देखा तो पुत्राी को ब्रह्मकुण्ड के निकट सघन वन में कृष्ण गुनगान में तल्लीन देखकर हर्ष और शोक के मिश्रित भावों से घिर गए। आँखों से आँसू बहने लगे। करमैती के समीप आकर वह भी कृष्ण-प्रेम में देर कर रोते रहे। कुछ समय पश्चात् सुधि आई तो पुत्राी से घर लौटने की अनुनय-विनय करने लगे। पर अब बहुत देर हो चुकी थी। करमैती ने तो सांसारिक विषयों को वमन-इव त्याग दिया था। कृष्ण की भक्ति पाकर वह बड़भागिनी बन गई थी। पिता परशुराम उसकी अनन्य भक्ति के आगे नतमस्तक हुए और वापस खण्डेला लौट आए। पत्नी से उन्होंने भारी कण्ठ से इतना ही कहाµ “तू धन्य है आर्या! तूने कृष्ण-भक्त पुत्राी-रत्न को जन्म दिया।”
(पुत्रावती जुबती जग सोई। रघुपति भगत जासु सुत होई।।)
करमैती ने माता-पिता को ही नहीं, अपने राज्य और देश को भी धन्य किया। इसी भाव से सेखावत राजा वृन्दावन गए। करमैती को भक्ति में तल्लीन देखकर वह भी अपने भाग्य की सराहना करने लगे। पुरोहित जी की भक्तिमती कन्या के लिए उन्होंने कुटिया बनवाने का प्रस्ताव किया। करमैती ने संत-स्वभाव से प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया। पर राजा के अत्यधिक आग्रह करने पर उसने तटस्थ भाव से उनके कार्य में बाधा नहीं डाली। जिसे भगवद्नुराग हो गया हो उसके लिए क्या कुटिया, क्या वन? भगवत्प्रेम से बढ़कर भी क्या कोई सुख है उसके लिए? उसे तो वह भगवत्कृपा प्राप्त हो जाती है, जो देवताओं को भी दुर्लभ है। करमैती यही देव-दुर्लभ वस्तु तो पा चुकी थी। 


 

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